
नई दिल्ली। भारत निर्वाचन आयोग ने सोमवार देर रात सुप्रीम कोर्ट में एक विस्तृत संयुक्त हलफनामा दाखिल किया है। यह हलफनामा मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू व विवेक जोशी की ओर से दायर हुआ है। करीब 250 पन्नों के इस दस्तावेज में आयोग ने कहा है कि, CEC के कामकाज में रुकावट डालने की कोई भी कोशिश कानून के खिलाफ होगी। आयोग के मुताबिक, मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से उसी तरह और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है।
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कहा- सुनवाई लायक नहीं है याचिका
आयोग ने शीर्ष अदालत से कहा है कि ज्ञानेश कुमार को काम करने से रोकने की मांग वाली याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। इसी हलफनामे में चुनाव निकाय ने अपनी निर्णय लेने की प्रक्रिया का बचाव किया है। उसने मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) के संचालन को भी सही ठहराया है।

CEC के कामकाज को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं में लोकसभा में विपक्ष के नेता और ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के अन्य नेता शामिल हैं। इनके अलावा राकेश कुमार सिंह और वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने भी याचिकाएं दायर की हैं।
मीडिया रिपोर्ट को सबूत न माना जाए
एक रिपोर्ट के मुताबिक, हलफनामे में कहा गया है कि, आयोग के भीतर आपसी मतभेदों और CEC के कथित एकतरफा या तानाशाहीपूर्ण कामकाज को लेकर छपी मीडिया रिपोर्टों को अदालत में सबूत नहीं माना जा सकता। आयोग का तर्क है कि, केवल ऐसी रिपोर्टों के आधार पर दायर याचिकाओं को सुनवाई के योग्य भी नहीं समझा जाना चाहिए।
हलफनामे के अनुसार CEC और दोनों निर्वाचन आयुक्त एक ही राय रखते हैं। आयोग ने यह भी कहा है कि, उसने किसी समाचार एजेंसी को कोई आंतरिक नोट या फाइल न तो जारी की है और न ही ऐसा करने के लिए किसी को अधिकृत किया है।
मतभेद हुआ, तो बहुमत से होगा फैसला
आयोग ने बताया कि, अगर उसके सदस्यों के बीच कभी कोई मतभेद होता है, तो निर्णय मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023′ की धारा 18 के मुताबिक होगा। इस प्रावधान के तहत आयोग पहले सर्वसम्मति से फैसला लेने का प्रयास करता है, जिन मामलों पर सदस्यों के बीच राय अलग हो, उन पर फैसला बहुमत के आधार पर होता है।
हलफनामे में यह भी स्पष्ट किया गया है कि, निर्णय की प्रक्रिया के दौरान सदस्यों के बीच या अधिकारियों के साथ साझा किए गए सुझाव, टिप्पणियां और सवाल अपने आप में आयोग का कोई निर्णय नहीं माने जाएंगे। 2023 के अधिनियम की धारा 18 के तहत वे निर्णय की श्रेणी में नहीं आते।
अनुच्छेद 324(5) का दिया हवाला
CEC को काम करने से रोकने की मांग पर आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 324(5) का हवाला दिया है। इसमें प्रावधान है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरीके से और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिनसे सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को हटाया जाता है।
‘मोरूंग एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, हलफनामे में कहा गया है कि, रिट याचिका में CEC को रोकने का आदेश देने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती। आयोग का तर्क है कि, इस तरह की कोई भी रोक 2023 अधिनियम की धारा 18 के खिलाफ होगी। यह अधिनियम चुनाव निकाय के कामकाज के संचालन को नियंत्रित करता है।
आयोग के अनुसार CEC को रोकने वाला कोई भी आदेश वैधानिक ढांचे के तहत इस संवैधानिक निकाय के कामकाज और निर्णय प्रक्रिया में बाधा डालेगा। हलफनामे में कहा गया है कि, ऐसी कोई प्रार्थना स्वीकार्य नहीं होगी, क्योंकि वह धारा 18 के प्रावधानों के विपरीत है।
तीनों सदस्यों ने दी सर्वसम्मति से मंजूरी
आयोग ने बताया कि, मौजूदा जवाबी हलफनामे को उसके तीनों सदस्यों, यानी मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों, ने सर्वसम्मति से मंजूरी दी है। SIR को लेकर आयोग का कहना है कि, 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को प्रक्रिया शुरू करने वाले उसके आदेश सर्वसम्मति से जारी हुए थे। आयोग के अनुसार ये आदेश संविधान के अनुच्छेद 324 और लागू कानूनी प्रावधानों के अनुरूप थे।
फॉर्म-6 में कोई बदलाव नहीं
आयोग ने उन आरोपों को खारिज किया है जिनमें कहा गया था कि, उसने ‘फॉर्म 6’ में अनुचित तरीके से बदलाव किया। आयोग के मुताबिक मतदाता सूची में नाम जोड़ने के आवेदन के साथ दिया जाने वाला घोषणा-पत्र ‘निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960’ के तहत आने वाले वैधानिक फॉर्म 6 का हिस्सा नहीं है। यह SIR आदेशों के अंतर्गत एक अलग दस्तावेज है।
आयोग ने बताया कि, इस संशोधित घोषणा-पत्र में आवेदक अपने, अपने माता-पिता या दादा-दादी/नाना-नानी के संबंध को पुरानी मतदाता सूचियों से जोड़ने का विवरण दे सकते हैं। इससे ‘दावे और आपत्तियां’ दाखिल करने के चरण में अतिरिक्त दस्तावेज जमा करने की जरूरत खत्म हो सकती है।
आयोग का यह भी कहना है कि, अनमैप्ड मतदाताओं को सुनवाई में शामिल होने की जरूरत नहीं है। ECINet के हवाले से उसने स्पष्ट किया कि ERO के आदेश के बिना मतदाता सूची में किसी का नाम न जोड़ा जा सकता है, न हटाया जा सकता है।
27 मई 2026 के फैसले का जिक्र
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के 27 मई 2026 के फैसले का भी हवाला दिया है। उस फैसले ने SIR प्रक्रिया के लिए तय दस्तावेज़ीकरण ढांचे को सही ठहराया था। आयोग के अनुसार उस निर्णय में ECI के इस अधिकार को मान्यता मिली कि, वह एक उचित ढांचा तय कर सकता है, बशर्ते उसका उस उद्देश्य से तार्किक संबंध हो जिसे हासिल करना है।
घर-घर पहुंच रहे बीएलओ
हलफनामे में कहा गया है कि SIR प्रक्रिया लागू कानून के अनुसार चलाई जा रही है। मतदाताओं की सुविधा के लिए कई कदम उठाए गए हैं, जिनमें बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) का उनके घर जाना भी शामिल है। ये अधिकारी उन लोगों से दस्तावेज इकट्ठा कर रहे हैं जिन्हें विसंगतियों या पिछली मतदाता सूचियों से जुड़ाव न होने के कारण नोटिस मिले हैं। अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट पर है कि वह आयोग के इस हलफनामे और याचिकाकर्ताओं की दलीलों पर क्या रुख अपनाता है।
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