
कुछ साल पहले तक न्यूरोलॉजिस्ट के पास जाने का मतलब आमतौर पर स्ट्रोक, पार्किंसन, मिर्गी या डिमेंशिया जैसी गंभीर और उम्र संबंधी बीमारियों से जुड़ा माना जाता था। ऐसे मरीजों में ज्यादातर संख्या बुजुर्गों की होती थी, जिनकी सामान्य शिकायतें याददाश्त कमजोर होना या चलने-फिरने में दिक्कत होना जैसी होती थीं, लेकिन अब यह पूरी तस्वीर तेजी से बदलती नजर आ रही है। आजकल न्यूरोलॉजिस्ट के क्लीनिक में बड़ी संख्या में युवा और किशोर उम्र के मरीज ऐसे लक्षणों के साथ पहुंच रहे हैं, जिनका सीधा संबंध लंबे समय तक स्मार्टफोन के इस्तेमाल की आदत से जोड़ा जा रहा है।
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बार-बार सिरदर्द, नींद खराब
डॉक्टरों का कहना है कि, इन दिनों बार-बार सिरदर्द होना, किसी काम पर ध्यान केंद्रित न कर पाना, नींद खराब होना, चक्कर आना, दिमाग में एक तरह का धुंधलापन महसूस होना और छोटी-छोटी बातें भूल जाने जैसी समस्याएं युवाओं में तेजी से बढ़ रही हैं। यह सभी लक्षण पहले जहां बुजुर्गों में देखे जाते थे, वहीं अब यह कम उम्र के लोगों में भी आम होते जा रहे हैं, जो चिकित्सा जगत के लिए एक नई और चिंताजनक चुनौती बनकर उभरा है।
बदल गया है जीने का तरीका
सीके बिड़ला हॉस्पिटल्स, सीएमआरआई के न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर दीप दास कहते हैं कि, मोबाइल फोन ने लोगों के काम करने, पढ़ाई करने और एक-दूसरे से जुड़ने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। उनका कहना है कि, इसमें कोई शक नहीं कि स्मार्टफोन ने जिंदगी को कई मायनों में आसान बनाया है, लेकिन इसका जरूरत से ज्यादा और बिना किसी नियंत्रण के इस्तेमाल ध्यान केंद्रित करने की क्षमता, नींद, मूड और दिमाग की समग्र कार्यक्षमता पर नकारात्मक असर डाल सकता है।

डॉक्टरों का कहना है कि, लगातार आने वाले नोटिफिकेशन, बिना रुके सोशल मीडिया स्क्रॉल करते रहना और एक ऐप से दूसरे ऐप पर लगातार जाते रहना, यह सब मिलकर दिमाग को हर समय सक्रिय और उत्तेजित बनाए रखते हैं। धीरे-धीरे दिमाग को लगातार नई उत्तेजना की आदत पड़ जाती है, जिसके बाद किसी एक काम पर लंबे समय तक ध्यान केंद्रित करना मुश्किल होने लगता है। यही वजह है कि कई युवा अब किताब पढ़ते समय, किसी मीटिंग में बैठे हुए या पढ़ाई करते वक्त भी बार-बार अपना फोन देखने की आदत से जूझते नजर आते हैं।
नींद और याददाश्त पर भी पड़ रहा असर
एक्सपर्ट कहते हैं कि, स्मार्टफोन का असर सिर्फ ध्यान केंद्रित करने की क्षमता तक ही सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका सीधा असर नींद और याददाश्त पर भी देखने को मिल रहा है। रात में देर तक फोन का इस्तेमाल करने से आंखें लगातार ब्लू लाइट के संपर्क में रहती हैं, जिसकी वजह से शरीर में मेलाटोनिन नामक हार्मोन का उत्पादन कम होने लगता है। यही हार्मोन शरीर के सोने और जागने के प्राकृतिक चक्र को नियंत्रित करने का काम करता है।
जब नींद पूरी नहीं हो पाती, तो इसका सीधा असर व्यक्ति की एकाग्रता और याददाश्त पर पड़ता है। इसके अलावा डॉक्टरों का यह भी कहना है कि, नींद की कमी कि वजह से चिंता, अवसाद और लंबे समय तक बने रहने वाले सिरदर्द जैसी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं, जो व्यक्ति के समग्र स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
जानिए क्या है ‘टेक्स्ट नेक’ सिंड्रोम
इस पूरी समस्या का एक और अहम पहलू शारीरिक स्तर पर भी देखने को मिल रहा है। लंबे समय तक गर्दन को झुकाकर मोबाइल फोन देखने की आदत से गर्दन और कंधों की मांसपेशियों पर लगातार दबाव पड़ता है। इसकी वजह से टेंशन हेडेक और माइग्रेन जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। चिकित्सा जगत में इस स्थिति को ‘टेक्स्ट नेक’ का नाम दिया गया है, जो अब एक पहचाना हुआ स्वास्थ्य मुद्दा बनता जा रहा है।
इसके अलावा लगातार स्क्रीन देखते रहने से डिजिटल थकान भी होने लगती है, जिसके चलते व्यक्ति मानसिक रूप से थका हुआ, चिड़चिड़ा और अपने रोजमर्रा के कामों में रुचि न लेने वाला महसूस कर सकता है। डॉक्टरों के अनुसार, कई मरीजों को लंबे समय तक स्क्रीन के इस्तेमाल के बाद नई जानकारी को समझने और उसे याद रखने में भी दिक्कतें महसूस होने लगी हैं।
बच्चों और किशोरों के लिए ज्यादा खतरा
डॉक्टरों की सबसे बड़ी चिंता बच्चों और किशोरों को लेकर है। विशेषज्ञों का कहना है कि, इस उम्र के बच्चों पर स्मार्टफोन के अत्यधिक इस्तेमाल का असर कहीं ज्यादा गहरा हो सकता है, क्योंकि उनका दिमाग अभी पूरी तरह से विकसित नहीं हुआ होता। ऐसे में जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम न सिर्फ उनकी पढ़ाई पर, बल्कि उनकी नींद, शारीरिक गतिविधियों और सामाजिक व्यवहार पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

हालांकि, विशेषज्ञ यह स्पष्ट करना भी नहीं भूलते कि असली समस्या स्मार्टफोन का होना नहीं, बल्कि उसका अनियंत्रित और गलत तरीके से इस्तेमाल करना है। सही तरीके से और संतुलित मात्रा में किया गया इस्तेमाल किसी के लिए भी नुकसानदायक नहीं होता।
बचाव के उपाय
इन तमाम समस्याओं से बचने के लिए डॉक्टर कुछ आसान लेकिन कारगर उपाय अपनाने की सलाह देते हैं। सबसे लोकप्रिय उपायों में से एक है बीस-बीस-बीस का नियम, यानी हर बीस मिनट के इस्तेमाल के बाद बीस सेकंड के लिए करीब बीस फीट दूर स्थित किसी चीज पर नजर डालना।
इसके अलावा विशेषज्ञ स्क्रीन से नियमित अंतराल पर ब्रेक लेने, सोने से कम से कम एक घंटे पहले फोन का इस्तेमाल पूरी तरह बंद करने, बैठने की सही मुद्रा अपनाने, नियमित रूप से व्यायाम करने और रोजाना कुछ समय खुली हवा में बिताने की सलाह देते हैं। इन छोटी-छोटी आदतों को अपनाकर स्मार्टफोन के अत्यधिक इस्तेमाल से होने वाले दुष्प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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