सऊदी अरब ने ईरान को दी सैन्य कार्रवाई की चेतावनी, धर्मसंकट में पाकिस्तान, क्या लागू होगा ‘नाटो’ स्टाइल रक्षा समझौता

रियाद। मिडिल ईस्ट में इन दिनों भयंकर युद्ध चल रहा है, जिसकी आंच अब वेस्ट एशिया यानी मिडिल ईस्ट तक पहुंचने लगी है, जो पहले से ही अमेरिका और इजराइल से जंग लड़ रहे ईरान को चपेट में ले सकता है। दरअसल, ईरान की तरफ से सऊदी अरब पर बार-बार हमले किये जा रहे हैं, जिसे लेकर अब सऊदी अरब ने भी खुली चेतावनी दे दी है कि, अपनी सुरक्षा के लिए ईरान के खिलाफ उसे भी सैन्य कार्रवाई का अधिकार है।

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विदेश मंत्री ने अपनाया कड़ा रुख

रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अब ईरान के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार कर चुके हैं। साथ ही पाकिस्तान के साथ रक्षा नजदीकियों में भी इजाफा देखने को मिल रहा है, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि, यदि रियाद की सुरक्षा पर कोई आंच आती है, तो उसकी गूंज सीधे इस्लामाबाद तक सुनाई देगी। दरअसल, इस्लामिक नाटो की तर्ज पर हुए दोनों देशों के बीच के रक्षा समझौते की वजह अब यह गंभीर सवाल खड़ा हो गया है कि, क्या पाकिस्तान अपनी आर्थिक बदहाली और घरेलू अशांति के बीच सऊदी अरब के लिए ईरान के खिलाफ दूसरा मोर्चा खोलने की हिम्मत जुटा पाएगा।

IranConflict

रियाद में क्षेत्र के प्रमुख देशों के विदेश मंत्रियों की एक उच्चस्तरीय बैठक के बाद सऊदी अरब ने अपने पारंपरिक कूटनीतिक लहजे को किनारे रखकर सीधे सैन्य भाषा का प्रयोग करना शुरू कर दिया है। प्रिंस फैसल बिन फरहान ने स्पष्ट किया कि, ईरान अपने मिसाइल और ड्रोन हमलों के जरिए पड़ोसी देशों पर अनुचित दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है, जिसे सऊदी अरब कतई बर्दाश्त नहीं करेगा।

सैन्य कार्रवाई कर सकता है रियाद

उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि, ईरान की तरफ से हो रहे हमलों का जवाब देने का अधिकार उनकी सेना सुरक्षित रखती है और अब वे किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं कर सकते। सऊदी अरब का यह रुख उस समय आया है, जब इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष पहले ही चरम पर है और रियाद अब अपनी पुरानी रणनीतिक धैर्य की नीति को त्यागकर सक्रिय रक्षा की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम की सबसे खास बात ये रही कि, इस उच्चस्तरीय बैठक में पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार भी मौजूद रहे। पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच पिछले साल हुए ‘स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट’ ने इस मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।

यह समझौता पूरी तरह से नाटो के चार्टर 5 की तरह काम करता है, जिसके तहत किसी भी एक देश पर हमला दोनों देशों पर हमला माना जाता है। इस समझौते के चलते यदि सऊदी अरब आधिकारिक तौर पर ईरान के साथ युद्ध में उतरता है, तो पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय कानूनी और सैन्य बाध्यता के तहत इस लड़ाई में शामिल होने के लिए मजबूर हो जाएगा। बैठक के दौरान इशाक डार की सक्रियता ने दुनिया को यह संदेश दिया है कि, रियाद संकट की इस घड़ी में इस्लामाबाद को अपने साथ एक ढाल की तरह खड़ा देखना चाहता है।

संतुलित बयान दे रहे पाकिस्तान के नेता

हालांकि, पाकिस्तान इस समय एक अत्यंत कठिन कूटनीतिक और सामरिक दौर से गुजर रहा है। एक तरफ सऊदी अरब है जो उसका सबसे बड़ा वित्तीय और राजनीतिक मददगार है, तो दूसरी तरफ पड़ोसी देश ईरान है जिसके साथ उसकी सीमाएं जुड़ी हैं। पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व के लिए यह चुनौती बहुआयामी है क्योंकि ईरान के खिलाफ युद्ध में उतरने से उसके देश के भीतर सांप्रदायिक अशांति फैल सकती है।

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इसके अलावा पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक तौर पर इतना कमजोर हो चुका है कि वह जंग का खर्च उठाने से पूरी तरह से असमर्थ है। यही कारण है कि, पाकिस्तानी नेता बेहद संतुलित बयान दे रहे हैं। उन्होंने दावा किया है कि, वे लगातार ईरान के संपर्क में रहकर उसे सऊदी अरब पर हमला न करने के लिए मनाने की कोशिश कर रहे हैं।

ईरान और इजरायल के बीच छिड़े युद्ध के बाद से पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर और सऊदी रक्षा मंत्रालय के बीच बैठकों का सिलसिला काफी तेज हो गया है।

पाकिस्तान से मैन पावर मांग सकता है सऊदी

जानकारों का मानना है कि, सऊदी अरब अब केवल कागजी समझौतों से संतुष्ट नहीं है और वह संकट के समय पाकिस्तान से सक्रिय सैन्य सहयोग या मैनपावर की मांग कर सकता है। पाकिस्तान पहले भी सऊदी सीमाओं की रक्षा के लिए अपनी टुकड़ियां भेजता रहा है, लेकिन इस बार का परिदृश्य पूरी तरह अलग है क्योंकि मुकाबला किसी विद्रोही गुट से नहीं बल्कि एक क्षेत्रीय महाशक्ति से होगा।

अंततः सऊदी अरब की यह खुली धमकी ईरान के साथ-साथ पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी है कि, यदि ईरान अपनी विस्तारवादी नीतियों को नहीं रोकता है, तो सऊदी अरब पाकिस्तान और तुर्की जैसे सैन्य रूप से सक्षम देशों के साथ मिलकर एक नया रक्षा गठबंधन सक्रिय कर देगा जो पूरे क्षेत्र के नक्शे को बदल सकता है।

आपको बता दें कि, सऊदी अरब और ईरान के बीच दशकों छद्म युद्ध चल रहा है। ये युद्ध मध्य पूर्व में क्षेत्रीय वर्चस्व, धार्मिक विचारधारा (सुन्नी बनाम शिया) और भू-राजनीतिक प्रभाव के लिए है, जो अब सीधे सैन्य टकराव की स्थिति में पहुंच चुका है।

 

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