
40 चालीस की उम्र पार करते ही शरीर में कई तरह के बदलाव नजर आने लगते हैं, लेकिन इनमें से एक बदलाव ऐसा है, जिस पर अक्सर लोगों का ध्यान नहीं जाता। वह है मांसपेशियों यानी मसल्स का धीरे-धीरे कम होना। यह प्रक्रिया इतनी धीमी होती है कि, शुरुआत में इसका एहसास तक नहीं होता, लेकिन समय के साथ शरीर की ताकत, संतुलन और रोजमर्रा की गतिविधियों पर इसका सीधा असर पड़ने लगता है। चिकित्सा विज्ञान में इस स्थिति को सार्कोपीनिया कहा जाता है यानी उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशियों के द्रव्यमान और ताकत में स्वाभाविक कमी।
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मसल्स घटने की वजह
हेल्थ एक्सपर्ट्स कहते हैं कि, मांसपेशियों की कमी की प्रक्रिया वास्तव में 30 की उम्र के आसपास से ही शुरू हो जाती है, लेकिन इसके असर 40 की उम्र के बाद ज्यादा साफ नजर आने लगते हैं। इसकी कई वजहें मानी जाती हैं।
सबसे पहली और महत्वपूर्ण वजह है हार्मोन में बदलाव। उम्र बढ़ने के साथ शरीर में ग्रोथ हार्मोन, टेस्टोस्टेरोन और महिलाओं में एस्ट्रोजन जैसे हार्मोन का स्तर धीरे-धीरे कम होने लगता है। ये हार्मोन मांसपेशियों के निर्माण और मरम्मत में अहम भूमिका निभाते हैं, इसलिए इनका स्तर घटने से मांसपेशियों का बनना धीमा पड़ जाता है।

दूसरी बड़ी वजह है शारीरिक सक्रियता में कमी। 40 की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते ज्यादातर लोगों की जीवनशैली गतिहीन होने लगती है। दफ्तर का लंबा बैठने वाला काम, यात्रा में लगने वाला समय और घरेलू जिम्मेदारियों के बीच व्यायाम के लिए समय निकालना मुश्किल हो जाता है। जब मांसपेशियों का इस्तेमाल कम होता है, तो शरीर स्वाभाविक रूप से उन्हें बनाए रखने की प्राथमिकता कम कर देता है, जिससे मांसपेशियां कमजोर पड़ने लगती हैं।
तीसरी वजह है पोषण। उम्र बढ़ने के साथ शरीर में प्रोटीन को अवशोषित करने और उसका इस्तेमाल करने की क्षमता भी कम होती जाती है। अगर खानपान में पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन शामिल न हो, तो मांसपेशियों की टूट-फूट की भरपाई ठीक से नहीं हो पाती, जिससे मांसपेशियों का क्षरण और तेज हो जाता है।
इसके अलावा नींद की गुणवत्ता में कमी, बढ़ता तनाव और पुरानी बीमारियां जैसे थायरॉइड की समस्या, डायबिटीज या जोड़ों से जुड़े रोग भी मांसपेशियों के कमजोर होने की रफ्तार को बढ़ा सकते हैं।
शुरुआती लक्षण
मांसपेशियों की कमी की शुरुआत अक्सर बहुत हल्के-फुल्के संकेतों से होती है, जिन्हें लोग आमतौर पर सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। इनमें से कुछ प्रमुख लक्षण इस तरह हैं।
शरीर में पहले की तुलना में जल्दी थकान महसूस होना, रोजमर्रा के काम जैसे सीढ़ियां चढ़ना, भारी सामान उठाना या लंबी दूरी तक चलना पहले से ज्यादा मुश्किल लगना,
हाथ-पैरों में पहले जैसी मजबूती महसूस न होना
शरीर के संतुलन में कमी आना और बार-बार लड़खड़ाहट महसूस होना तथा हाथ-पैरों का आकार धीरे-धीरे पतला होते जाना, भले ही वजन में कोई खास बदलाव न आए।
अगर लगातार कुछ महीनों तक इस तरह के लक्षण महसूस हों, तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर रहता है, क्योंकि समय रहते पहचान होने पर इस स्थिति को नियंत्रित करना काफी आसान हो जाता है।
मसल्स कमजोर होने से जुड़े खतरे
मांसपेशियों का कमजोर होना सिर्फ शारीरिक ताकत कम होने तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञ कहते हैं, यह शरीर के मेटाबॉलिज्म यानी चयापचय दर को भी प्रभावित करता है, क्योंकि मांसपेशियां शरीर में ऊर्जा खर्च करने का एक बड़ा माध्यम होती हैं। मांसपेशियां कम होने पर मेटाबॉलिज्म धीमा हो सकता है, जिससे वजन बढ़ने की आशंका भी बढ़ जाती है।
इसके अलावा कमजोर मांसपेशियां जोड़ों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती हैं, जिससे घुटनों और कमर दर्द जैसी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं। बढ़ती उम्र में संतुलन बिगड़ने और गिरने की घटनाएं भी मांसपेशियों की कमजोरी से जुड़ी मानी जाती हैं, जो खासतौर पर बुजुर्गों के लिए गंभीर चोट का कारण बन सकती हैं।
बचाव के तरीके
- राहत की बात यह है कि सही जीवनशैली अपनाकर मांसपेशियों की कमी की इस प्रक्रिया को काफी हद तक धीमा किया जा सकता है, बशर्ते समय रहते इस पर ध्यान दिया जाए।
- नियमित व्यायाम इसमें सबसे अहम भूमिका निभाता है, खासकर वेट ट्रेनिंग या रेजिस्टेंस एक्सरसाइज जैसे हल्के डंबल उठाना, बॉडीवेट एक्सरसाइज या रेसिस्टेंस बैंड का इस्तेमाल।
- हफ्ते में कम से कम दो से तीन दिन इस तरह के व्यायाम को शामिल करने से मांसपेशियों को मजबूती मिलती है। इसके साथ ही तेज चलना, तैराकी या साइकिलिंग जैसी गतिविधियां भी संपूर्ण शारीरिक फिटनेस बनाए रखने में मददगार होती हैं।
- खानपान में पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन को शामिल करना भी जरूरी माना जाता है। जैसे दाल, अंडा, पनीर, दूध, दही, मछली, चिकन, सोयाबीन और मेवे जैसे प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों को नियमित आहार का हिस्सा बनाने की सलाह दी जाती है।
- इसके अलावा शरीर में विटामिन डी और कैल्शियम की पर्याप्त मात्रा भी हड्डियों और मांसपेशियों की सेहत के लिए जरूरी मानी जाती है, जिसके लिए सुबह की धूप और संतुलित आहार मददगार साबित हो सकते हैं।
- पर्याप्त और गहरी नींद लेना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि शरीर की मांसपेशियों की मरम्मत और रिकवरी की प्रक्रिया मुख्य रूप से नींद के दौरान ही होती है। इसके साथ ही तनाव को नियंत्रित रखना भी जरूरी है, क्योंकि लगातार तनाव शरीर में ऐसे हार्मोन बढ़ा सकता है जो मांसपेशियों के क्षरण को तेज करते हैं।
नियमित जांच
40 की उम्र के बाद साल में एक बार सामान्य स्वास्थ्य जांच कराना भी फायदेमंद माना जाता है, ताकि थायरॉइड, डायबिटीज, विटामिन डी की कमी या हार्मोनल असंतुलन जैसी समस्याओं का समय रहते पता चल सके। ये सभी स्थितियां मांसपेशियों की कमी को बढ़ावा दे सकती हैं। शुरुआती चरण में इनकी पहचान होने पर सही इलाज और जीवनशैली में बदलाव के जरिए इन्हें काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
40 की उम्र के बाद मांसपेशियों का कमजोर होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इसे रोका नहीं जा सकता। सही खानपान, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच के जरिए इस प्रक्रिया की रफ्तार को काफी हद तक धीमा किया जा सकता है। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज करने के बजाय समय रहते जीवनशैली में जरूरी बदलाव किए जाएं, ताकि उम्र बढ़ने के साथ भी शरीर सक्रिय, मजबूत और स्वस्थ बना रहे।
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