सरकारी-निजी सभी अस्पतालों को केंद्र का निर्देश, एक बार इस्तेमाल वाले मेडिकल उपकरण दोबारा न यूज करें

नई दिल्ली। देश के अस्पतालों में मरीजों की सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। केंद्र ने सरकारी और निजी, दोनों तरह के स्वास्थ्य केंद्रों को निर्देश दिया है कि एक बार इस्तेमाल के लिए बनाए गए मेडिकल उपकरणों और सर्जिकल सामान का दोबारा उपयोग पूरी तरह बंद किया जाए। सरकार ने चेतावनी दी है कि, ऐसा करने से मरीजों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है, खासकर क्रिटिकल केयर यानी गंभीर देखभाल के मामलों में, जहां छोटी-सी चूक भी जानलेवा साबित हो सकती है।

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DGHS ने गिनाए खतरे

स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) ने अपने निर्देश में कहा है कि, सिंगल-यूज उपकरणों को दोबारा इस्तेमाल करने से मरीजों को कई तरह की जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है।

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इनमें क्रॉस-इंफेक्शन यानी एक मरीज से दूसरे मरीज में संक्रमण फैलना, उपकरण का खराब हो जाना और उसकी कार्यक्षमता में कमी आना प्रमुख हैं। महानिदेशालय ने यह भी साफ किया है कि, इस तरह की प्रथा केवल चिकित्सकीय दृष्टि से जोखिम भरी नहीं है, बल्कि कानूनी दायरे में भी सवालों के घेरे में आती है।

कई कानूनों के उल्लंघन की आशंका

निर्देश में कहा गया है कि, सिंगल-यूज उपकरणों का दोबारा इस्तेमाल ‘ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940’, ‘मेडिकल डिवाइसेस रूल्स, 2017’ और ‘क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स एक्ट, 2010’ का उल्लंघन हो सकता है। इसके अलावा संक्रमण नियंत्रण और बायोमेडिकल कचरा प्रबंधन से जुड़े लागू नियम भी इस दायरे में आते हैं। यानी अस्पताल प्रबंधन को यह समझना होगा कि, यह मामला सिर्फ लागत बचाने या संसाधनों के बेहतर उपयोग का नहीं, बल्कि नियम-कानूनों के पालन का भी है।

क्या होते हैं सिंगल-यूज उपकरण

सिंगल-यूज उपकरण वे होते हैं, जिन्हें निर्माता ने सिर्फ एक बार इस्तेमाल के लिए तैयार और प्रमाणित किया होता है। ऐसे उपकरणों की बनावट और सामग्री इस तरह की होती है कि, बार-बार साफ करने या दोबारा निजीकृत करने पर उनकी गुणवत्ता और भरोसेमंद प्रदर्शन की गारंटी नहीं रहती। एक बार उपयोग के बाद उन पर संक्रमण फैलाने वाले सूक्ष्म जीव या अन्य अवशेष रह सकते हैं, जिन्हें पूरी तरह हटाना हमेशा संभव नहीं होता।

इन उपकरणों के दोबारा इस्तेमाल की खबरें

DGHS ने बताया कि, भारत में जिन सिंगल-यूज उपकरणों के दोबारा इस्तेमाल की खबरें सामने आई हैं, उनमें कई अहम चिकित्सा सामग्री शामिल हैं। इनमें एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी में इस्तेमाल होने वाले कार्डियक कैथेटर और गाइडवायर, डायलिसिस के उपकरण, कुछ सर्जिकल इंस्ट्रूमेंट तथा डिस्पोजेबल सीरिंज और सुइयां शामिल हैं। महानिदेशालय के अनुसार ऐसी गतिविधियों से संक्रमण का खतरा बढ़ता है और मरीजों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है, जब मरीजों को इस बारे में बताया ही न जाए।

पहले भी जारी हो चुका है निर्देश

DGHS ने यह भी जानकारी दी कि केंद्र सरकार स्वास्थ्य योजना (CGHS) की ओर से नवंबर 2016 में इस मुद्दे पर एक ऑफिस मेमोरेंडम जारी किया गया था। वह मेमोरेंडम इस योजना से जुड़े अस्पतालों के लिए था। अब ताजा निर्देश का दायरा कहीं व्यापक है और इसमें देश भर के सरकारी व निजी, सभी स्वास्थ्य केंद्र शामिल हैं।

मरीजों को जानने का अधिकार

इस पूरे मामले में सबसे अहम पहलू मरीजों की जानकारी और सहमति का है। जब किसी मरीज का इलाज किया जाता है, तो वह यह मानकर चलता है कि उस पर इस्तेमाल होने वाले उपकरण सुरक्षित और मानकों के अनुरूप हैं। अगर उसे यह बताए बिना दोबारा इस्तेमाल किया गया उपकरण लगा दिया जाए, तो यह भरोसे के साथ-साथ उसके स्वास्थ्य के अधिकार का भी सवाल बन जाता है। यही कारण है कि सरकार ने इस मुद्दे पर पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर दिया है।

क्रिटिकल केयर में जोखिम सबसे ज्यादा

सरकार ने खास तौर पर क्रिटिकल केयर के मामलों का जिक्र किया है। गंभीर हालत वाले मरीजों का शरीर पहले से कमजोर होता है और उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी कम हो सकती है।

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ऐसे में थोड़ा-सा संक्रमण भी उनकी हालत को और बिगाड़ सकता है। हृदय की जांच और इलाज, डायलिसिस जैसी प्रक्रियाओं में इस्तेमाल होने वाले उपकरण सीधे शरीर के भीतर या खून के संपर्क में आते हैं, इसलिए इनमें किसी भी तरह की लापरवाही की गुंजाइश बेहद कम रहती है।

उद्योग जगत ने किया स्वागत

इस निर्देश का स्वागत करते हुए ‘एसोसिएशन ऑफ इंडियन मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री’ (AiMeD) ने कहा कि जो उपकरण सिर्फ एक बार इस्तेमाल के लिए बनाए और प्रमाणित किए गए हैं, उन्हें दोबारा इस्तेमाल करने से मरीजों के लिए खतरा पैदा हो सकता है। संगठन ने इसे मरीजों की सुरक्षा की दिशा में जरूरी कदम बताया।

जिम्मेदारी तय करने की मांग

AiMeD के फोरम कोऑर्डिनेटर राजीव नाथ ने एक अहम मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि अगर कोई उपकरण निर्माता कंपनी के निर्देशों के खिलाफ जाकर दोबारा इस्तेमाल किया जाता है, तो इसके लिए किसकी जिम्मेदारी होगी, यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए। उनके इस सवाल से साफ है कि उद्योग जगत चाहता है कि नियमों में जवाबदेही की रेखा पूरी तरह स्पष्ट हो, ताकि किसी अनहोनी की स्थिति में निर्माता, अस्पताल और चिकित्सक की भूमिका को लेकर कोई भ्रम न रहे।

अब आगे क्या

केंद्र के इस निर्देश के बाद अब अस्पतालों पर इसे अपनी कार्यप्रणाली में लागू करने की जिम्मेदारी है। जरूरी है कि अस्पताल प्रबंधन अपने स्टाफ को इन नियमों के बारे में जागरूक करें, उपकरणों की खरीद, उपयोग और निपटान की प्रक्रिया पर नजर रखें और बायोमेडिकल कचरे के प्रबंधन से जुड़े मानकों का सख्ती से पालन करें। मरीजों और उनके परिजनों के लिए भी जरूरी है कि वे इलाज के दौरान उपकरणों की सुरक्षा और स्वच्छता को लेकर सवाल पूछने में संकोच न करें।

कुल मिलाकर केंद्र सरकार का यह कदम स्वास्थ्य व्यवस्था में मरीजों की सुरक्षा को सर्वोपरि रखने की दिशा में अहम माना जा रहा है। अब देखना होगा कि जमीनी स्तर पर इसका पालन कितनी सख्ती से सुनिश्चित किया जाता है।

 

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