NFHS-6 का खुलासा: भारत में बढ़ा स्वास्थ्य संकट, मोटापा, डायबिटीज और कुपोषण बेकाबू

भारत में इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां दो ऐसी विपरीत चुनौतियां एक साथ मुंह बाए खड़ी हैं, जो आपस में बिल्कुल अलग हैं, जहां एक तरफ देश का एक बड़ा वर्ग आधुनिक जीवनशैली, मोटापे और डायबिटीज जैसी बीमारियों की गिरफ्त में तेजी से आ रहा है, वहीं दूसरी ओर आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी कुपोषण और कम वजन जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है।

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चौंकाने वाले हैं NFHS-6, 2023-24 के आंकड़े

इस दोहरे संकट की तस्दीक हाल ही में जारी हुए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6, 2023-24) के ताजा और चौंकाने वाले आंकड़े करते है। यह रिपोर्ट साफ तौर पर रेखांकित करती है कि देश में पोषण से जुड़ी दो विपरीत और गंभीर समस्याएं समानांतर रूप से पैर पसार चुकी हैं। कई राज्यों में जहां लोग अत्यधिक वजन और मोटापे की गंभीर समस्या का सामना कर रहे हैं, वहीं उसी भौगोलिक क्षेत्र या आबादी के दूसरे छोर पर कुपोषण का अंधकार छाया हुआ है।

India in serious health crisis

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 के आंकड़ों पर नजर डालें तो देश में मोटापे और अधिक वजन की समस्या किसी महामारी की तरह बढ़ती हुई दिखाई दे रही है। सर्वे के मुताबिक, देश में 15 से 49 वर्ष के उत्पादक आयु वर्ग में शामिल लगभग 30.7 प्रतिशत महिलाएं और 27.3 प्रतिशत पुरुष अब अधिक वजन या मोटापे की श्रेणी में आ चुके हैं। यह स्थिति इसलिए भी ज्यादा डरावनी है क्योंकि पिछले सर्वेक्षण यानी एनएफएचएस-5 की तुलना में इस बार यह वृद्धि बहुत तेज गति से दर्ज की गई है।

हवा-हवाई साबित हो रहे सरकारी दावे

अगर इस समस्या का भौगोलिक विश्लेषण किया जाए, तो शहरी क्षेत्रों में हालात और भी ज्यादा बदतर और चिंताजनक नजर आते हैं।  भारत के शहरों में रहने वाली लगभग 43 प्रतिशत महिलाएं और 36.3 प्रतिशत पुरुष मोटापे या सामान्य से अधिक वजन की समस्या से सीधे तौर पर प्रभावित हैं।  शारीरिक सक्रियता की कमी, प्रोसेस्ड फूड का अत्यधिक सेवन और बदलती जीवनशैली को इस खतरनाक बढ़त का मुख्य जिम्मेदार माना जा रहा है।

इस दोहरे संकट का दूसरा और सबसे दुखद पहलू यह है कि जहां देश का एक हिस्सा मोटापे से परेशान है।  वहीं दूसरी तरफ बुनियादी कुपोषण की समस्या खत्म होने का नाम नहीं ले रही है, बल्कि इसमें और इजाफा होता दिख रहा है।  सरकारी दावों और कई पोषण अभियानों के बावजूद धरातल पर स्थिति जस की तस या उससे भी खराब बनी हुई है।

रिपोर्ट के बेहद चिंताजनक आंकड़े बताते हैं कि देश में आज भी लगभग हर पांचवां वयस्क कम वजन की श्रेणी में जीवन जीने को मजबूर है।  पुरुषों के मामले में कम वजन की दर पिछले आंकड़ों के 16.2 प्रतिशत से सीधे उछलकर 19.7 प्रतिशत पर पहुंच गई है।  ठीक इसी तरह, महिलाओं में भी यह आंकड़ा 18.7 प्रतिशत से बढ़कर 19.7 प्रतिशत तक जा पहुंचा है।  कुपोषण का यह बढ़ता ग्राफ यह साबित करने के लिए काफी है कि आर्थिक प्रगति के बावजूद देश में पोषण संबंधी असमानताएं और बुनियादी संसाधनों की कमी अभी भी पूरी मजबूती के साथ बरकरार है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ी

एनएफएचएस-6 की इस विस्तृत रिपोर्ट ने देश में डायबिटीज (मधुमेह) के बढ़ते मामलों को लेकर भी जन-स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता को कई गुना बढ़ा दिया है. सर्वेक्षण के अनुसार, 15 वर्ष से अधिक उम्र की 17.8 प्रतिशत महिलाओं में ब्लड शुगर (रक्त शर्करा) का स्तर सामान्य से काफी अधिक पाया गया है या फिर वे इसके नियंत्रण के लिए नियमित रूप से डायबिटीज की दवाओं का सेवन कर रही हैं।

पुरुषों की बात करें तो यह स्थिति और भी भयानक रूप ले चुकी है। पुरुषों में यह आंकड़ा 20.9 प्रतिशत दर्ज किया गया है, जिसका सीधा और सरल मतलब यह है कि देश का हर पांचवां पुरुष आज की तारीख में डायबिटीज से पीड़ित है या पूरी तरह से दवाओं पर निर्भर हो चुका है। पिछले सर्वेक्षणों की तुलना में यह संख्या बहुत बड़ी छलांग को दर्शाती है।

India in serious health crisis

रिपोर्ट में भारत के अलग-अलग राज्यों के बीच स्वास्थ्य और पोषण के स्तर पर एक बड़ा असंतुलन और क्षेत्रीय भिन्नता भी खुलकर सामने आई है। देश के कुछ खास राज्यों में जहां संपन्नता और जीवनशैली जनित बीमारियां बढ़ रही हैं, वहीं कुछ राज्य बुनियादी पोषण के लिए तरस रहे हैं।

मोटापे से प्रभावित राज्य 

पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत मजबूत माने जाने वाले राज्यों में मोटापे और अधिक वजन के मामलों में उल्लेखनीय और भारी वृद्धि दर्ज की गई है।

कुपोषण से प्रभावित राज्य

दूसरी ओर, बिहार, झारखंड, राजस्थान, असम, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कुपोषण और कम वजन की समस्या लगातार पैर पसारती हुई दिखाई दे रही है, जो इन राज्यों में स्वास्थ्य सेवाओं और पोषण योजनाओं की पहुंच पर सवाल खड़े करती है.

यूपी कर रहा त्रिकोणीय संकट का सामना

इन सबके बीच, उत्तर प्रदेश एक ऐसे संवेदनशील राज्य के रूप में उभरा है जहां मोटापा, कुपोषण और डायबिटीज तीनों ही मोर्चों पर मामलों में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो राज्य के लिए एक बड़े रेड अलर्ट की तरह है।

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां स्वास्थ्य के मोर्चे पर हालात बेहद गंभीर मोड़ ले चुके हैं। राज्य में डायबिटीज के मरीजों की संख्या और इसके बढ़ने की रफ्तार राष्ट्रीय औसत की तुलना में कहीं ज्यादा तेज दर्ज की गई है। उत्तर प्रदेश में हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि अब प्रदेश का लगभग हर पांचवां पुरुष और हर छठी महिला इस साइलेंट किलर बीमारी की चपेट में आ चुकी है।

महिलाएं: पूरे देश में महिलाओं के बीच मधुमेह (डायबिटीज) बढ़ने की दर जहां 4.3 प्रतिशत दर्ज की गई है, वहीं उत्तर प्रदेश में यह दर राष्ट्रीय औसत को पीछे छोड़ते हुए 5.5 प्रतिशत के ऊंचे स्तर तक पहुंच चुकी है।

पुरुष: पुरुषों के मामले में तो यह अंतर और भी ज्यादा डराने वाला है, जहां राष्ट्रीय स्तर पर पुरुषों में डायबिटीज की वृद्धि दर 5.3 प्रतिशत है, वहीं उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा लगभग 8 प्रतिशत दर्ज किया गया है। यह आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश को अपनी स्वास्थ्य नीतियों में तत्काल और बड़े बदलाव करने की आवश्यकता है।

ब्लड प्रेशर के मोर्चे पर राहत 

इन तमाम चिंताजनक और डराने वाले आंकड़ों के बीच ब्लड प्रेशर के मोर्चे पर देश के लिए कुछ राहत भरी खबर जरूर देखने को मिली है। राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं और पुरुषों, दोनों ही वर्गों में हाई ब्लड प्रेशर की समस्या की दर में पिछली बार के मुकाबले एक हल्की और सकारात्मक गिरावट दर्ज की गई है।

हालांकि, इस मामूली गिरावट के बाद भी जश्न मनाने या बेफिक्र होने का समय बिल्कुल नहीं है। इस सुधार के बावजूद आज भी देश का लगभग हर पांचवां वयस्क हाई ब्लड प्रेशर की गंभीर समस्या से प्रभावित है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और डॉक्टरों के अनुसार, यह स्थिति बेहद खतरनाक है क्योंकि हाई बीपी सीधे तौर पर हमारे शरीर के मुख्य अंगों पर हमला करता है। यह आज भी देश में हार्ट अटैक (हृदय रोग), ब्रेन स्ट्रोक और किडनी फेलियर जैसी जानलेवा और गंभीर बीमारियों के सबसे बड़े और प्रमुख जोखिम कारकों में से एक बना हुआ है।

भारत सरकार के लिए गंभीर चेतावनी

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 की यह विस्तृत रिपोर्ट भारत सरकार, नीति निर्माताओं और पूरे समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी की तरह है। यह रिपोर्ट साफ करती है कि भारत केवल एक ही तरह की स्वास्थ्य समस्या से नहीं लड़ रहा है। देश के सामने चुनौती यह है कि उसे एक तरफ तो मोटापे और डायबिटीज जैसी शहरी व आधुनिक जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों पर लगाम लगानी है, और दूसरी तरफ ग्रामीण व गरीब तबके में व्याप्त कुपोषण और भुखमरी को जड़ से खत्म करना है।

 

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