
लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने दहेज हत्या से जुड़े एक मामले में समाज और परिवारों के लिए बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि, अगर कोई विवाहित बेटी ससुराल में हो रही प्रताड़ना की शिकायत लेकर मायके पहुंचती है, तो उसकी बात को महज एक सामान्य वैवाहिक विवाद समझकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि, ऐसी शिकायतें दरअसल मदद और सुरक्षा की पुकार हो सकती हैं, जिन पर परिवार को समय रहते गंभीरता से ध्यान देकर ठोस हस्तक्षेप करना चाहिए। कोर्ट ने ये भी कहा कि, कोर्ट के फैसले बेटी को जीवित नहीं कर सकते।
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2011 के मामले में सुनाया फैसला
न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने यह टिप्पणी श्रावस्ती जिले के वर्ष 2011 के एक दहेज हत्या मामले में अभियुक्तों की अपील का निस्तारण करते हुए की। यह मामला वर्षों से न्यायिक प्रक्रिया से गुजर रहा था और अब हाईकोर्ट ने इस पर अपना अंतिम फैसला सुनाया है।
सामाजिक जिम्मेदारी पर जोर
अदालत ने अपनी टिप्पणी में इस बात का भी उल्लेख किया कि, दोषियों को सजा दिलाना न्यायिक प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा जरूर है, लेकिन यह उस समय पर किए गए हस्तक्षेप का विकल्प नहीं हो सकता, जिससे किसी महिला की जान बचाई जा सकती हो।

कोर्ट ने कहा कि, दहेज जैसी सामाजिक बुराई से लड़ने की जिम्मेदारी सिर्फ न्यायपालिका की नहीं है, बल्कि इसमें परिवार, रिश्तेदारों और समूचे समाज की भी बराबर की भागीदारी होनी चाहिए। अदालत ने यह संदेश भी दिया कि, किसी भी महिला की शिकायत को गंभीरता से लेकर उसका समय पर समाधान किया जाना चाहिए, क्योंकि एक बार जान चली जाने के बाद कोई भी न्यायिक फैसला उस खोई हुई जिंदगी को वापस नहीं ला सकता।
दोषसिद्धि बरकरार
इस मामले में हाईकोर्ट ने मृतका के पति दिनेश कुमार समेत शेषराज, ननबाबू, बड़े लाल कोरी और बिट्टा देवी की दहेज हत्या, दहेज उत्पीड़न और दहेज मांगने के आरोपों में दोषसिद्धि को बरकरार रखा है। हालांकि, ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा में अदालत ने संशोधन करते हुए इसे अभियुक्तों द्वारा पहले ही जेल में बिताई गई अवधि तक सीमित कर दिया।
जेल मैनुअल के मुताबिक, मृतका के पति दिनेश और सह-अभियुक्त शेषराज सत्रह वर्ष से अधिक समय जेल में बिता चुके हैं। ननबाबू चौदह वर्ष से अधिक, बड़े लाल करीब तेरह वर्ष और बिट्टा देवी करीब नौ वर्ष तक जेल में रह चुकी हैं। इसी आधार पर अदालत ने उनकी सजा को पहले से काटी गई अवधि तक सीमित करने का फैसला सुनाया।
फोन पर रोते हुए बताई थी पीड़ा
अदालत के सामने पेश साक्ष्यों से यह बात सामने आई कि, मृतका मीना देवी जब जीवित थीं तो कई बार अपनी मां, भाई और भाभी को ससुराल में हो रही दहेज संबंधी प्रताड़ना के बारे में जानकारी दी थी। घटना से करीब आठ से दस दिन पहले भी उसने फोन पर रोते हुए अपने परिजनों को बताया था कि, उससे एक लाख रुपये नकद और एक मोटरसाइकिल की मांग की जा रही है। मीना देवी ने यह भी बताया था कि, जब यह मांग पूरी नहीं हुई, तो उसे और उसकी मां को जान से मारने की धमकी दी गई। अदालत ने इन तथ्यों को गंभीरता से लेते हुए कहा कि, यह स्पष्ट संकेत था कि पीड़िता खतरे में थी और समय रहते हस्तक्षेप जरूरी था।
कोर्ट की टिप्पणी- बड़ा संदेश
न्यायिक विशेषज्ञों का मानना है कि, हाईकोर्ट की यह टिप्पणी दहेज उत्पीड़न से जुड़े मामलों में एक अहम नजीर बन सकती है। अदालत ने साफ किया कि जब कोई बेटी अपने मायके आकर ससुराल की प्रताड़ना के बारे में बताती है, तो परिवार को इसे रोजमर्रा की छोटी-मोटी नोकझोंक समझकर टाल नहीं देना चाहिए। इसके बजाय परिवार को उस शिकायत की गंभीरता को समझते हुए बेटी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए, चाहे वह कानूनी सहायता लेना हो, स्थानीय प्रशासन से संपर्क करना हो या बेटी को कुछ समय के लिए सुरक्षित माहौल में रखना हो।
दहेज प्रथा के खिलाफ सामूहिक जिम्मेदारी की जरूरत
कोर्ट की इस टिप्पणी को दहेज प्रथा के खिलाफ एक व्यापक सामाजिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि, केवल कानून बनाने या दोषियों को सजा देने भर से यह सामाजिक बुराई खत्म नहीं हो सकती। इसके लिए जरूरी है कि परिवार, समाज और आस-पड़ोस के लोग भी सतर्क रहें और किसी भी महिला की प्रताड़ना से जुड़ी शिकायत को गंभीरता से लें। विशेषज्ञों का कहना है कि, अक्सर देखा गया है कि परिवार के लोग बेटी की शिकायत को वैवाहिक जीवन का सामान्य उतार-चढ़ाव मानकर टाल देते हैं, जिसका खामियाजा कई बार बेटी को अपनी जान गंवाकर चुकाना पड़ता है।
नई बहस को जन्म
फिलहाल हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद संबंधित अभियुक्तों की दोषसिद्धि बरकरार रहेगी, हालांकि उनकी सजा को जेल में बिताई गई अवधि तक सीमित करने का आदेश दिया गया है। कानूनी जानकारों का कहना है कि इस तरह के फैसलों में अदालतें अक्सर मामले की परिस्थितियों, अभियुक्तों की जेल में बिताई गई अवधि और अन्य तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सजा में संशोधन करती हैं। बहरहाल, इस पूरे मामले ने एक बार फिर दहेज प्रथा जैसी सामाजिक बुराई और परिवारों की जिम्मेदारी को लेकर एक अहम बहस को जन्म दिया है।
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