न्याय में देरी पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा एक्शन, 3 महीने में सुनाना होगा रिजर्व फैसला

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने न्याय वितरण व्यवस्था में लंबे समय से चली आ रही एक बड़ी समस्या पर सख्त रुख अपनाते हुए सभी हाईकोर्ट्स के लिए महत्वपूर्ण दिशानिर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने कहा है कि कोई भी फैसला रिजर्व करने के बाद तीन महीने के अंदर उसे सुनाया जाना अनिवार्य है। यदि तीन महीने में फैसला नहीं सुनाया जाता, तो संबंधित हाईकोर्ट का रजिस्ट्रार जनरल मामले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखेगा।

इसे भी पढ़ें-   सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, स्कूल में लड़कियों को दें सेनेटरी पैड, नहीं तो रद्द कर दी जाएगी मान्यता

दूसरी बेंच को ट्रांसफर हो जायेगा केस

मुख्य न्यायाधीश अधिकतम दो सप्ताह का अतिरिक्त समय दे सकते हैं। इसके बाद भी अगर फैसला नहीं सुनाया गया तो केस स्वतः दूसरी बेंच को ट्रांसफर कर दिया जाएगा। यह फैसला न्याय की देरी को कम करने और जनता के न्यायपालिका में विश्वास को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। मुख्य आदेश के 15 दिनों में पूरा फैसला अपलोड करना जरूरी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि फैसले का ऑपरेटिव पार्ट (मुख्य आदेश) सुनाए जाने के 15 दिनों के अंदर पूरा फैसला हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किया जाना चाहिए।

15 दिन में अपलोड हो केस 

यदि 15 दिनों में पूरा फैसला अपलोड नहीं किया जाता तो पक्षकार एप्लीकेशन दाखिल कर सकते हैं। अगर 30 दिनों तक पूरा फैसला अपलोड नहीं होता है, तो पक्षकार केस को वापस लेने या दूसरी बेंच में सुनवाई के लिए आवेदन दे सकेंगे। कोर्ट ने यह भी अनिवार्य किया है कि, बहस पूरी होने के बाद फैसला रिजर्व करने की तारीख हाईकोर्ट की वेबसाइट पर सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित की जाए। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और पक्षकारों को अनिश्चितता का सामना नहीं करना पड़ेगा।

Supreme Court of India b

जमानत मामलों में अगले दिन ही फैसला सुनाना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने जमानत से जुड़े मामलों पर विशेष जोर देते हुए कहा कि इन मामलों में ऑर्डर रिजर्व होने के अगले दिन ही फैसला सुनाया जाना चाहिए। फैसला सुनाए जाने के तुरंत बाद जेल अधिकारियों को सूचित किया जाए और अंडरट्रायल कैदी को उसी दिन या अधिकतम अगले दिन रिहा कर दिया जाए। ट्रायल कोर्ट को इसकी अनुपालन रिपोर्ट हाईकोर्ट को भेजनी होगी।

झारखंड हाईकोर्ट मामले में आया बड़ा फैसला

यह महत्वपूर्ण दिशानिर्देश झारखंड हाईकोर्ट में लंबित एक याचिका पर सुनवाई के दौरान जारी किए गए। याचिकाकर्ताओं ने शिकायत की थी कि उनकी आपराधिक अपीलों पर अंतिम बहस पूरी होने के बाद दो-तीन साल तक फैसले रिजर्व पड़े रहे, लेकिन उन्हें सुनाया नहीं गया। जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने इस शिकायत को बेहद गंभीरता से लिया और मामले का दायरा बढ़ाते हुए सभी हाईकोर्ट्स से रिपोर्ट मांगी।

सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट्स से पूछा कि कितने मामलों में फैसले महीनों या वर्षों से रिजर्व पड़े हुए हैं। कोर्ट ने कहा कि फैसलों में अनावश्यक देरी न्याय वितरण व्यवस्था की विश्वसनीयता को कमजोर करती है और आम जनता का न्यायपालिका पर भरोसा घटता है।

न्याय में देरी का लंबा इतिहास

भारत में न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक फैसलों को रिजर्व रखने के बाद लंबे समय तक नहीं सुनाना रही है। कई हाईकोर्ट्स में ऐसे सैकड़ों मामले हैं जिनमें बहस पूरी होने के बाद छह महीने, एक साल या उससे भी ज्यादा समय तक फैसला सुरक्षित रखा जाता है।

इस वजह से हजारों मुकदमेबाज सालों तक अनिश्चितता की स्थिति में जीने को मजबूर होते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सुनिश्चित है, जिसमें समय पर न्याय मिलना भी शामिल है। देरी से न्याय मिलना, न्याय न मिलने के बराबर है।

इन दिशानिर्देशों का असर

विशेषज्ञों का मानना है कि, सुप्रीम कोर्ट के इन सख्त निर्देशों से हाईकोर्ट्स में फैसलों की घोषणा और अपलोड करने की प्रक्रिया में तेजी आएगी। खासकर जमानत, आपराधिक अपीलों और पारिवारिक मामलों में राहत मिलने की उम्मीद है। हाईकोर्ट्स के रजिस्ट्रार जनरल को अब इन दिशानिर्देशों को अपने मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखना होगा और उनकी सख्ती से पालन सुनिश्चित करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने साफ चेतावनी दी है कि इन निर्देशों का उल्लंघन गंभीरता से लिया जाएगा।

यह फैसला उन हजारों मुकदमेबाजों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है जो सालों से अपने मामलों के फैसले का इंतजार कर रहे हैं। न्यायपालिका में सुधार की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है, जो न्याय को न सिर्फ सुलभ बल्कि समयबद्ध बनाने की दिशा में काम करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट्स को इन दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन करने को कहा है। आने वाले समय में देखना होगा कि हाईकोर्ट्स इन निर्देशों को कितनी प्रभावी ढंग से लागू करते हैं।

 

इसे भी पढ़ें- UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, 2012 के नियम ही रहेंगे लागू

Related Articles

Back to top button