
साइक्लोस्पोरा इन्फेक्शन: गर्मी और मानसून का मौसम आते ही पेट से जुड़ी बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है। इन दिनों साइक्लोस्पोरा इन्फेक्शन नाम की एक बीमारी तेजी से पैर पसार रही है, जिसे मेडिकल भाषा में साइक्लोस्पोरियासिस कहते हैं। यह बीमारी भले ही आम लोगों के बीच ज्यादा चर्चित न हो, लेकिन हाल के दिनों में यह एक बार फिर सुर्खियों में है। आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर यह बीमारी है क्या, यह कैसे फैलती है, इसके लक्षण क्या हैं और इससे बचाव के क्या उपाय हैं।
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साइक्लोस्पोरा इन्फेक्शन क्या है?
साइक्लोस्पोरियासिस आंतों से जुड़ा एक संक्रमण है, जो साइक्लोस्पोरा कैयेटेनेंसिस नाम के एक सूक्ष्म परजीवी की वजह से होता है। यह परजीवी इतना छोटा होता है कि, इसे न तो देखा जा सकता है, न सूंघा जा सकता है और न ही खाने में इसका स्वाद पता चलता है। इसे सिर्फ माइक्रोस्कोप के जरिए ही देखा और पहचाना जा सकता है। यह परजीवी सीधे इंसान की छोटी आंत को अपना निशाना बनाता है। अगर समय पर इलाज न किया जाए तो इन्सान पेट की समस्या से लंबे समय तक पीड़ित रह सकता है।
यह बीमारी कैसे फैलती है?
साइक्लोस्पोरा इन्फेक्शन के फैलने का सबसे बड़ा जरिया दूषित खाना और पानी है। जब कोई व्यक्ति ऐसा खाना या पानी खाते-पीते हैं जिसमें यह परजीवी मौजूद होता है, तो वह इस संक्रमण की चपेट में आ जाता है। हालांकि इस बीमारी के एक इंसान से दूसरे इंसान में सीधे तौर पर फैलने की संभावना बेहद कम होती है, यानी अगर आपके आसपास कोई संक्रमित व्यक्ति है, तो ऐसा नहीं है कि आप भी इसके संपर्क में आ जाएंगे।
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ज्यादातर मामलों में यह परजीवी ताजी सब्जियों और फलों के जरिए फैलता है। अमेरिका में हुए पिछले प्रकोपों में धनिया, सलाद मिक्स, तुलसी, स्नो पीज़ और रसभरी जैसी आयातित ताजी चीजों से फैलने की आशंका जाहिर की गई। असल में जब खेतों की सिंचाई दूषित पानी से की जाती है या फिर फसल तोड़ने और उसे संभालने के दौरान साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखा जाता, तो परजीवी सब्जियों और फलों तक पहुंच जाता है।
यही वजह है कि, बिना धोए कच्ची सब्जियां और फल नहीं खाना चाहिए, नहीं तो इस बीमारी के फैलने का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा जो लोग विदेश यात्रा करते हैं, खासकर उष्णकटिबंधीय या उपोष्णकटिबंधीय इलाकों में, उनमें भी इस संक्रमण का खतरा ज्यादा रहता है।
कितनी खतरनाक है यह बीमारी?
राहत की बात यह है कि, साइक्लोस्पोरा इन्फेक्शन आमतौर पर जानलेवा नहीं होता, लेकिन इसके लक्षण काफी परेशान करने वाले हो सकते हैं, जिनमें कई दिनों से लेकर एक महीने तक चलने वाला दस्त शामिल है। हालांकि, जिन लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) कमजोर होती है, उनके लिए यह संक्रमण ज्यादा गंभीर साबित हो सकता है। ऐसे लोगों को अगर साइक्लोस्पोरियासिस होने का शक हो, तो जल्द से जल्द डॉक्टर से संपर्क करना बेहद जरूरी है, ताकि समय रहते सही जांच और एंटीबायोटिक इलाज शुरू किया जा सके।
यह बीमारी आमतौर पर गर्मी के महीनों में ज्यादा देखने को मिलती है, लेकिन हाल के दिनों में कई देशों में इसके मामलों में अचानक बढ़ोतरी देखी गई है, जिसकी वजह से स्वास्थ्य अधिकारी इसकी लगातार निगरानी कर रहे हैं।
साइक्लोस्पोरा इन्फेक्शन के प्रमुख लक्षण
अगर कोई व्यक्ति इस परजीवी की चपेट में आता है, तो कुछ खास लक्षण उसके शरीर में दिखने लगते हैं। इनमें सबसे आम और प्रमुख लक्षण है पानी जैसा दस्त, जो कई बार बेहद तेज और अचानक भी हो सकता है। इसके अलावा जो अन्य लक्षण देखने को मिल सकते हैं, उनमें शामिल हैं:
- भूख न लगना
- वजन का अचानक कम होना
- पेट में सूजन या भारीपन महसूस होना
- पेट में गैस बनना
- पेट में मरोड़ या ऐंठन
- जी मिचलाना
- उल्टी होना
- शरीर और मांसपेशियों में दर्द
- हल्का बुखार
- लगातार थकान महसूस होना
खास बात ये है कि, हर संक्रमित व्यक्ति में लक्षण तुरंत नहीं दिखते। आमतौर पर यह लक्षण दूषित खाना या पानी खाने-पीने के करीब एक हफ्ते बाद दिखना शुरू होते हैं, हालांकि, कई मामलों में यह सिर्फ दो दिन में भी सामने आ सकते हैं, तो कहीं इसमें दो हफ्ते तक का समय भी लग सकता है। सबसे खास बात यह है कि, लक्षण एक बार ठीक होकर दोबारा भी लौट सकते हैं यानी बीच में आराम मिलने के बाद फिर से दस्त और पेट दर्द शुरू हो सकता है।
बीमारी की पहचान और इलाज
साइक्लोस्पोरा इन्फेक्शन की पहचान करना डॉक्टरों के लिए भी कई बार चुनौतीपूर्ण होता है। इसकी जांच के लिए मरीज के मल का माइक्रोस्कोप से लैब में परीक्षण किया जाता है, ताकि परजीवी की मौजूदगी की पुष्टि हो सके। चूंकि, यह परजीवी पकड़ में आसानी से नहीं आता, इसलिए कई बार डॉक्टर एक से ज्यादा दिनों में लगातार कई मल के नमूने मंगवा सकते हैं।
इलाज की बात करें तो इसके लिए ट्राइमेथोप्रिम-सल्फामेथोक्साजोल नाम की एक कॉम्बिनेशन एंटीबायोटिक दवा दी जाती है, जिसे बैक्ट्रिम, सेप्ट्रा या कोट्रिम के नाम से भी जाना जाता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि, इस बीमारी के लिए कोई भी ओवर-द-काउंटर यानी बिना डॉक्टरी पर्ची के मिलने वाली दवा कारगर नहीं होती, इसलिए बिना डॉक्टर की सलाह के खुद से कोई भी दवा लेने से बचना चाहिए। दस्त के दौरान शरीर में पानी की कमी न हो, इसके लिए ज्यादा से ज्यादा तरल पदार्थ लेते रहना और आराम करना बेहद जरूरी है।
बचाव के उपाय
चूंकि, इस बीमारी से बचने का कोई टीका फिलहाल उपलब्ध नहीं है, इसलिए सावधानी बरतना ही सबसे बेहतर तरीका है। इससे बचाव के लिए कुछ आसान लेकिन जरूरी उपाय अपनाए जा सकते हैं।
- दूषित खाने-पीने से बचें: जो भी खाना या पानी मल से दूषित होने की आशंका हो, उससे दूरी बनाकर रखें।
- सब्जियां और फल अच्छी तरह धोएं: कच्ची सब्जियों और फलों को खाने से पहले अच्छी तरह धोना और जहां संभव हो, उन्हें छीलकर खाना बेहद जरूरी है।
- यात्रा के दौरान सतर्क रहें: जिन देशों में पानी की सप्लाई असुरक्षित मानी जाती है, वहां उबला पानी ही पिएं।
- हाथों की सफाई का रखें ध्यान: खाना बनाने और खाने से पहले साबुन से हाथ जरूर धोएं।
- पैकेज्ड और कटे हुए फल-सब्जियों को लेकर सतर्कता: बाजार से खरीदे गए पहले से कटे फल-सब्जियों या सलाद मिक्स का इस्तेमाल करते समय अतिरिक्त सावधानी बरतें।
साइक्लोस्पोरा इन्फेक्शन भले ही जानलेवा बीमारी न हो, लेकिन इसके लक्षण हफ्तों तक परेशान कर सकते हैं और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर सकते हैं। सही जानकारी, साफ-सफाई का ध्यान और खान-पान में सावधानी बरतकर इस बीमारी से आसानी से बचा जा सकता है। अगर किसी को लंबे समय तक दस्त या पेट से जुड़ी समस्या बनी रहे, तो लापरवाही न बरतते हुए तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए, ताकि समय रहते सही इलाज शुरू हो सके।
नोट: यह खबर सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए कृपया डॉक्टर की सलाह जरूर लें।)
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