साड़ी, मेकअप और गजरा पहनकर ही मिलती है पुरुषों को एंट्री, जानें इस अनोखे मंदिर की परंपरा

केरल। भारत एक ऐसा देश है, जहां हर राज्य, हर क्षेत्र में स्थित मंदिरों का अपना विशिष्ट इतिहास और अनूठी मान्यताएं हैं। इन्हीं दुर्लभ और रोचक परंपराओं में केरल के ‘कोट्टनकुलंगारा देवी मंदिर’ का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। यह मंदिर की एक ऐसी अनोखी परंपरा है जिसे, सुनकर हर कोई हैरान रह जाता है। दरअसल, इस मंदिर में देवी के दर्शन के लिए पुरुषों को महिलाओं की तरह सजना होता है। उन्हें पुरुष भेष में मन्दिर के प्रवेश करने की अनुमति नहीं होती। देवी के दर्शन के लिए जाने वाले पुरुषों को साड़ी पहननी पड़ती है। इतना ही नहीं महिलाओं की तरह मेकअप भी करना होता है।

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यह परंपरा कोई आज की नहीं है बल्कि वर्षों से चली आ रही है। इसे यहां के लोग बड़ी ही श्रद्धा और आस्था के साथ निभाते हैं। भक्ति और समर्पण के इस अनूठे प्रतीक को स्थानीय लोग ही नहीं बल्कि देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु भी विशेष सम्मान की दृष्टि से देखते हैं और निभाते हैं।

हर साल मनाया जाता है भव्य ‘चमायविलक्कू’ उत्सव

कोट्टनकुलंगारा देवी मंदिर में प्रतिवर्ष एक भव्य और विशेष उत्सव आयोजित किया जाता है, जिसे ‘चमायविलक्कू’ के नाम से जाना जाता है। इस उत्सव के दौरान देश के विभिन्न राज्यों से हजारों की संख्या में पुरुष श्रद्धालु इस मंदिर में पहुंचते हैं। मंदिर की सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार, इस अवसर पर पैंट, शर्ट, कुर्ता या किसी भी तरह के अनौपचारिक पुरुष परिधान पहनकर मंदिर में प्रवेश करने की सख्त मनाही होती है।

Kottankulangara Temple

इस विशेष अवसर पर देवी के दर्शन के लिए हर भक्त को एक विशेष प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। श्रद्धालु साड़ी पहनते हैं, चेहरे पर बाकायदा मेकअप लगाते हैं, हाथों में रंग-बिरंगी चूड़ियां पहनते हैं, बालों में फूलों की सुगंधित माला यानी गजरा सजाते हैं और साथ ही पारंपरिक आभूषणों से खुद को पूरी तरह सुसज्जित करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया के बाद वे एक महिला के रूप में मंदिर परिसर में प्रवेश करते हैं और देवी के समक्ष अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं। श्रद्धालुओं का मानना है कि, इस तरह स्त्री रूप धारण कर पूजा करने से वे अपनी सच्ची भक्ति और समर्पण को देवी तक पहुंचा पाते हैं।

लगते हैं विशेष मेकअप स्टॉल

चमायविलक्कू उत्सव के दौरान मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है, जिसे देखते हुए मंदिर प्रशासन की ओर से विशेष व्यवस्थाएं की जाती हैं। मंदिर परिसर के बाहर अस्थायी रूप से कई ब्यूटी पार्लर और मेकअप स्टॉल स्थापित किए जाते हैं। इन स्टॉल्स पर अनुभवी और विशेषज्ञ मेकअप आर्टिस्ट मौजूद रहते हैं, जो पुरुष श्रद्धालुओं की साड़ी बांधने से लेकर उनकी संपूर्ण पारंपरिक सजावट तैयार करने तक में पूरी मदद करते हैं।

इस पूरी प्रक्रिया में शामिल होने वाले श्रद्धालु बिना किसी झिझक या संकोच के, पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ इस परंपरा का पालन करते हैं। उनके लिए यह केवल एक रस्म भर नहीं, बल्कि आस्था और भक्ति की गहरी अभिव्यक्ति है। तैयार होने के बाद सभी श्रद्धालु देवी के दर्शन के लिए कतारबद्ध होकर मंदिर की ओर बढ़ते हैं। यह दृश्य देखने में बेहद अनोखा और आकर्षक लगता है।

परंपरा के पीछे छिपी है रोचक लोककथा

कोट्टनकुलंगारा मंदिर की इस अनूठी और असामान्य प्रथा के पीछे एक बेहद रोचक लोककथा प्रचलित है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाती रही है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, बहुत समय पहले की बात है, जब कुछ चरवाहे लड़के अपने खेल-खेल में लड़कियों का वेश धारण कर देवी की पूजा-अर्चना किया करते थे।

Kottankulangara Temple

कहा जाता है कि, इन बालकों की उस मासूम और निश्छल भक्ति से प्रभावित होकर स्वयं देवी ने उन्हें दर्शन दिए और अपना आशीर्वाद प्रदान किया। इसी दैवीय घटना के बाद से यह मान्यता स्थापित हो गई कि, पुरुषों द्वारा स्त्री रूप धारण कर देवी की पूजा करना विशेष रूप से शुभ और प्रभावशाली माना जाता है। स्थानीय लोगों का यह भी मानना है कि, इस प्रकार की भक्ति देवी को अत्यंत प्रसन्न करती हैं। यही कारण है कि सदियों बाद आज भी यह परंपरा उतनी ही निष्ठा से निभाई जा रही है।

पूरी होती हैं मनोकामनाएं

इस मंदिर से जुड़े श्रद्धालुओं की आस्था इतनी गहरी है कि, वे मानते हैं कि यदि कोई व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और सच्चे मन से देवी की स्त्री रूप में पूजा करता है, तो उसकी सभी मनोकामनाएं अवश्य पूरी होती हैं। भक्तों का यह भी विश्वास है कि चाहे नौकरी से जुड़ी समस्या हो, स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो, पारिवारिक सुख-शांति की कामना हो, विवाह या संतान प्राप्ति की इच्छा हो, अथवा कोई अन्य व्यक्तिगत मनोकामना- देवी की कृपा से ये सभी इच्छाएं पूरी हो सकती हैं।

यही अटूट और गहरी आस्था हर वर्ष हजारों पुरुष श्रद्धालुओं को चमायविलक्कू उत्सव में शामिल होने के लिए प्रेरित करती है। दूर-दराज के राज्यों से भी लोग विशेष रूप से इस उत्सव में भाग लेने के लिए केरल की यात्रा करते हैं, ताकि वे इस अनूठी परंपरा का हिस्सा बन सकें और देवी का आशीर्वाद प्राप्त कर सकें।

भक्ति, परंपरा और आस्था का संगम

कोट्टनकुलंगारा देवी मंदिर की यह अनोखी परंपरा भारतीय संस्कृति की विविधता और गहराई को दर्शाती है। यह न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। भक्ति, परंपरा और अटूट आस्था का यह अद्वितीय संगम केरल की सांस्कृतिक धरोहर का एक अभिन्न और अनमोल हिस्सा बना हुआ है।

आज के आधुनिक युग में भी जब समाज तेजी से बदल रहा है, ऐसे में इस तरह की परंपराओं का जीवंत बने रहना यह दर्शाता है कि भारत में धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विविधता की जड़ें कितनी गहरी हैं। कोट्टनकुलंगारा मंदिर की यह विशेष परंपरा न केवल श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती है, बल्कि यह पूरे विश्व के सामने भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का एक जीवंत उदाहरण भी प्रस्तुत करती है।

 

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