16 एजेंसियां, 22 मंजूरियां, ‘परमिट राज’ में उलझी लीनियर परियोजनाएं, मुख्य सचिवों के सम्मेलन में उठेगा मुद्दा

नई दिल्ली। देश में सड़क, रेलवे और अन्य लीनियर इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की धीमी रफ्तार ने केंद्र सरकार की चिंता बढ़ा दी है। जमीन अधिग्रहण, पर्यावरण मंजूरी, राज्यों की अनुमतियों और यूटिलिटी शिफ्टिंग में हो रही देरी से परियोजनाएं तय समय पर पूरी नहीं हो पा रही हैं। इसका सीधा असर लागत पर पड़ रहा है, जो लगातार बढ़ती जा रही है। केंद्र ने यह चिंता अब खुलकर राज्यों के सामने रख दी है।

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राज्यों के सामने साझा की गई चिंता

सूत्रों का कहना है कि, पिछले महीने केंद्र सरकार ने राज्यों को आगाह किया था कि, राष्ट्रीय लीनियर इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की गति पर गंभीर असर पड़ रहा है। मुख्य सचिवों के छठे राष्ट्रीय सम्मेलन से पहले ये चिंताएं राज्यों के साथ साझा की गईं। सम्मेलन में ‘लीनियर इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में तेजी लाने’ के विषय पर चर्चा होगी। माना जा रहा है कि, केंद्र इस मंच के जरिए राज्यों से सहयोग बढ़ाने की अपेक्षा रखता है।

30 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य पर असर

दरअसल, भारत की 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य काफी हद तक केंद्रीय क्षेत्र की लीनियर इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर निर्भर है।

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‘प्रगति’ प्लेटफॉर्म के जरिए की गई समीक्षा बताती है कि, कुल देरी का 75 प्रतिशत हिस्सा ‘निर्माण-पूर्व’ चरण के चार कारणों से जुड़ा है। ये कारण हैं जमीन अधिग्रहण और राइट ऑफ वे (काम के लिए रास्ता मिलना), पर्यावरण संबंधी मंजूरी, यूटिलिटी शिफ्टिंग और राज्य सरकारों की अनुमतियां यानी असली अड़चन निर्माण में नहीं, उससे पहले की प्रक्रियाओं में है।

राज्यों के साथ साझा किए गए अहम बिंदु

केंद्र ने राज्यों को जो आंकड़े दिखाए, वे स्थिति की गंभीरता बताते हैं

  • निर्माण-पूर्व चरणों में देरी के कारण केंद्रीय लीनियर परियोजनाओं की लागत 31 लाख करोड़ रुपये की मूल लागत से 3 लाख करोड़ रुपये बढ़ चुकी है।
  • 85 लाख करोड़ रुपये मूल्य की 3,300 से अधिक परियोजनाओं की ‘प्रगति’ समीक्षा में भूमि अधिग्रहण सबसे बड़ी समस्या निकला। कुल समस्याओं में इसकी हिस्सेदारी 35 प्रतिशत है।
  • वन मंजूरी 150 दिनों में मिल जानी चाहिए, लेकिन इसमें 500 दिन से अधिक लग रहे हैं।
  • वन्यजीव मंजूरी में 1.5 से 3.5 साल तक लग सकते हैं, जबकि पर्यावरण मंजूरी में 180 दिन से लेकर 2.5 साल तक का समय लगता है।
  • यूटिलिटी शिफ्टिंग पूरी होने में औसतन 500 से 600 दिन लग रहे हैं, जबकि अपेक्षा 200 से 300 दिन की थी।
  • ‘सिंगल विंडो’ व्यवस्था न होने से डेवलपर्स को 16 अलग-अलग राज्य एजेंसियों से 22 तरह की मंजूरियां या परमिट लेने पड़ते हैं।

भूमि अधिग्रहण में गड़बड़ी सबसे बड़ी वजह

परियोजनाओं में देरी का सबसे बड़ा कारण जमीन अधिग्रहण है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए राज्यों की भूमि अधिग्रहण दक्षता की रैंकिंग तैयार की है। इसमें हरियाणा 75.8 अंकों के साथ शीर्ष पर है। उसके बाद मध्य प्रदेश (66.2), राजस्थान (65.9) और आंध्र प्रदेश (63.8) का नंबर आता है। छत्तीसगढ़ और केरल 63 अंकों पर हैं।

हैरानी की बात यह है कि, आर्थिक रूप से मजबूत माने जाने वाले राज्य इस सूची में सबसे नीचे हैं। तमिलनाडु को 45.4, महाराष्ट्र को 43.6 और गुजरात को सिर्फ 30.5 अंक मिले हैं। यह रैंकिंग बताती है कि, जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में राज्यों का प्रदर्शन काफी असमान है, जिन राज्यों में यह प्रक्रिया धीमी है, वहां परियोजनाएं सबसे ज्यादा अटक रही हैं।

ग्रीन टेप: मंजूरी मिलने में हो रही देरी

पर्यावरण मंत्रालय के ‘परिवेश 2.0’ के विश्लेषण से पता चलता है कि, वन, वन्यजीव और पर्यावरण संबंधी मंजूरियां हासिल करने में राज्य और केंद्रीय एजेंसियों को मिलाकर कुल 2 से 4 साल लग जाते हैं।

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हालांकि, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने अपने स्तर पर सुधार किए हैं। मंत्रालय ने पर्यावरण मंजूरी में लगने वाला समय 105 दिनों से घटाकर 61 दिन कर दिया है। इसके बावजूद सड़कों और रेलवे लाइनों जैसी लीनियर परियोजनाओं को मंजूरी पाने में अब भी काफी देरी झेलनी पड़ रही है। साफ है कि, केंद्र के स्तर पर सुधार पर्याप्त नहीं हैं, जब तक राज्य स्तर की प्रक्रियाएं भी तेज न हों।

 यूटिलिटी शिफ्टिंग में अनुमति का इंतजार

पानी और सीवर की पाइपलाइनों, बिजली के तारों और टावरों जैसी यूटिलिटी को हटाने का काम भी बड़ी समस्या बना हुआ है। इसमें औसतन 500 से 600 दिन लग रहे हैं, जबकि इसके लिए 200 से 300 दिन का समय पर्याप्त माना गया था। यानी तय अवधि से दोगुने से भी ज्यादा वक्त लग रहा है।

इसके अलावा प्रोजेक्ट साइटों, निर्माण सामग्री और उपकरणों के लिए राज्य सरकारों से ढेरों अनुमतियां लेनी पड़ती हैं। यह भी परियोजनाओं के लिए एक और बड़ी अड़चन है। 16 एजेंसियों से 22 तरह की मंजूरियों की यह व्यवस्था डेवलपर्स के लिए ‘परमिट राज’ जैसी स्थिति बना देती है।

 बाधाएं दूर होंगी, तभी बढ़ेगी रफ्तार

केंद्र सरकार को उम्मीद है कि मुख्य सचिवों के सम्मेलन में इन मुद्दों पर ठोस चर्चा होगी और राज्य अपने स्तर पर प्रक्रियाओं को सरल बनाने की दिशा में कदम उठाएंगे। जमीन अधिग्रहण में तेजी, मंजूरियों की समय-सीमा तय करना और ‘सिंगल विंडो’ जैसी व्यवस्था की जरूरत इस पूरी बहस के केंद्र में है। जब तक निर्माण-पूर्व बाधाएं दूर नहीं होतीं, तब तक न परियोजनाओं की रफ्तार बढ़ेगी और न ही बढ़ती लागत पर लगाम लग पाएगी।

 

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