
केप कैनावेरल। पिछले एक साल से अंतरिक्ष में भटक रहा स्पेसएक्स (SpaceX) का एक पुराना रॉकेट जल्द ही अपनी यात्रा के अंतिम पड़ाव पर पहुंचने वाला है। अनुमान लगाया जा रहा है कि, रॉकेट का ऊपरी हिस्सा जल्द ही चांद की सतह से जा टकराएगा। वैज्ञानिक इस दुर्लभ खगोलीय घटना पर बारीकी से नजर बनाये हुए हैं।
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कब और कहां होगी टक्कर
खगोलविदों का कहना है कि, यह टक्कर 5 अगस्त दिन बुधवार होने वाली है। इस दौरान रॉकेट का ऊपरी अवशेष चांद के पश्चिमी भाग में मौजूद आइंस्टीन क्रेटर के आसपास जाकर गिरेगा। इस टक्कर की रफ्तार इतनी तेज होगी कि, चांद की सतह पर एक बड़ा गड्ढा बन जाएगा और धूल-मिट्टी व चट्टानी कणों का एक विशाल गुबार अंतरिक्ष में फैल जाएगा।

अंतरिक्ष पिंडों की गति पर नजर रखने वाले विशेषज्ञ बिल ग्रे का मानना है कि, यह रॉकेट लगभग 8,700 किलोमीटर प्रति घंटे यानी करीब 5,400 मील प्रति घंटे की गति से चांद की सतह से टकराएगा। अगर तुलना करें तो ये रफ्तार ध्वनि की गति से लगभग सात गुना अधिक होगी। खास बात यह है कि, टक्कर वाला स्थान उस वक्त सूर्य के प्रकाश में होगा।
दिखेगी या नहीं यह टक्कर
रिपोर्ट्स के अनुसार, इस घटना को देखने का सबसे बेहतर अवसर अमेरिका और कनाडा के पूर्वी तटीय क्षेत्रों तथा दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में रहने वाले लोगों को मिल सकता है। बावजूद इसके, यह टक्कर रात के शुरूआती पहर में घटित होगी और इससे उत्पन्न होने वाली रोशनी की चमक बेहद धीमी रहने का अनुमान है। यही कारण है कि, इसे बिना विशेष उपकरणों के नार्मल आंखों से देख पाना मुश्किल होगा।
लंबे समय तक फैला रहेगा मलबा
विशेषज्ञों का कहना है कि टक्कर के तुरंत बाद बनने वाला धूल और मलबे का बादल अंतरिक्ष में कई किलोमीटर तक फैल सकता है, और शक्तिशाली दूरबीनों की मदद से इसे कुछ मिनटों तक देखा जा सकेगा। लॉस अलामोस नेशनल लेबोरेटरी से जुड़े वैज्ञानिक बेंजामिन फर्नांडो का कहना है कि, चांद पर पृथ्वी जैसा गुरुत्वाकर्षण नहीं है और वहां वायुमंडल भी मौजूद नहीं है। ऐसे में धूल के कणों को हवा के जरिए तितर-बितर करने वाली कोई प्राकृतिक व्यवस्था वहां काम नहीं करेगी, जिससे यह मलबा लंबे समय तक अपनी जगह टिका रह सकता है।
फर्नांडो के अनुसार, वैज्ञानिकों की इस पूरी घटना में दिलचस्पी की मुख्य वजह यह समझना है कि, अंतरिक्ष में बिखरा मलबा भविष्य में चांद पर जाने वाले यात्रियों के लिए किस हद तक खतरा बन सकता है। यह अध्ययन आने वाले चंद्र मिशनों की सुरक्षा योजना बनाने में मददगार साबित हो सकता है।
कितना बड़ा होगा गड्ढा
फर्नांडो के अनुमान के मुताबिक, इस टक्कर से चांद की सतह पर लगभग 27 मीटर यानी करीब 90 फीट चौड़ा और लगभग 5 मीटर यानी 16 फीट गहरा एक गड्ढा बनने की संभावना है। हालांकि, यह गड्ढा इतना छोटा है कि, पृथ्वी से इसे देख पाना संभव नहीं होगा, लेकिन चांद की परिक्रमा कर रहे अंतरिक्ष यान इसकी तस्वीरें आसानी से खींच सकेंगे।

इस दिशा में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर और दक्षिण कोरिया का डानुरी लूनर ऑर्बिटर दोनों इस घटना पर नजर रखेंगे और टक्कर से पहले तथा बाद की तस्वीरें कैद करेंगे। बताया जा रहा है कि डानुरी अंतरिक्ष यान टक्कर से करीब दो मिनट पूर्व रॉकेट के एक या दो मील के दायरे में से गुजरेगा, जिससे वैज्ञानिकों को इस घटना का करीबी अध्ययन करने का मौका मिलेगा।
रॉकेट का इतिहास
गौरतलब है कि, जो रॉकेट अब चांद से टकराने जा रहा है, वह करीब 12 मीटर यानी 40 फीट लंबा है और इसका वजन लगभग 4,500 किलोग्राम आंका गया है। इसे 15 जनवरी 2025 को दो निजी मून लैंडर्स को अंतरिक्ष में भेजने के मकसद से लॉन्च किया गया था। इनमें से एक लैंडर अमेरिकी कंपनी फायरफ्लाई एयरोस्पेस का ब्लू घोस्ट था, जिसने किसी निजी कंपनी द्वारा पहली बार पूरी तरह सफल चंद्र लैंडिंग करने का कीर्तिमान स्थापित किया था। वहीं दूसरा लैंडर जापानी कंपनी आईस्पेस का था, जो दुर्भाग्यवश चांद की सतह पर उतरते समय दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। इन दोनों लैंडर्स को कक्षा में छोड़ने के बाद से यह रॉकेट हिस्सा खाली और निष्क्रिय होकर अंतरिक्ष में भटकता रहा।
पहले भी हो चुकी हैं ऐसी घटनाएं
विशेषज्ञों के अनुसार, प्राकृतिक उल्कापिंडों के चांद से टकराने की घटनाओं का पूर्वानुमान लगा पाना संभव नहीं होता, लेकिन इंसानों द्वारा बनाई गई वस्तुओं के नियंत्रित टकराव का अध्ययन जरूर किया जा सकता है। यह पहला मौका नहीं है जब कोई बेकार पड़ा रॉकेट चांद की सतह से टकराया हो। वर्ष 2022 में एक चीनी रॉकेट का हिस्सा चांद के सुदूर भाग में जा गिरा था, जिसकी वजह से वहां दो अलग-अलग गड्ढे बन गए थे।
इससे पहले नासा ने भी अपने अपोलो अभियानों के दौरान जानबूझकर रॉकेट के हिस्सों और चंद्र मॉड्यूल को चांद पर गिराया था, ताकि भूकंपीय गतिविधियों का अध्ययन किया जा सके। इसके अलावा वर्ष 2009 में नासा के LCROSS मिशन के तहत भी अंतरिक्ष यान और रॉकेट के एक हिस्से को चांद के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में गिराया गया था, जिसका मकसद वहां बर्फ के अस्तित्व की पुष्टि करना था।
मानव और रोबोटिक मिशनों की संख्या में इजाफा
आने वाले वर्षों में चांद पर मानव और रोबोटिक मिशनों की संख्या में इजाफा होने की संभावना है। ऐसे हालात में अंतरिक्ष मलबे पर नजर रखने और यातायात प्रबंधन को और अधिक मजबूत बनाना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। अमेरिका और चीन, दोनों ही देश आगामी वर्षों में फिर से इंसानों को चांद पर भेजने की तैयारियों में जुटे हैं। वहीं एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स और जेफ बेजोस की ब्लू ओरिजिन, नासा के भावी आर्टेमिस अभियानों के लिए चंद्र लैंडर उपलब्ध कराने की होड़ में शामिल हैं।

रिटायर्ड खगोल भौतिकीविद जोनाथन मैकडॉवेल का कहना है कि फिलहाल यह टक्कर किसी बड़ी समस्या का कारण नहीं बनेगी, लेकिन भविष्य में जब चांद पर स्थायी अड्डे स्थापित हो जाएंगे, तब इस तरह की घटनाएं गंभीर परेशानी खड़ी कर सकती हैं। उनका मानना है कि रॉकेट के बेकार हिस्सों को इस तरह अनियंत्रित कक्षाओं में यूं ही छोड़ देना उचित नहीं होगा।
वैज्ञानिकों के लिए यह घटना महज एक संयोग नहीं, बल्कि भविष्य के चंद्र अभियानों को सुरक्षित बनाने की दिशा में एक अहम अध्ययन का अवसर मानी जा रही है।
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