‘घूसखोर पडंत’ विवाद: SC ने नीरज पांडे को फटकारा, कहा- नया टाइटल बताओ, तब रिलीज करने देंगे फिल्म

नई दिल्ली। देश की सबसे बड़ी अदालत ने गुरुवार को मनोज बाजपेयी अभिनीत फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ के मेकर्स को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने फिल्म के निर्देशक और निर्माता नीरज पांडे पर इस फिल्म के माध्यम से समाज के एक वर्ग को बदनाम करने का आरोप लगते हुए स्पष्ट किया कि, ऐसे विवादास्पद टाइटल का इस्तेमाल करके किसी समुदाय की छवि खराब करना कतई उचित नहीं है।

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CBFC को नोटिस

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने वाली एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान मेकर्स से कहा कि, जब तक फिल्म का नाम बदलकर नया टाइटल नहीं बताया जाता, तब तक इसे रिलीज करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। कोर्ट ने इस मामले में सूचना और प्रसारण मंत्रालय तथा सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन को भी नोटिस जारी किया है, ताकि वे भी अपना पक्ष रख सकें।

नेटफ्लिक्स पर होनी है रिलीज

'घूसखोर पंडत'

आपको बता दें कि, फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ नेटफ्लिक्स पर रिलीज होने वाली है और इसमें मनोज बाजपेयी के साथ ही नुसरत भरुचा, साकिब सलीम, अक्षय ओबेरॉय और दिव्या दत्ता जैसे दिग्गज कलाकार अहम किरदार निभाते नजर आएंगे। यह एक फिक्शनल थ्रिलर फिल्म है। फिल्म में एक ऐसे पुलिस अधिकारी की कहानी दिखाई गई है, जो घूस लेता है, लेकिन टाइटल में ‘पंडत’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है जो विवाद की मुख्य वजह बन गया है।

ब्राह्मण समुदाय ने जताया विरोध

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि, यह टाइटल ‘घूसखोर’ और ‘पंडित’ को जोड़कर ब्राह्मण समुदाय को घूसखोरी से जोड़ता है, जो जातिगत स्टीरियोटाइप को बढ़ावा देता है और सांप्रदायिक सद्भाव के लिए खतरा पैदा करता है। यह याचिका ब्राह्मण समाज ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय संगठन सचिव अतुल मिश्रा द्वारा दायर की गई थी, जिसमें फिल्म की रिलीज पर पूर्ण रोक लगाने की मांग की गई है।

मनोज

याचिका में कहा गया कि, ऐसा टाइटल संवैधानिक मूल्यों, समानता और गरिमा के खिलाफ है तथा यह धार्मिक भावनाओं को आहत करता है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान निर्माताओं से कई सवाल किए और कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन यह असीमित नहीं होती। कोर्ट ने टिप्पणी की, कि ऐसे शीर्षक से समाज के एक हिस्से को बदनाम किया जा रहा है, जो नैतिकता और पब्लिक ऑर्डर के विरुद्ध है।

19 फरवरी को होगी अगली सुनवाई

बेंच ने नीरज पांडे को निर्देश दिया कि, वे एक एफिडेविट दाखिल करें, जिसमें स्पष्ट रूप से यह आश्वासन दिया जाए कि, फिल्म किसी भी वर्ग या समुदाय को नीचा नहीं दिखाती। साथ ही कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि, नया टाइटल बताए बिना फिल्म को रिलीज नहीं होने दिया जाएगा।

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मामले की अगली सुनवाई 19 फरवरी को निर्धारित की गई है, जहां निर्माताओं को अपना जवाब और प्रस्तावित नया नाम पेश करना होगा। इस विवाद की शुरुआत फिल्म के टीजर और प्रचार सामग्री जारी होने के बाद हुई थी। फिल्म का टीजर रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर भारी विरोध शुरू हो गया, जहां लोगों ने इसे जातिवादी और अपमानजनक बताया। ब्राह्मण संगठनों ने देश के कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन किए, जिसमें उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में सड़कों पर उतरकर फिल्म के खिलाफ नारेबाजी की गई।

दिल्ली हाईकोर्ट में भी दायर हुई थी याचिका

कई संगठनों ने फिल्म पर प्रतिबंध की मांग की और इसे सांप्रदायिक तनाव फैलाने वाला करार दिया। फिल्म संस्थाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी टाइटल पर आपत्ति जताई, जिसके बाद मेकर्स ने प्रचार सामग्री हटानी शुरू कर दी। पहले दिल्ली हाईकोर्ट में भी इसी तरह की याचिका दायर की गई थी, जहां नेटफ्लिक्स ने कोर्ट को बताया था कि वे टाइटल बदलने पर विचार कर रहे हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचने के बाद स्थिति और सख्त हो गई है।

यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन का एक उदाहरण बन गया है। फिल्म इंडस्ट्री में पहले भी कई बार टाइटल या कंटेंट को लेकर विवाद हुए हैं, लेकिन इस बार ब्राह्मण समुदाय की ओर से संगठित विरोध और कानूनी कार्रवाई ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया।

मनोज बाजपेयी बोले- जल्दबाजी में लिया जा रहा फैसला

मेकर्स का कहना है कि, फिल्म एक फिक्शनल कॉप ड्रामा है और ‘पंडत’ एक कॉलोक्वियल नाम है, जो किसी जाति या धर्म का प्रतिनिधित्व नहीं करता, बल्कि एक किरदार की पहचान है। नीरज पांडे ने पहले बयान जारी कर कहा था कि, वे दर्शकों की भावनाओं का सम्मान करते हैं और प्रचार सामग्री हटाकर फिल्म को पूरी तरह देखने के बाद समझने की अपील की थी।

मनोज बाजपेयी ने भी इस विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि, समाज बहुत संवेदनशील हो गया है और कला को समझने की बजाय जल्दबाजी में फैसला किया जा रहा है। फिलहाल फिल्म की रिलीज पर अनिश्चितता बनी हुई है। नेटफ्लिक्स और मेकर्स को अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करना होगा, जिसमें नया टाइटल सुझाना और एफिडेविट दाखिल करना शामिल है। यदि वे ऐसा करते हैं, तो फिल्म रिलीज हो सकती है, अन्यथा रोक बनी रह सकती है। यह घटना ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट सेंसरशिप और सामाजिक दबाव के बढ़ते प्रभाव को दर्शाती है, जहां कानूनी चुनौतियां रिलीज से पहले ही प्रोजेक्ट को प्रभावित कर रही हैं।

19 फरवरी की सुनवाई पर टिकी निगाहें

ब्राह्मण संगठनों का कहना है कि, वे किसी भी ऐसे कंटेंट का विरोध करेंगे, जो उनकी पहचान को नकारात्मक रूप से चित्रित करता हो। वहीं, फिल्म प्रेमी और अभिव्यक्ति के समर्थक इसे कला पर अंकुश के रूप में देख रहे हैं। आने वाले दिनों में इस मामले का फैसला न केवल इस फिल्म की किस्मत तय करेगा, बल्कि भविष्य में इसी तरह के विवादों के लिए भी एक मिसाल बनेगा।

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती से साफ है कि, न्यायपालिका सामाजिक सद्भाव और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए सजग है, लेकिन साथ ही कला और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी अनुचित दबाव से बचाने की कोशिश कर रही है। फिलहाल सभी की निगाहें 19 फरवरी की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि ‘घूसखोर पंडत’ नया नाम लेकर दर्शकों तक पहुंचेगी या नहीं।

 

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