कितना घातक है स्टेज-4 लिवर कैंसर और क्यों असंभव है इलाज?, यहां जानें बचने के तरीके और शुरूआती लक्षण

भारतीय क्रिकेट के उभरते सितारे रिंकू सिंह के पिता खानचंद सिंह का शुक्रवार सुबह ग्रेटर नोएडा के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वह लंबे समय से स्टेज-4 लिवर कैंसर से जूझ रहे थे। एक रिपोर्ट के अनुसार, हाल के दिनों में उनकी हालत तेजी से खराब हुई थी। 21 फरवरी को उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया। आज सुबह उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। घटना की खबर से क्रिकेट जगत और रिंकू सिंह के लाखों प्रशंसक गहरे सदमे में हैं।

कैंसर

रिंकू सिंह आईपीएल में कोलकाता नाइट राइडर्स के लिए अपनी विस्फोटक बल्लेबाजी के लिए जाने जाते हैं और भारतीय टीम में भी जगह बना चुके हैं। इस समय वे परिवार के साथ गहरे दुख में डूबे हुए हैं। खानचंद सिंह एक साधारण किसान थे और अपने बेटे की सफलता का सबसे बड़ा सहारा बने रहे। रिंकू की क्रिकेट यात्रा में पिता का योगदान हमेशा चर्चा में रहा। उनकी मौत ने एक बार फिर लिवर कैंसर की खतरनाक प्रकृति और इस बीमारी के देर से पता चलने के घातक परिणामों को सामने ला दिया है। आइये जानते हैं लीवर कैंसर के लक्षण और बचने के उपाय।

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दुनिया भर में छठा सबसे आम कैंसर

हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि, लिवर कैंसर दुनिया भर में छठा सबसे आम कैंसर है और स्टेज-4 में पहुंचने के बाद इलाज बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और वर्ल्ड कैंसर रिसर्च फाउंडेशन की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर इस बीमारी के 8.66 लाख से अधिक नए मामले सामने आए थे।

पुरुषों में यह बीमारी महिलाओं की तुलना में कहीं अधिक आम है। पुरुषों में प्रति लाख में 12.7 मामले दर्ज किए गए जबकि महिलाओं में यह संख्या 4.8 रही। भारत में भी लिवर कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और यह बीमारी मुख्य रूप से हेपेटाइटिस बी और सी संक्रमण, शराब के अत्यधिक सेवन, फैटी लिवर रोग, मोटापा और पर्यावरणीय विषाक्त पदार्थों से जुड़ी हुई है।

लिवर कैंसर लिवर की कोशिकाओं में शुरू होने वाली एक जानलेवा बीमारी है। इसमें लिवर में कैंसर युक्त ट्यूमर बन जाते हैं और जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है वैसे-वैसे कैंसर की कोशिकाएं शरीर के अन्य हिस्सों में फैलने लगती हैं। सबसे आम प्रकार हेपेटोसेलुलर कार्सिनोमा है, जो लिवर की मुख्य कोशिकाओं यानी हेपेटोसाइट्स से शुरू होता है।

कभी-कभी कैंसर शरीर के अन्य अंगों जैसे कोलन, फेफड़े या ब्रेस्ट से फैलकर लिवर तक पहुंचता है जिसे मेटास्टेटिक लिवर कैंसर कहा जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि, एक बार कैंसर के अन्य अंगों में फैल जाने के बाद इलाज करना और मरीज की जान बचाना बहुत कठिन हो जाता है, इसलिए शुरुआती चरणों में ही बीमारी का पता लगाकर इलाज शुरू करना अत्यंत आवश्यक है। लिवर कैंसर मुख्य रूप से चार चरणों में बढ़ता है और प्रत्येक चरण के साथ खतरा बढ़ता जाता है।

ये हैं लक्षण

पहले चरण में लिवर में एक छोटा ट्यूमर होता है जो आमतौर पर 2 सेंटीमीटर से कम आकार का होता है। इस स्टेज में कैंसर आस-पास की ब्लड वेसल्स, लिम्फ नोड्स या अन्य अंगों में नहीं फैला होता। ज्यादातर मामलों में इस चरण में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते।  मरीज को हल्की थकान, ऊपरी दाहिने पेट में हल्का दर्द या थोड़ा वजन घटना जैसी शिकायत हो सकती है। इस चरण में सर्जरी से ट्यूमर हटाना, रेडियोफ्रीक्वेंसी एब्लेशन या ट्रांसआर्टेरियल चीमोएम्बोलाइजेशन जैसे उपचार से 70 से 80 प्रतिशत मरीज पूरी तरह ठीक हो जाते हैं और पांच साल की सर्वाइवल रेट 50 से 70 प्रतिशत तक रहती है।

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दूसरे चरण में ट्यूमर का आकार बढ़ जाता है और यह 5 सेंटीमीटर तक पहुंच सकता है। लिवर में एक से अधिक छोटे ट्यूमर भी हो सकते हैं। कैंसर आस-पास की छोटी ब्लड वेसल्स में फैलने लगता है, लेकिन बड़े वेसल्स या लिम्फ नोड्स प्रभावित नहीं होते। इस स्टेज में पेट में सूजन, भूख न लगना, जी मिचलाना और हल्का जॉन्डिस जैसे लक्षण दिखने लगते हैं। इलाज में सर्जरी, लिवर ट्रांसप्लांट, टीएसीई या सिस्टेमिक थेरेपी का सहारा लिया जाता है। पांच साल की सर्वाइवल रेट इस चरण में 30 से 50 प्रतिशत तक रहती है।

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तीसरे चरण में बीमारी काफी उन्नत हो जाती है। ट्यूमर 5 सेंटीमीटर से बड़ा हो जाता है या कई बड़े ट्यूमर बन जाते हैं। कैंसर आस-पास की बड़ी ब्लड वेसल्स जैसे पोर्टल वेन में फैल जाता है। लिम्फ नोड्स भी प्रभावित हो सकते हैं। इस स्टेज में गंभीर जॉन्डिस, पेट में पानी भरना यानी एसाइट्स, तेजी से वजन घटना, कमजोरी और बुखार जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। इलाज में टीएसीई, सिस्टेमिक थेरेपी जैसे सोराफेनिब या लेनवाटिनिब, इम्यूनोथेरेपी का उपयोग किया जाता है लेकिन सर्जरी मुश्किल हो जाती है। पांच साल की सर्वाइवल रेट इस चरण में केवल 10 से 20 प्रतिशत रह जाती है।

चौथा और अंतिम चरण सबसे खतरनाक होता है। इस स्टेज में कैंसर लिवर से बाहर फैल चुका होता है और हड्डियों, फेफड़ों, पेट के अन्य अंगों या दूर के लिम्फ नोड्स में पहुंच जाता है। ब्लड वेसल्स और लिम्फ नोड्स में भी व्यापक फैलाव होता है। मरीज को गंभीर दर्द, भारी थकान, पूरी तरह भूख न लगना, एसाइट्स, गहरा जॉन्डिस, मल में खून और तेजी से वजन घटना जैसी समस्याएं होती हैं। इलाज मुख्य रूप से पेलिएटिव केयर यानी दर्द प्रबंधन और जीवन की गुणवत्ता बनाए रखने पर केंद्रित होता है।

कीमोथेरेपी, टारगेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी से जीवन कुछ महीनों तक बढ़ाया जा सकता है, लेकिन पूर्ण इलाज लगभग असंभव हो जाता है। औसत सर्वाइवल समय 6 से 12 महीने रहता है और पांच साल की सर्वाइवल रेट महज 2 से 5 प्रतिशत होती है।  रिंकू सिंह के पिता इसी स्टेज-4 में थे जहां कैंसर दूर के अंगों में फैल चुका था और इलाज सीमित हो गया था।

इन वजहों से होता है लीवर कैंसर

लिवर कैंसर के प्रमुख जोखिम कारक हेपेटाइटिस बी और सी का संक्रमण, शराब का अत्यधिक सेवन, नॉन-एल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज, मोटापा, डायबिटीज और सिरोसिस हैं। भारत में हेपेटाइटिस बी और सी के संक्रमण के कारण यह बीमारी तेजी से फैल रही है। अफ्लाटॉक्सिन युक्त भोजन जैसे पुराने अनाज भी एक बड़ा कारण हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि, हेपेटाइटिस बी का वैक्सीनेशन, शराब का सीमित सेवन, स्वस्थ वजन बनाए रखना, नियमित लिवर फंक्शन टेस्ट और अल्ट्रासाउंड से उच्च जोखिम वाले लोगों में शुरुआती जांच संभव है। शुरुआती चरण में पता चलने पर 70 से 80 प्रतिशत मामलों में पूर्ण इलाज संभव होता है।

रिंकू सिंह के पिता की मौत ने क्रिकेट जगत को झकझोर दिया है। कोलकाता नाइट राइडर्स, भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ी और फैंस ने सोशल मीडिया पर गहरा शोक व्यक्त किया है। रिंकू सिंह के लिए यह बहुत बड़ा व्यक्तिगत नुकसान है। इस घटना ने एक बार फिर याद दिलाया है कि कैंसर जैसी बीमारियों में जागरूकता, नियमित जांच और समय पर इलाज कितना महत्वपूर्ण है। लिवर कैंसर जैसे मामलों में शुरुआती चरण में ही पता चलने से जीवन बचाया जा सकता है।

 

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