
नई दिल्ली। दिल्ली का जंतर-मंतर बीते कुछ दिनों के फिर से सुखियों में हैं। हाल ही में यहां नीट यूजी पेपर लीक मामले को लेकर छात्रों ने लंबे समय तक धरना दिया। वहीं, कॉकरोच जनता पार्टी की तरफ से भी हाल में जंतर-मंतर पर जबर्दस्त प्रदर्शन किया गया। इससे पहले आम आदमी पार्टी ने भी अपनी शुरुआत के दौर में इसी जगह को चुना था। हर बार जब कोई नया आंदोलन खड़ा होता है, वह जंतर-मंतर से ही अपना सफर शुरू करता है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि, आखिर देश के लगभग हर बड़े प्रदर्शन के लिए जंतर-मंतर ही क्यों चुना जाता है?
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खगोलीय गणनाओं के लिए बना था जंतर-मंतर
किसान आंदोलन हो, महिला सुरक्षा की मांग हो, भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज हो या फिर खिलाड़ियों का संघर्ष। हर बड़े जन-आंदोलन की तस्वीर में जंतर-मंतर की वेधशाला की वह अनोखी वास्तुकला जरूर देखने को मिलती है, जिसकी स्थापना खगोलीय गणनाओं के लिए की गई थी।

बेहद कम ही लोग जानते हैं कि, जंतर-मंतर को मूल रूप से प्रदर्शनों के लिए नहीं, बल्कि खगोलीय गणनाओं और तारों की गिनती करने के लिए बनाया गया था। आखिर तीन सौ साल पुरानी यह वेधशाला कैसे बन गई देश की राजनीति और जन-आंदोलनों की धड़कन? आइए जानते हैं इसका पूरा इतिहास।
इन राज्यों में भी हैं वेधशालाएं
जंतर-मंतर का नाम “यंत्र-मंत्र” शब्द के अपभ्रंश से बना है, जिसका अर्थ है ऐसे यंत्र जिनसे खगोलीय गणनाएं की जाती हैं। आमेर के राजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने जयपुर, उज्जैन, मथुरा, दिल्ली और वाराणसी में ऐसी वेधशालाओं का निर्माण करवाया था। इनमें सबसे पहली वेधशाला साल 1725 में दिल्ली में बनाई गई थी, जिसके बाद बाकी शहरों में भी इसी तरह की वेधशालाएं का निर्माण कराया गया। सवाई जयसिंह स्वयं एक कुशल खगोलशास्त्री थे। उन्होंने अपनी देखरेख में ही इन यंत्रों का निर्माण करवाया था, ताकि यहां से सूर्य, चंद्रमा और अन्य ग्रहों की स्थिति का सटीक अनुमान लगाया जा सके, समय की गणना की जा सके और पंचांग तैयार किए जा सकें।
दिल्ली के जंतर-मंतर में सम्राट यंत्र, जय प्रकाश यंत्र और मिश्र यंत्र जैसे कई विशाल पत्थर और चूने से बने उपकरण मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल सूर्य घड़ी के रूप में और खगोलीय पिंडों की स्थिति नापने के लिए किया जाता था। सदियों तक यह जगह विज्ञान, गणित और खगोलशास्त्र के अध्ययन का केंद्र बनी रही, लेकिन समय के साथ इन यंत्रों का वैज्ञानिक उपयोग कम होता गया और यह स्थान धीरे-धीरे एक ऐतिहासिक धरोहर और पर्यटन स्थल में तब्दील को गया।
पहले इंडिया गेट के पास होते थे प्रदर्शन और सभाएं
आजादी के बाद के दशकों में दिल्ली में जो भी बड़े राजनीतिक प्रदर्शन और सभाएं होती थीं, वे आमतौर पर इंडिया गेट के पास स्थित बोट क्लब लॉन्स में होती थीं। यह इलाका राजपथ के नजदीक होने की वजह से प्रदर्शनों के लिए सबका पसंदीदा स्थान बन गया था। लेकिन साल 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत की अगुवाई में हुए एक विशाल किसान आंदोलन ने राजधानी में भारी अव्यवस्था पैदा कर दी।

इसके बाद सुरक्षा कारणों और प्रधानमंत्री कार्यालय की नजदीकी को देखते हुए 1993 में पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने बोट क्लब में धरना-प्रदर्शन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया। इसी प्रतिबंध के बाद प्रदर्शनकारियों ने एक नये प्रदर्शन स्थल की तलाश शुरू की, जो जंतर-मंतर पर आकर ठहरी। बस तभी से ये स्थल धरना स्थल बन गया।
जंतर-मंतर पर पहला धरना कब और किसने किया
आधिकारिक तौर पर धरना स्थल घोषित होने के बाद जंतर-मंतर पर पहला प्रदर्शन साल 1993 में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ यानी डूसू के तत्कालीन अध्यक्ष आशीष सूद ने किया था। ये प्रदर्शन केंद्र सरकार के एक आदेश के खिलाफ किया गया था। दिलचस्प बात यह है कि छात्र राजनीति से करियर शुरू करने वाले आशीष सूद आगे चलकर संगठन और चुनावी राजनीति से जुड़े। मौजूदा समय में वे दिल्ली सरकार में मंत्री के तौर पर काम कर रहे हैं। इस तरह जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन की परंपरा की शुरुआत एक छात्र आंदोलन से हुई, जो आगे चलकर देश के सबसे बड़े जन-आंदोलनों का केंद्र बन गई।
अब तक यहां हो चुके ये प्रमुख धरने-प्रदर्शन
1993 के बाद से अब तक जंतर-मंतर पर हजारों छोटे-बड़े प्रदर्शन हो चुके हैं। इनमें से कई राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रहे।
2011 में अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन
2011 में सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के नेतृत्व में जन लोकपाल बिल की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर हुआ यह आंदोलन आजाद भारत के सबसे बड़े जन-आंदोलनों में से एक माना जाता है। इस आंदोलन ने पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक ऐसा माहौल बना दिया था, जिसकी चर्चा हर घर और हर गली मोहल्लों में होने लगी थी। इतना ही ही नहीं आगे चलकर एक नई राजनीतिक पार्टी (आप) का उदय हुआ था, जिसने दिल्ली की सत्ता भी संभाली और अभी भी एक्टिव है।
2012 निर्भया कांड को लेकर न्याय की मांग
साल 2012 में दिल्ली में हुए चर्चित सामूहिक दुष्कर्म कांड के बाद कड़ाके की ठंड के बावजूद हजारों लोग जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों में जुटे और तत्कालीन सरकार की नींव हिला दी। नतीजा ये रहा कि, दोषी पकड़े गये और लम्बी कानूनी कार्रवाई के बाद उन्हें फांसी भी हुई। हालांकि, इस मामले में नाबालिग दोषी की रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से रोक न लगाए जाने पर निर्भया के माता-पिता ने भी जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया थ। साल 2012 के इसी आंदोलन ने देश में महिला सुरक्षा से जुड़े कानूनों में बड़े बदलाव की नींव रखी।
2017 तमिलनाडु के किसानों का प्रदर्शन
2017 में सूखे से जूझ रहे तमिलनाडु के हजारों किसानों ने अपनी मांगों को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया। ये प्रदर्शन कुछ अनोखा था। इसमें मानव खोपड़ियों और चूहे खाने जैसी चीजों को दर्शाया गया था। इस प्रतीकात्मक प्रदर्शन ने भी पूरे देश का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया था।
2023 पहलवानों का आंदोलन
ये आन्दोलन बीजेपी के दिग्गज नेता और WFI के तत्कालीन अध्यक्ष बृज भूषण शरण सिंह के खिलाफ देश के उन शीर्ष पहलवानों के नेतृत्व ने हुआ था, जिन्होंने दुनिया भर में भारत का नाम रोशन किया था और कई मेडल जीते थे। पहलवानों ने बृज भूषण शरण सिंह पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाते हुए जंतर-मंतर पर लंबा धरना दिया था। यह आंदोलन खेल जगत और महिला सुरक्षा, दोनों दृष्टि से बेहद चर्चित रहा।
2026 नीट पेपर लीक मामला
हाल ही में नीट यूजी पेपर लीक मामले की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार अधिकारियों के इस्तीफे की मांग को लेकर छात्रों और विभिन्न राजनीतिक-सामाजिक संगठनों ने जंतर-मंतर पर लंबा धरना दिया और संसद चलो शांति मार्च निकाला। ये आन्दोलन शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग को लेकर देशभर में चर्चा का विषय बना। अलाम ये रहा कि, देश भर में समर्थन में आन्दोलन शुरू हो गया। देश भर के तमाम छात्र जंतर-मंतर भी पहुंचे और कई-कई दिनों तक यही डटे रहे।

इनके अलावा किसान आंदोलन, बेरोजगार युवाओं के प्रदर्शन, विभिन्न राज्यों की मांगों को लेकर धरने, पेंशन और नौकरी से जुड़ी मांगें, तथा अलग-अलग सामाजिक-राजनीतिक संगठनों द्वारा समय-समय पर छोटे-बड़े हजारों प्रदर्शन जंतर-मंतर पर हो चुके हैं। यह स्थान अब लगभग हर बड़े जन-आंदोलन का पर्याय बन चुका है।
जंतर-मंतर ही क्यों बना प्रदर्शनों का केंद्र
जानकार बताते हैं कि, जंतर-मंतर के धरना स्थल बनने की सबसे बड़ी वजह इसकी संसद भवन और प्रधानमंत्री कार्यालय से नजदीकी है। यहां प्रदर्शन करने से सरकार तक आसानी से आवाज पहुंचाई जा सकती है। साथ ही यह इलाका मीडिया कवरेज के लिहाज से भी बेहद सुविधाजनक माना जाता है। हालांकि, इतिहासकारों का कहना है कि, समय के साथ यहां प्रदर्शन के लिए उपलब्ध जगह लगातार सीमित होती गई है। अब पुलिस प्रशासन की तरफ से भी कड़े नियम लागू किए जाते हैं, जिनके तहत ही यहां धरने की अनुमति दी जाती है।
आवाज बुलंद करने का बड़ा मंच बना जंतर-मंतर
तीन सौ साल पहले खगोलीय गणनाओं और वैज्ञानिक शोध के लिए बना जंतर-मंतर आज लोकतंत्र में जनता की आवाज बुलंद करने का सबसे बड़ा मंच बन चुका है। यहां हुए आंदोलनों ने न सिर्फ कानूनों और नीतियों में बदलाव लाए हैं, बल्कि आम जनता को यह भरोसा भी दिलाया है कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात सरकार तक पहुंचाई जा सकती है। विज्ञान की प्रयोगशाला से जन-आंदोलनों के केंद्र तक का यह सफर भारतीय लोकतंत्र और इतिहास, दोनों की एक दिलचस्प मिसाल है।
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