
भारतीय समाज में महिलाओं की कई स्वास्थ्य समस्याओं को सदियों से सामान्य मानकर खारिज कर दिया जाता है। पीरियड्स यानी मासिक धर्म के दौरान होने वाला तेज दर्द, पीरियड्स का अनियमित होना, पीएमओएस और बार-बार होने वाले यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (UTI) इनमें प्रमुख हैं। ज्यादातर महिलाओं को बचपन से ही यह सिखाया जाता है कि ये तो हर महिला के साथ होता है, “शादी के बाद ठीक हो जाएगा या बुजुर्गों के घरेलू नुस्खे आजमा लो, जैसी सलाह दी जाती है।
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इस सोच के कारण लाखों महिलाएं सालों तक असहनीय दर्द सहती रहती हैं, अपनी दिनचर्या इन लक्षणों के इर्द-गिर्द घुमाती हैं और गंभीर बीमारियों का समय पर पता नहीं चल पाता, लेकिन किसी समस्या का आम होना यह नहीं साबित करता कि वह सामान्य भी है। समय पर ध्यान न देने से छोटी समस्याएं बड़ी बीमारियों में बदल सकती हैं।
मानसिकता है सबसे बड़ी बाधा
महिलाओं की स्वास्थ्य समस्याओं को नॉर्मल मान लेने की मानसिकता सबसे बड़ी बाधा है। उनका कहना है, ‘कई महिलाएं वर्षों तक यह समझती रहती हैं कि, उनके शरीर में कुछ गड़बड़ है ही नहीं, क्योंकि परिवार, समाज और यहां तक कि कुछ डॉक्टर भी उन्हें यही आश्वासन देते हैं कि ऐसा तो सबके साथ होता है। इस गलतफहमी के चलते महिलाएं दर्द को दबाकर स्कूल, कॉलेज, ऑफिस या घरेलू जिम्मेदारियों को निभाती रहती हैं।

नतीजा यह होता है कि, जब समस्या गंभीर रूप ले लेती है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है। भारत में यह स्थिति और भी चिंताजनक है। अनुमान है कि, करोड़ों महिलाएं पीरियड्स संबंधी विकारों, पीएमएस/पीएमडीडी और रेकरेंट यूटीआई से जूझ रही हैं।
जामा नेटवर्क में प्रकाशित एक रिसर्च के अनुसार, भारतीय महिलाओं में पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम (PCOS) की संख्या तेजी से बढ़ रही है। विभिन्न राष्ट्रीय अध्ययनों में भी यह बात सामने आई है कि, PCOS, एंडोमेट्रियोसिस, फाइब्रॉइड्स और थायरॉइड संबंधी समस्याएं युवा महिलाओं में काफी आम हो गई हैं, लेकिन जागरूकता और इलाज दोनों की कमी है।
हर पांच में से एक महिला प्रभावित
एक रिपोर्ट के मुताबिक, हर पांच में से एक महिला पीएमएस या पीएमडीडी से प्रभावित हो सकती है। पीएमएस सिर्फ हल्का मूड स्विंग या थकान नहीं है। यह हार्मोनल बदलाव के कारण होने वाली गंभीर शारीरिक और मानसिक परेशानी है, जिसमें अत्यधिक चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन, ब्रेस्ट टेंडरनेस, सूजन और असहनीय पेट दर्द शामिल हो सकता है। इसी तरह यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन महिलाओं के अस्पताल पहुंचने की सबसे आम वजहों में से एक है। महिलाओं की शरीर रचना के कारण बैक्टीरिया आसानी से यूरिनरी ट्रैक्ट में प्रवेश कर जाते हैं। अगर बार-बार यूटीआई हो रहा है तो यह सिर्फ इंफेक्शन नहीं, बल्कि किडनी स्टोन, डायबिटीज या अन्य गाइनोकोलॉजिकल समस्याओं का संकेत भी हो सकता है।
कब खतरनाक बन जाता है पीरियड्स का दर्द?
एक्सपर्ट्स स्पष्ट करते हैं कि, हल्का-फुल्का क्रैंप तो सामान्य है, लेकिन अगर दर्द इतना तेज हो कि, आप बिस्तर से उठने में असमर्थ हों
रोजमर्रा की गतिविधियां पूरी न कर पाएं तेज ब्लीडिंग, चक्कर आना, उल्टी, बेहोशी जैसी शिकायतें हों तो इसे कभी भी नॉर्मल नहीं मानना चाहिए।
ये लक्षण एंडोमेट्रियोसिस, एडेनोमायोसिस, ओवेरियन सिस्ट, फाइब्रॉइड्स या थायरॉइड डिसऑर्डर का संकेत हो सकते हैं। दुर्भाग्यवश, भारत में ज्यादातर महिलाएं इन लक्षणों को सहन करती रहती हैं। वे दोस्तों से सलाह लेती हैं, इंटरनेट पर घरेलू उपाय ढूंढती हैं या दर्द निवारक दवाएं खाकर काम चलाती रहती हैं। इससे समस्या जड़ से ठीक होने के बजाय बढ़ती जाती है।
दर्द छिपाने से बढ़ेगी समस्या
खुशखबरी यह है कि, अब बदलाव हो रहा है। टेली-कंसल्टेशन, डिजिटल हेल्थ ऐप्स, ऑनलाइन गाइनोकोलॉजिस्ट और महिलाओं के लिए बने कम्युनिटी प्लेटफॉर्म्स ने मदद लेना आसान बना दिया है। अब घर बैठे विशेषज्ञों से बात की जा सकती है, रिपोर्ट्स शेयर की जा सकती हैं और सही इलाज शुरू किया जा सकता है, लेकिन सबसे जरूरी बदलाव सोच में आना है। परिवारों को समझना होगा कि पीरियड्स का दर्द छुपाने वाली बात नहीं है। इसके लिए स्कूलों और कॉलेजों में मासिक धर्म स्वास्थ्य पर जागरूकता कार्यक्रम चलाने चाहिए। महिलाओं को खुद भी अपनी स्वास्थ्य शिकायतों को गंभीरता से लेना चाहिए। काम के स्थानों पर पीरियड लीव और महिलाओं की स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
जागरूकता जरूरी
पीरियड्स का दर्द, पीएमओएस या बार-बार यूटीआई कोई महिला होने की मजबूरी नहीं है। ये शरीर की वह आवाज है, जो कह रही है कि कुछ गड़बड़ है। इन्हें अनदेखा करने से न सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य बिगड़ता है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, काम की उत्पादकता, रिश्ते और जीवन की कुल गुणवत्ता भी प्रभावित होती है।
दिव्या बालाजी कामेरकर जैसी महिलाएं और कई स्वास्थ्य संगठन लगातार जागरूकता फैला रहे हैं। अब जरूरत है कि हर महिला अपनी स्वास्थ्य समस्याओं को सामान्य न माने और समय पर डॉक्टर से संपर्क करें। जब तक हम इन मुद्दों पर खुलकर बात नहीं करेंगे, तब तक लाखों महिलाएं चुपचाप सफर करती रहेगी। स्वास्थ्य आपका अधिकार है। दर्द को सामान्य मत मानिए, इसे सुनिए और सही कदम उठाइए।
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