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 ब्रह्मांड में बढ़ा कचरा, खतरे में धरती, आखिर कौन फैला रहा अंतरिक्ष में कबाड़

हर हफ़्ते धरती पर गिर रहा एक मीट्रिक टन मलबा

अंतरिक्ष में पहुंचने की इंसान की महत्वकांक्षा अब एक भयानक दुष्परिणाम लेकर आ रही है, जिसने वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। दरअसल, दुनिया भर के शक्तिशाली देश अपने स्पेस प्रोग्राम में तेजी से इजाफा करने लगे हैं। इसके लिए वे अरबों-खरबों डॉलर खर्च भी कर रहे हैं, लेकिन इस बेतहाशा वैज्ञानिक दौड़ की वजह से अंतरिक्ष में कचरे का एक विशालकाय पहाड़ खड़ा हो गया है, जो आने वाले समय में दुनिया को बेहद खतरनाक स्थिति में पहुंचा सकता है।

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इंसानी बस्तियों के लिए ख़तरा

कुछ रिपोर्ट्स में तो कहा जा रहा है कि, स्थिति इस कदर बिगड़ने लगी है कि, अब यह मलबा अंतरिक्ष तक सीमित न रहकर सीधे पृथ्वी पर इंसानी बस्तियों के लिए ख़तरा बनता जा रहा है। हाल ही में पोलिश स्पेस एजेंसी के विशेषज्ञ मारियस स्लोनिना ने एक सनसनीखेज़ दावा किया है कि, वर्तमान में हर हफ़्ते औसतन एक मीट्रिक टन अंतरिक्ष कचरा धरती के वायुमंडल में फिर से प्रवेश कर रहा है और नीचे गिर रहा है।

Space Debris

यह चेतावनी हवा-हवाई नहीं है, क्योंकि इस साल की शुरुआत में अफ्रीकी देश केन्या के एक दूरदराज क्षेत्र में जब आसमान से अचानक एक अंतरिक्ष यान की धातु की विशालकाय भारी रिंग खेत में आ गिरी, तो पूरे इलाके में हड़कंप मच गया था। इससे पहले भी इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से निकला एक कचरे का टुकड़ा अमेरिका के फ्लोरिडा स्थित एक रिहाइशी मकान से टकराकर छत को पूरी तरह क्षतिग्रस्त कर चुका है।

कई देशों में गिर चुके हैं अवशेष

इसके अलावा स्पेसएक्स के रॉकेट बूस्टर के अवशेष पोलैंड और कनाडा जैसे देशों के ग्रामीण क्षेत्रों में गिर चुके हैं, जबकि ऑस्ट्रेलिया और फिलीपींस के समुद्री तटों पर भी अंतरिक्ष रॉकेटों के विशालकाय हिस्से बहकर आते देखे गए हैं। ये तमाम घटनाएं इस बात का पुख्ता प्रमाण हैं कि, अंतरिक्ष में इंसानों द्वारा फैलाया गया कचरा अब हमारी धरती के वातावरण को भी सुरक्षित नहीं रहने दे रहा है।

 एक रिपोर्ट के अनुसार, वैसे तो अधिकांश अंतरिक्ष मलबा पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते ही भीषण घर्षण और गर्मी के कारण जलकर खाक हो जाता है या फिर महासागरों में गिर जाता है, लेकिन बड़ी और वजनी वस्तुओं का जल पाना पूरी तरह संभव नहीं होता।

अमेरिकी स्पेस फ़ोर्स द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2025 में ही वायुमंडल में अनियंत्रित रूप से प्रवेश करने वाली लगभग 820 बड़ी वस्तुओं के लिए वैश्विक अलर्ट जारी किया गया था, जबकि महज़ एक दशक पहले यानी 2015 के आसपास ऐसी घटनाओं की संख्या मात्र 110 के करीब हुआ करती थी। सिर्फ दस वर्षों में यह ख़तरा सात गुना से भी अधिक बढ़ चुका है, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि, कक्षा में उपग्रहों और रॉकेटों का जमावड़ा कितनी बेतहाशा रफ्तार से बढ़ा है।

मृत सैटेलाइट्स भी शामिल

सरल शब्दों में समझें तो स्पेस डेब्रिस या अंतरिक्ष कचरा उन सभी मानव-निर्मित वस्तुओं को कहा जाता है, जो वर्तमान में पृथ्वी की कक्षा में चक्कर लगा रही हैं, लेकिन अब वे पूरी तरह से बेकार हो चुकी हैं। यह कचरा कई माध्यमों से पैदा होता है। इसमें वे मृत सैटेलाइट्स शामिल हैं जिनका जीवनकाल समाप्त हो चुका है या जो तकनीकी खराबी के कारण निष्क्रिय हो गए हैं। इसके अलावा सैटेलाइट को कक्षा में स्थापित करने के बाद अलग होने वाले विशालकाय रॉकेट बूस्टर और ईंधन टैंक भी मलबे का रूप ले लेते हैं। जब दो पुराने उपग्रह आपस में टकराते हैं तो एक ही झटके में हजारों नए छोटे-छोटे टुकड़ों का निर्माण हो जाता है।

वहीं दूसरी ओर जब शक्तिशाली देश अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन करने के लिए एंटी-सैटेलाइट मिसाइल से अपने ही उपग्रह को उड़ाते हैं, तो इस विस्फोट से मलबे के अनगिनत टुकड़े चारों ओर फैल जाते हैं। यहां तक कि, अंतरिक्ष यात्रियों के छूटे हुए औजार, पेंट के पपड़ीदार कण और ज़हरीले ईंधन की बूंदें भी इस कचरे में गिनी जाती हैं।

ये देश फैला रहे सबसे ज्यादा कचरा

वैज्ञानिकों और वैश्विक अंतरिक्ष ट्रैकर्स के आंकड़ों के मुताबिक, अंतरिक्ष में कचरा फैलाने के मामले में रूस सबसे ऊपर यानी पहले पायदान पर खड़ा है, जिसके बाद क्रमशः अमेरिका, चीन, फ्रांस और जापान का नंबर आता है। रूस के शीर्ष पर होने की मुख्य वजह उसका लंबा स्पेस इतिहास है, जिसने स्पुतनिक के ज़माने से लेकर आज तक हज़ारों रॉकेट और सैटेलाइट्स लॉन्च किए हैं।

Space Debris

इसके साथ ही वर्ष 2021 में रूस ने एक एंटी-सैटेलाइट मिसाइल परीक्षण करके अपनी ही एक पुरानी सैटेलाइट को उड़ा दिया था, जिससे 1,500 से अधिक बड़े टुकड़े और लाखों छोटे कण कक्षा में फैल गए थे। यह ख़तरा इतना बड़ा था कि, उस समय इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर मौजूद अंतरिक्ष यात्रियों को अपनी जान बचाने के लिए आपातकालीन कैप्सूल में शरण लेनी पड़ी थी। दूसरी ओर, चीन ने भी वर्ष 2007 में ऐसे ही परीक्षण के ज़रिए अंतरिक्ष इतिहास का सबसे बड़ा मलबे का गुबार पैदा किया था।

तेजी से आ रहा पृथ्वी की तरफ 

अंतरिक्ष में तैर रहा यह मलबा स्थिर नहीं है, बल्कि 25,000 किलोमीटर प्रति घंटे से भी अधिक की खतरनाक रफ्तार से पृथ्वी की कक्षा में घूम रहा है। इतनी भयावह गति के कारण एक छोटा सा पेंच, नट-बोल्ट या पेंट का टुकड़ा भी यदि किसी सक्रिय सैटेलाइट या इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से टकरा जाए, तो वह उसे पूरी तरह तबाह कर सकता है। इस बढ़ते संकट से निपटने के लिए नासा, यूरोपीय स्पेस एजेंसी और इसरो जैसी संस्थाएं अब सतर्क हो गई हैं।

इसके लिए मलबे पर रडार से चौबीसों घंटे नज़र रखी जा रही है और नए उपग्रहों में डी-ऑर्बिटिंग तकनीक लगाई जा रही है ताकि उनका जीवन खत्म होने पर वे वायुमंडल में जलकर भस्म हो जाएं। साथ ही निष्क्रिय सैटेलाइट्स को दूर कब्रिस्तान कक्षा में भेजने और रोबोटिक आर्म्स से कचरा समेटने जैसे सफाई अभियानों पर भी काम चल रहा है। मानव सभ्यता ने अंतरिक्ष में सफलता के नए परचम तो लहराए हैं, लेकिन यदि कचरे के प्रबंधन पर तुरंत कड़े अंतर्राष्ट्रीय नियम नहीं बनाए गए, तो यह मलबा भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के साथ-साथ धरती की सुरक्षा के लिए भी बड़ा काल बन जाएगा।

 

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