100 सबसे गर्म शहरों में 97 भारत के, वैज्ञानिकों ने बताया कितने तापमान के बाद फेल होने लगते हैं इंसान के अंग

दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों की सूची पर जब भी बात होती है, तो अमूमन लोगों के जेहन में सूडान, ईरान या मिडिल ईस्ट के अंतहीन रेगिस्तानों का नाम आता है, लेकिन मई 2026 की तपती और झुलसाती हकीकत ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है। ग्लोबल वार्मिंग और मौसम चक्र में आए भयानक बदलाव के कारण इस साल दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों की सूची में से रिकॉर्ड 97 शहर अकेले भारत के हैं।

इसे भी पढ़ें- जनता दर्शन में सीएम योगी ने सुनीं समस्याएं, कहा- ‘गर्मी बहुत है, ध्यान रखो’

चंद घंटों में हो सकती है मौत

यह कोई सामान्य आंकड़ा नहीं, बल्कि एक डरावनी सच्चाई है, जिसने पूरे देश को एक सुलगती भट्टी में तब्दील कर दिया है। ओडिशा का बालंगीर हो, बिहार का सासाराम या फिर उत्तर प्रदेश का बांदा और वाराणसी, इन सभी शहरों में पारा 48 डिग्री सेल्सियस के पार जा चुका है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में अब तक दर्जनों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि, आखिर आसमान से बरसती यह आग हमारे शरीर के भीतर ऐसा क्या गदर मचाती है कि, हंसता-खेलता इंसान चंद घंटों में मौत की आगोश में सो जाता है? वैज्ञानिकों और डॉक्टरों ने अब इस पूरी प्रक्रिया का बेहद खौफनाक और विस्तृत खुलासा किया है।

heatwave

चिकित्सा विज्ञान के नजरिए से देखें, तो इंसानी शरीर के भीतर गर्मी के खिलाफ एक बेहद बारीक और जटिल युद्ध चलता है। अमूमन हम थर्मामीटर पर केवल हवा का तापमान देखते हैं, लेकिन वैज्ञानिक मौत की इस दहलीज को मापने के लिए वेट-बल्ब टेम्परेचर का इस्तेमाल करते हैं। यह हवा के तापमान और उसमें मौजूद नमी यानी ह्यूमिडिटी का एक ऐसा जानलेवा कॉम्बिनेशन है, जो सीधे हमारे शरीर के कूलिंग सिस्टम पर हमला करता है। सामान्य परिस्थितियों में जब हमारे शरीर का तापमान बढ़ता है, तो दिमाग पसीना बहाने का आदेश देता है।

पसीना सूखना बंद हो जाता है

यह पसीना जब हवा में उड़ता है, तो शरीर ठंडा हो जाता है, लेकिन जब हवा में नमी का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, तो पसीना सूखना बंद हो जाता है। लंबे समय तक वैज्ञानिक मानते थे कि, 35 डिग्री सेल्सियस का वेट-बल्ब तापमान इंसानी बर्दाश्त की आखिरी सीमा है, लेकिन पेन स्टेट यूनिवर्सिटी की ताजा रिसर्च ने इस भ्रम को तोड़ दिया है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि, स्वस्थ और युवा लोगों का शरीर भी महज 31 डिग्री सेल्सियस के वेट-बल्ब तापमान पर घुटने टेकने लगता है। इसका सीधा मतलब यह है कि, अगर हवा में नमी 60 फीसदी से ऊपर है, तो 38 डिग्री सेल्सियस की सामान्य सी दिखने वाली गर्मी भी किसी भी इंसान को मौत की नींद सुला सकती है।

जब शरीर खुद को ठंडा करने के इस चक्रव्यूह में पूरी तरह हार जाता है, तो मौत का तांडव तीन अलग-अलग स्तरों पर शुरू होता है, जिसे चिकित्सा विज्ञान की भाषा में हीटस्ट्रोक, कार्डियक अरेस्ट और डिहाइड्रेशन शॉक कहा जाता है। इसमें सबसे पहला और घातक हमला आंतों और पेट पर होता है। यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी के विशेषज्ञों के मुताबिक, जब शरीर का अंदरूनी तापमान 40 डिग्री सेल्सियस को पार कर जाता है, तो दिमाग खुद को और त्वचा को ठंडा रखने के लिए पूरे शरीर के खून की सप्लाई को चमड़ी की तरफ मोड़ देता है।

मरने लगती हैं आंतों की कोशिकाएं

इस आपातकालीन स्थिति के कारण पेट और आंतों जैसे महत्वपूर्ण अंगों तक खून और जीवनदायिनी ऑक्सीजन पहुंचना पूरी तरह बंद हो जाता है। ऑक्सीजन न मिलने के कारण आंतों की कोशिकाएं मरने लगती हैं और आंतों के भीतर मौजूद खतरनाक बैक्टीरिया और जहरीले टॉक्सिन्स रिसकर सीधे मुख्य ब्लड स्ट्रीम में मिलने लगते हैं। यह जहर पूरे शरीर में फैलते ही एक खतरनाक चेन रिएक्शन शुरू करता है, जिससे नसों के भीतर खून के थक्के जमने लगते हैं। इसके बाद शरीर के अंग एक-एक करके काम करना बंद कर देते हैं और देखते ही देखते किस्सा खत्म हो जाता है।

गर्मी का दूसरा सबसे बड़ा शिकार इंसान का दिल बनता है। आपातकालीन चिकित्सा के डॉक्टरों का कहना है कि जब बाहरी तापमान 45 डिग्री के पार होता है, तो शरीर को सामान्य रखने के लिए दिल को किसी मैराथन धावक की तरह कई गुना तेजी से धड़कना पड़ता है। त्वचा तक खून पहुंचाने के लिए दिल पर पड़ने वाला यह दबाव इतना जबरदस्त होता है कि, पहले से ही कमजोर दिल वाले मरीजों के लिए यह जानलेवा साबित होता है।

फट सकती हैं दिल की नसें

इसे विशेषज्ञों ने एक बेहद सटीक उदाहरण से समझाया है कि, यह किसी खराब या चोटिल जांघ की मांसपेशी के साथ जबरन ओलंपिक की रेस दौड़ने जैसा है, जहां दिल की नसें अत्यधिक तनाव के कारण अचानक फट जाती हैं या काम करना बंद कर देती हैं। इसके साथ ही, पसीने के रास्ते शरीर का सारा पानी और जरूरी नमक बाहर बह जाने से तीसरा बड़ा संकट डिहाइड्रेशन शॉक के रूप में सामने आता है।

पानी की भारी किल्लत के कारण खून गाढ़ा हो जाता है, जिससे किडनी पर दबाव बढ़ता है और वह पूरी तरह फेल हो जाती है। खून का दबाव गिरने से दिमाग को ऑक्सीजन मिलना बंद हो जाती है, जिससे इंसान पहले अजीब हरकतें करने लगता है, पूरी तरह भ्रमित हो जाता है और फिर बेहोश होकर हमेशा के लिए कोमा में चला जाता है।

सामने नहीं आ पाते वास्तविक आंकड़े

हैरान करने वाली बात यह भी है कि, सरकारी दस्तावेजों में दर्ज मौतों के आंकड़े इस खौफनाक असलियत का एक छोटा सा हिस्सा मात्र हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की रिपोर्ट बताती है कि, हीटवेव के दौरान होने वाली ज्यादातर मौतों को कभी गर्मी से जोड़ा ही नहीं जाता। उदाहरण के लिए, अगर किसी बुजुर्ग की मौत गर्मी के कारण पड़े दिल के दौरे या किडनी फेल होने से होती है, तो उसे कागजों पर हार्ट अटैक या ऑर्गन फेलियर ही लिखा जाता है, न कि हीटवेव।

heatwave

ग्रामीण इलाकों में तो बिना पोस्टमार्टम के होने वाले अंतिम संस्कारों के कारण वास्तविक आंकड़े कभी सामने ही नहीं आ पाते, जिससे यह साफ है कि, गर्मी से होने वाली मौतों का असली आंकड़ा आधिकारिक दावों से कहीं ज्यादा भयावह है।

मौसम वैज्ञानिकों और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने साफ कर दिया है कि, फिलहाल इस आसमानी आफत से तुरंत राहत मिलने की कोई उम्मीद नहीं है। देश के अधिकांश हिस्सों, खासकर दिल्ली-एनसीआर और उत्तर प्रदेश में आने वाले दिनों के लिए सीवियर हीटवेव का ऑरेंज और रेड अलर्ट जारी किया गया है, जहां पारा 46 डिग्री के आसपास बना रहेगा।

28 मई के बाद कम हो जाएगी गर्मी

हालांकि 28 मई के बाद एक पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने से तेज आंधी और बूंदाबांदी की संभावना है, जिससे तापमान में मामूली गिरावट आ सकती है। तब तक के लिए डॉक्टरों ने सख्त हिदायत दी है कि, दोपहर 12 से 3 बजे के बीच बिना किसी बेहद जरूरी काम के घरों से बाहर न निकलें। शरीर में पानी का स्तर बनाए रखने के लिए केवल सादा पानी ही नहीं, बल्कि ओआरएस, नींबू पानी, कच्चा प्याज, मट्ठा और नारियल पानी जैसी चीजों का लगातार सेवन करते रहें, जो खून को गाढ़ा होने और अंगों को फेल होने से बचाने में सबसे कारगर हथियार हैं।

इसे भी पढ़ें- लखनऊ में आंधी-पानी में मचाया तांडव, कई इलाकों में बत्ती गुल-उड़े टेंट, गर्मी से मिली राहत

Related Articles

Back to top button