\n\n\n\n\n \n

हवा में लटकी तोप, पलक झपकते पहाड़ों पर पहुंची: चिनूक ने दिखाया दम

  • ब्रह्मास्त्र कोर ने चिनूक हेलीकॉप्टरों से किया अंडरस्लंग ट्रेनिंग का सफल अभ्यास

  • आर्टिलरी फायरपावर और एयर मोबिलिटी का दिखा दमखम

नई दिल्ली। भारतीय सेना की पूर्वी कमान (ईस्टर्न कमांड) के अंतर्गत आने वाली ब्रह्मास्त्र कोर ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण सैन्य अभ्यास को सफलतापूर्वक पूरा किया। इस अभ्यास में चिनूक हेलीकॉप्टरों की मदद से अल्ट्रा लाइट होवित्जर रेजिमेंट की ‘अंडरस्लंग’ ट्रेनिंग की गई, जिसमें भारी तोपखाने की मारक क्षमता को हवाई गतिशीलता के साथ जोड़कर सेना ने अपनी युद्धक तैयारियों का प्रदर्शन किया। रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, यह क्षमता खासतौर पर दुर्गम और पहाड़ी इलाकों में तेजी से सैन्य ताकत को ऑपरेशनल क्षेत्र तक पहुंचाने में बेहद कारगर साबित होती है, जिससे सेना की पहुंच, फुर्ती और युद्धक तैयारी में उल्लेखनीय सुधार होता है।

इसे भी पढ़ें- भारतीय सेना को मिलेगी जैवलिन एंटी-टैंक मिसाइल, समझौते पर हस्ताक्षर

पहाड़ी इलाकों में मारक क्षमता के प्रदर्शन पर रहा जोर

सेना सूत्रों के हवाले से बताया गया कि, इस अभ्यास का मुख्य मकसद दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में सेना की मारक क्षमता और हवाई गतिशीलता, यानी एयर मोबिलिटी, का प्रदर्शन करना था। ऐसे इलाकों में जहां सड़क मार्ग से भारी हथियारों और उपकरणों को पहुंचाना बेहद मुश्किल और समय लेने वाला काम होता है।

Chinook helicopters.

वहां हेलीकॉप्टरों के जरिए हथियारों की तेज तैनाती रणनीतिक रूप से बड़ी अहमियत रखती है। इसी क्षमता का प्रदर्शन करते हुए सेना ने यह साबित करने की कोशिश की कि विषम भौगोलिक परिस्थितियों में भी वह अपनी युद्धक ताकत को बेहद कम समय में जरूरत की जगह तक पहुंचा सकती है।

अंडरस्लंग तकनीक से हुआ तोप का परिवहन

इस अभ्यास की सबसे बड़ी खासियत रही चिनूक हेलीकॉप्टर की ‘अंडरस्लंग’ क्षमता का प्रदर्शन। इस तकनीक के तहत भारी-भरकम होवित्जर तोप को हेलीकॉप्टर के नीचे हवा में लटकाकर बेहद कम समय में तय ऑपरेशनल क्षेत्र तक पहुंचाया गया। यह तरीका खासतौर पर उन इलाकों के लिए कारगर है, जहां जमीनी रास्ते से भारी उपकरण पहुंचाना संभव नहीं होता या फिर उसमें काफी वक्त लग जाता है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि, इस तरह की तकनीक से सामरिक रूप से संवेदनशील इलाकों में सैन्य शक्ति को तुरंत भेजने, सेना की पहुंच बढ़ाने और युद्ध की तैयारियों को और मजबूत करने में बड़ी मदद मिलती है।

चिनूक हेलीकॉप्टर की तकनीकी खूबियां

चिनूक हेलीकॉप्टर को भारतीय सेना के सबसे भरोसेमंद और ताकतवर परिवहन हेलीकॉप्टरों में गिना जाता है। आम हेलीकॉप्टरों से अलग इसमें पीछे की तरफ लगने वाले पारंपरिक टेल रोटर के बजाय दो बड़े रोटर लगे होते हैं, जो एक-दूसरे के आमने-सामने घूमते हैं। इसे टेंडम रोटर प्रणाली कहा जाता है, जो हेलीकॉप्टर को बेहतरीन स्थिरता और अतिरिक्त शक्ति प्रदान करती है, खासकर तब जब इसे भारी वजन उठाकर उड़ान भरनी होती है।

भार वहन क्षमता के मामले में चिनूक हेलीकॉप्टर बेहद सक्षम माना जाता है। यह अपने साथ भारी मात्रा में सैन्य साजो-सामान ले जाने के अलावा एक साथ अधिकतम 55 सशस्त्र सैनिकों को भी एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचा सकता है। इसकी अधिकतम रफ्तार करीब 315 किलोमीटर प्रति घंटा यानी 170 नॉट के आसपास है, जो इसे बेहद तेज गति से जरूरी सामान और सैनिकों को ऑपरेशनल क्षेत्र तक पहुंचाने में सक्षम बनाती है।

इसकी एक और बड़ी खासियत है इसकी ऊंचाई पर उड़ान भरने की क्षमता। यह हेलीकॉप्टर करीब 20,000 फीट तक की ऊंचाई वाले पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में भी आसानी से उड़ान भर सकता है, जो इसे लद्दाख जैसे अत्यंत ऊंचाई वाले और चुनौतीपूर्ण भौगोलिक क्षेत्रों के लिए बेहद उपयुक्त बनाता है। इसके अतिरिक्त, चिनूक में तीन बाहरी कार्गो हुक भी लगे होते हैं, जिनकी मदद से यह भारी तोपों, जैसे एम777 होवित्जर, या फिर सैन्य वाहनों को हवा में लटकाकर बेहद सटीकता के साथ एक जगह से दूसरी जगह पहुंचा सकता है।

रणनीतिक लिहाज से बेहद अहम है चिनूक

रक्षा जानकारों के मुताबिक, चिनूक हेलीकॉप्टर भारतीय सेना के लिए रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ है। खासकर लद्दाख और पूर्वोत्तर भारत जैसे ऊंचाई वाले और भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में। इन इलाकों में सैनिकों, जरूरी रसद सामग्री और भारी सैन्य उपकरणों, जैसे कि एम777 अल्ट्रा-लाइट होवित्जर तोप, की तेजी से तैनाती के लिए यह हेलीकॉप्टर बेहद कारगर साबित हुआ है। सीमावर्ती इलाकों में जहां सड़क संपर्क सीमित होता है या फिर मौसम की वजह से जमीनी आवागमन मुश्किल हो जाता है। वहां चिनूक जैसे हेलीकॉप्टर सेना के लिए जीवनरेखा का काम करते हैं।

युद्ध के अलावा राहत-बचाव कार्यों में भी निभाता है भूमिका

चिनूक हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल केवल युद्धक अभियानों तक सीमित नहीं है। यह प्राकृतिक आपदाओं के समय राहत सामग्री पहुंचाने और मानवीय सहायता व बचाव अभियानों में भी अहम भूमिका निभाता है।

Chinook helicopters.

बाढ़, भूकंप या भूस्खलन जैसी आपात स्थितियों में जब सड़क मार्ग बाधित हो जाते हैं, तब चिनूक जैसे हेलीकॉप्टर राहत सामग्री, दवाइयां और अन्य जरूरी सामान प्रभावित इलाकों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा फंसे हुए लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने में भी इसका इस्तेमाल किया जाता रहा है।

ब्रह्मास्त्र कोर की तैयारियों का हिस्सा

पूर्वी कमान के अंतर्गत आने वाली ब्रह्मास्त्र कोर द्वारा किया गया यह अभ्यास सेना की समग्र युद्धक तैयारियों का एक अहम हिस्सा माना जा रहा है। सैन्य सूत्रों के मुताबिक, इस तरह के नियमित अभ्यासों के जरिए सेना यह सुनिश्चित करती है कि जरूरत पड़ने पर वह किसी भी दुर्गम इलाके में बेहद कम समय में अपनी पूरी ताकत के साथ मौजूद रह सके। अल्ट्रा लाइट होवित्जर रेजिमेंट और चिनूक हेलीकॉप्टरों के इस संयुक्त अभ्यास को सेना की एयर मोबिलिटी क्षमता को और मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक युद्ध की जरूरतों को देखते हुए इस तरह की क्षमताएं किसी भी सेना के लिए बेहद अहम होती जा रही हैं। खासकर उन सीमावर्ती क्षेत्रों में जहां भौगोलिक चुनौतियां सबसे ज्यादा होती हैं, वहां हवाई मार्ग से भारी हथियारों की तेज आवाजाही सैन्य रणनीति का एक अहम हिस्सा बन चुकी है। ब्रह्मास्त्र कोर द्वारा किया गया यह ताजा अभ्यास इसी दिशा में भारतीय सेना की बढ़ती तैयारियों और क्षमताओं का एक प्रमाण माना जा रहा है।

 

इसे भी पढ़ें- लखनऊ के स्टार्टअप ने तैयार किया घातक ड्रोन, भारतीय सेना से मिला पहला ऑर्डर

Related Articles

Back to top button