
नई दिल्ली। यूरोप इन दिनों इतिहास की सबसे खतरनाक गर्मी की चपेट में है। 20 जून से शुरू हुई इस भीषण हीटवेव ने पूरे महाद्वीप को हिलाकर रख दिया है। फ्रांस की सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसी ने 1,000 से अधिक अतिरिक्त मौतों की आधिकारिक पुष्टि कर दी है और आशंका जताई जा रही है कि, मौतों का कुल आंकड़ा 1,300 के पार जा सकता है। जर्मनी, फ्रांस, इटली, ऑस्ट्रिया, चेक गणराज्य और पोलैंड सहित दर्जनों देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है और इंसानी जिंदगी से लेकर बिजली ग्रिड तक सब कुछ इस आग की लपटों में झुलस रहा है।
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WHO की चेतावनी-हर साल आएगी तबाही
विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक टेड्रोस एडनोम घेब्रेयेसस ने इस संकट पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि, इस वक्त यूरोप में करीब 15 करोड़ लोग भीषण गर्मी की मार झेल रहे हैं। सैकड़ों मौतें हो चुकी हैं, स्कूल बंद हैं और बिजली ग्रिड चरमरा रहे हैं।

उन्होंने सबसे डरावनी बात यह कही कि, जलवायु परिवर्तन के कारण जिस हीटवेव को कभी एक पीढ़ी में एक बार आने वाली आपदा समझा जाता था, वह अब हर साल की आम घटना बनती जा रही है। यह सुनने में जितना सरल लगता है, इसके मायने उतने ही भयावह हैं।
बुजुर्ग और कमजोर लोग चपेट में
फ्रांस की स्वास्थ्य एजेंसी ने साफ किया है कि, अब तक दर्ज हुई अधिकांश मौतें बुजुर्गों की हैं। नर्सिंग होम्स और एकाकी घरों में रह रहे वृद्ध लोग इस गर्मी में सबसे असहाय साबित हो रहे हैं। एजेंसी ने यह भी चेताया है कि, मौतों का पूरा आंकड़ा अभी सामने नहीं आया है क्योंकि नर्सिंग होम्स और निजी घरों में हुई मौतों का डेटा अभी भी इकट्ठा किया जा रहा है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक ऊंचे तापमान में रहने से हृदय, फेफड़े और मस्तिष्क पर भारी दबाव पड़ता है, जिन लोगों को पहले से मधुमेह, हृदय रोग या सांस की बीमारी है, उनके लिए यह गर्मी जानलेवा बन जाती है। रात का तापमान भी इतना ऊंचा बना हुआ है कि, शरीर को राहत मिलना मुश्किल हो गया है, और यही सबसे खतरनाक पहलू है।
कई रिकॉर्ड टूटे
जर्मनी, पोलैंड, चेक गणराज्य और ऑस्ट्रिया में तापमान ने दशकों पुराने सभी रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। ऑस्ट्रिया और चेक गणराज्य में 40 डिग्री से अधिक तापमान दर्ज किया गया। जर्मनी में ट्रेन सेवाएं प्रभावित हुईं और लीपजिग शहर में ट्राम सेवा पूरी तरह निलंबित कर दी गई क्योंकि पटरियां गर्मी के कारण झुकने का खतरा पैदा हो गया था। लोग दिन के वक्त घरों में दुबके रहे और शाम ढलने का इंतजार करते रहे।
इटली में हालात और भी विकट रहे। पो नदी का जलस्तर इतना गिर गया कि समुद्र का खारा पानी 18 किलोमीटर तक अंदर घुस आया। इससे कृषि भूमि और वेटलैंड्स को भारी नुकसान पहुंचा। गर्मी से बचने के लिए नदियों और झीलों में कूदे कई लोग डूबकर जान गंवा बैठे। इटली की परिवार मंत्री यूजेनिया रोसेला के 84 वर्षीय पति लुइगी कैवल्लारी गर्मी से बचने के लिए झील में कूदे और लापता हो गए।
बिजली, पानी और परिवहन ठप
इस हीटवेव ने सिर्फ इंसानी जानें नहीं ली हैं बल्कि पूरी व्यवस्था की कमर तोड़ दी है। कूलिंग की मांग इतनी बढ़ गई कि, यूरोप के बिजली ग्रिड लड़खड़ा उठे। फ्रांस में आंधी-तूफान के कारण 36,000 घरों में बिजली आपूर्ति बाधित हो गई। हंगरी के पाक्स परमाणु ऊर्जा संयंत्र को डेन्यूब नदी के पानी के अत्यधिक गर्म होने के कारण अपनी उत्पादन क्षमता घटानी पड़ी, क्योंकि रिएक्टर को ठंडा करने के लिए नदी का पानी उपयोग होता है।

नदियों का जलस्तर गिरने और पानी गर्म होने से जलविद्युत उत्पादन भी प्रभावित हुआ। कृषि क्षेत्र में फसलें झुलस गईं और पशुओं के लिए चारे-पानी का संकट गहराता जा रहा है। यूरोप की आर्थिक रीढ़ कही जाने वाली औद्योगिक उत्पादकता भी तेज गर्मी के कारण बुरी तरह प्रभावित हुई है।
जलवायु परिवर्तन ने बदहाल किए हालात
एक बड़ी और गंभीर समस्या यह है कि यूरोप के अधिकांश घर, कार्यालय, स्कूल और अस्पताल इतनी भीषण गर्मी को झेलने के लिए बने ही नहीं हैं। सदियों पुरानी इमारतें बिना एयर कंडीशनिंग के हैं। उत्तरी और मध्य यूरोप में लोगों को कभी जरूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि वहां गर्मियां आमतौर पर हल्की होती थीं, लेकिन अब जलवायु परिवर्तन ने सब कुछ बदल दिया है।
शहरों में कंक्रीट और कांच की ऊंची इमारतें दिन में सूरज की गर्मी सोखती हैं और रात में उसे वापस छोड़ती हैं, इससे शहरी क्षेत्रों में तापमान और भी अधिक हो जाता है। इसे अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट कहते हैं और यह यूरोप के बड़े शहरों में साफ दिख रहा है।
ग्लोबल वार्मिंग बनी वजह
वैज्ञानिक इस पर एकमत हैं कि, इस हीटवेव को इंसानी गतिविधियों से पैदा हुई ग्रीनहाउस गैसों ने 100 गुना अधिक संभावित बना दिया है। दो दशक पहले ऐसी गर्मी की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। आज यह सच्चाई है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण चरम मौसमी घटनाएं, चाहे वह बाढ़ हो, सूखा हो या हीटवेव, तेजी से और अधिक तीव्र होती जा रही हैं।
यूरोप वैसे भी दुनिया के सबसे तेजी से गर्म होते महाद्वीपों में शामिल है। बढ़ती बूढ़ी आबादी, कमजोर बुनियादी ढांचा और जलवायु अनुकूलन की कमी, यह तीनों मिलकर यूरोप को इस संकट के सामने और कमजोर बना रहे हैं।
ठंडी हवाओं से राहत
मौसम विज्ञानियों के अनुसार, पश्चिमी यूरोप में इस सप्ताह ठंडी हवाओं और आंधी-तूफान के आने से कुछ राहत मिल सकती है। फ्रांस के मौसम विभाग ने बताया है कि ज्यादातर इलाकों में भीषण गर्मी में कमी आई है, हालांकि उत्तर-पूर्वी हिस्सों में अभी भी सतर्कता जरूरी है। लेकिन मध्य यूरोप और बाल्कन क्षेत्र में गर्मी और बढ़ सकती है।

फ्रांस की स्वास्थ्य मंत्री स्टेफनी रिस्ट ने चेताया है कि, गर्मी का असर मौसम ठंडा होने के 10 दिन बाद तक बना रह सकता है। यानी अस्पतालों पर दबाव और मौतों का सिलसिला तुरंत नहीं रुकेगा। लोगों को सलाह दी गई है कि, दोपहर में बाहर न निकलें, खूब पानी पिएं और अपने आसपास के बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखें।
यूरोप की यह तबाही हमें आने वाले कल की झलक दे रही है। अगर कार्बन उत्सर्जन पर काबू नहीं पाया गया तो यह हर साल और भयंकर होता जाएगा।
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