
नई दिल्ली। भारतीय सेना की लड़ाकू क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल हुई है। स्वदेशी रक्षा कंपनी SMPP ने भारतीय सेना को 106 टर्बोजेट इंजन से संचालित ‘कामिकाजे’ ड्रोन सौंप दिए हैं। इन ड्रोन्स को ‘पीसकीपर (अग्निवेग)’ नामदिया गया है। यह डिलीवरी भारत की स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता और आधुनिक अनमैन्ड कॉम्बैट सिस्टम के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। कंपनी ने कुल 100 ऑपरेशनल ड्रोन और 6 ट्रेनिंग ड्रोन की डिलीवरी पूरी की है।
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ये ड्रोन 180 किलोमीटर तक की रेंज में लक्ष्य पर हमला करने में सक्षम हैं। उनकी अधिकतम गति 450 किलोमीटर प्रति घंटा है, जो दुनिया के सबसे तेज उड़ने वाले पक्षी पेरेग्रिन फाल्कन जो कि 320 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से उड़ता है’ से भी ज्यादा है। इन ड्रोन की सबसे खास बात यह है कि इन पर न तो जैमिंग का असर होता है और न ही स्पूफिंग के जरिए इन्हें भटकाया जा सकता है।
क्या हैं कामिकाजे ड्रोन
कामिकाजे ड्रोन उन्हें कहा जाता है जो लक्ष्य पर हमला करते समय खुद भी नष्ट हो जाते हैं। इन्हें ‘लॉइटरिंग म्यूनिशन’ भी कहते हैं। यह नाम द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी पायलटों द्वारा किए गए आत्मघाती हमलों से लिया गया है, जिन्हें ‘कामिकाजे’ कहा जाता था। वे दुश्मन के जहाजों पर अपने विमान लेकर टकरा जाते थे।

आधुनिक कामिकाजे ड्रोन पूरी तरह अलग हैं। इन्हें लॉन्च करने के बाद ये हवा में काफी देर तक मंडराते रहते हैं, अपने कैमरे और एडवांस्ड सेंसर्स की मदद से लक्ष्य की तलाश करते हैं। लक्ष्य मिलने पर वे तेजी से उसकी ओर बढ़ते हैं और टकराते ही विस्फोट कर देते हैं। इनका सबसे बड़ा फायदा यह है कि ये अपेक्षाकृत सस्ते, बेहद सटीक और मानव सैनिकों की जान को सीधे खतरे में डाले बिना हमला करने में सक्षम हैं। ये टैंक, रडार सिस्टम, तोपखाने, कमांड सेंटर, लॉजिस्टिक्स हब और अन्य रणनीतिक ठिकानों को निशाना बना सकते हैं।
अग्निवेग की खूबियां
पीसकीपर (अग्निवेग)’ ड्रोन पूरी तरह ऑटोनॉमस प्रिसिजन स्ट्राइक मिशन अंजाम देने की क्षमता रखते हैं यानी एक बार लक्ष्य तय हो जाने के बाद ये बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के मिशन पूरा कर सकते हैं। ट्रायल के दौरान इन ड्रोन्स ने जैमिंग और स्पूफिंग वाले कठिन वातावरण में भी बेहतरीन प्रदर्शन किया और 5 मीटर से भी कम का सर्कुलर एरर प्रोबेबल हासिल किया। मतलब साफ है ये ड्रोन अपने लक्ष्य के बेहद करीब जाकर अत्यंत सटीक हमला कर सकते हैं। विस्फोट का दायरा केवल 5 मीटर तक सीमित है, जिससे लक्ष्य के आसपास सिविलियन क्षेत्रों या अन्य संरचनाओं को न्यूनतम नुकसान पहुंचता है। यह आधुनिक युद्ध की नैतिकता और सटीकता दोनों को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है।
6 महीने में तैयार हुए ड्रोन
SMPP की यह उपलब्धि इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि कंपनी ने मात्र 6 महीने के अंदर ये ड्रोन तैयार करके सेना को सौंप दिए। कंपनी के सीईओ और निदेशक आशीष कंसल ने कहा, केवल छह महीने के भीतर भारतीय सेना को इन ड्रोन्स की आपूर्ति करना हमारी टीम की बड़ी उपलब्धि है। आधुनिक युद्ध अब सटीकता, स्वायत्तता और कॉस्ट-इफेक्टिवनेस पर आधारित हो रहे हैं। ऐसे सिस्टम युद्धक्षेत्र में फोर्स मल्टीप्लायर का काम करते हैं।
अग्निवेग ड्रोन में 75 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। कंपनी ने बेलारूसी फर्म केबी इंडेला के सहयोग से इन्हें विकसित किया है, लेकिन अधिकांश क्रिटिकल टेक्नोलॉजी और इंटीग्रेशन भारत में ही हुआ है। SMPP ने सेना को अग्निवेग के और अधिक एडवांस्ड वर्जन देने की पेशकश भी की है।
कई मोर्चों पर गेम चेंजर
भारतीय सेना के लिए ये ड्रोन कई मोर्चों पर गेम चेंजर साबित हो सकते हैं। एलएसी पर चीन के साथ तनाव हो या एलओसी पर पाकिस्तान से होने वाली घुसपैठ और आतंकवादी गतिविधियों के खिलाफ ये बेहद उपयोगी होंगे। इनकी लंबी लॉइटरिंग क्षमता दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा देने में मदद करेगी। टर्बोजेट इंजन की वजह से इनकी स्पीड और रेंज दोनों प्रभावशाली हैं।
आटोमेटिक होने की वजह से कमांड सेंटर पर दबाव भी कम होगा। साथ ही, सैनिकों को सीधे खतरे में डाले बिना दुश्मन के मजबूत ठिकानों को नष्ट करने की क्षमता इन ड्रोन्स को और भी महत्वपूर्ण बनाती है।
युद्ध मे निर्णायक भूमिका निभाते हैं ड्रोन
आज के युद्ध में ड्रोन और अनमैन्ड सिस्टम की भूमिका निर्णायक हो गई है। रूस-यूक्रेन युद्ध और हाल के मध्य पूर्व संघर्षों ने साबित कर दिया है कि सस्ते, सटीक और स्वायत्त लॉइटरिंग म्यूनिशन पारंपरिक हथियारों से बेहतर परिणाम दे सकते हैं। भारत अब इस दौड़ में पीछे नहीं है। ‘अग्निवेग’ जैसे प्रोजेक्ट ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को नई ऊंचाई दे रहे हैं।

SMPP का लक्ष्य अगले चरण में और ज्यादा स्वदेशी, लंबी रेंज वाले और एआई आधारित वर्जन विकसित करना है। कंपनी एडवांस्ड सेंसर्स, बेहतर एआई टारगेट रिकग्निशन और स्वार्म टेक्नोलॉजी एक साथ कई ड्रोन्स का समन्वय पर काम कर रही है। यदि ये प्रयास सफल रहे तो भारतीय सेना न सिर्फ अपनी जरूरतें पूरी कर सकेगी बल्कि अन्य मित्र देशों को भी इन ड्रोन्स की सप्लाई कर सकेगी।
रक्षा क्षेत्र में मील का पत्थर
106 ‘पीसकीपर (अग्निवेग)’ कामिकाजे ड्रोन्स की डिलीवरी भारतीय रक्षा क्षेत्र के लिए एक मील का पत्थर है। यह दर्शाता है कि भारतीय कंपनियां अब विश्व स्तर की तकनीक विकसित करने और समय पर डिलीवर करने में सक्षम हैं। स्वदेशी उत्पादन से न सिर्फ विदेशी मुद्रा की बचत होगी बल्कि युद्ध के समय सप्लाई चेन पर निर्भरता भी कम होगी। भारतीय सेना अब अधिक सटीक, तेज और घातक हमलों की क्षमता हासिल कर चुकी है। ‘अग्निवेग’ न सिर्फ दुश्मन के लिए चिंता का विषय बनेगा बल्कि भारत की रक्षा तैयारियों को नई दिशा भी देगा।
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