
दिवाली की जगमगाहट के ठीक अगले दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को अन्नकूट उत्सव, यानी गोवर्धन पूजा मनाई जाती है। इस मौके पर घरों और मंदिरों में अलग ही आध्यात्मिक उमंग दिखाई देती है। ‘अन्नकूट’ का सरल अर्थ है ‘अन्न का पहाड़’। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण को भव्य भोग लगाया जाता है।
यह पर्व सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। यह प्रकृति, किसान, गोवंश और समाज के प्रति आभार जताने का जीवंत माध्यम भी है। इस दिन श्रीकृष्ण को लगने वाले छप्पन भोग और बनने वाली खास पंचमेल सब्जी के पीछे धार्मिक, वैज्ञानिक और सामाजिक मान्यताएं जुड़ी हैं।
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56 भोग ही क्यों? सात दिन और आठ प्रहर का गणित
छप्पन भोग की कथा द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीला से जुड़ी है। मान्यता है कि, जब इंद्रदेव के कोप से ब्रज में मूसलाधार बारिश हुई, तब कान्हा ने पूरे गोकुल की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी उंगली पर उठा लिया था।

कथा के अनुसार, लगातार सात दिन तक पर्वत उठाए रखने के दौरान श्रीकृष्ण ने अन्न-जल का एक दाना तक ग्रहण नहीं किया। यह उनकी कठिन साधना मानी जाती है। यहीं से आठ प्रहर का नियम जुड़ता है। मान्यता है कि भगवान दिन में आठ बार, यानी आठों प्रहर भोजन करते थे। जब सातवें दिन संकट टला, तो माता यशोदा और ब्रजवासियों ने प्रभु के इन सात दिनों के छूटे हुए आठ-आठ प्रहरों की भरपाई के लिए प्रेमपूर्वक 56 तरह के पकवान तैयार किए। इसी गणित को 7 गुणा 8 बराबर 56 के रूप में समझाया जाता है।
बांसुरी के सुर और संगीत के राग
आध्यात्मिक नजरिए से 56 की संख्या का रिश्ता कान्हा की बांसुरी से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि, यह संख्या बांसुरी के सात सुरों या छिद्रों और संगीत के आठ मुख्य रागों से संबंध रखती है। इन्हें ईश्वर और भक्त के मिलन के आनंद का प्रतीक माना जाता है।
थाली की खास बनावट, तय क्रम में परोसा जाता है भोग
मंदिरों में छप्पन भोग को मनमाने ढंग से नहीं, बल्कि व्यवस्थित क्रम में सजाया जाता है। हर हिस्से की अपनी जगह तय होती है।
शीर्ष भाग: प्रभु के विग्रह के सबसे करीब शुद्ध दुग्ध सामग्रियां रखी जाती हैं। इनमें माखन, मिश्री, मलाई, पेड़ा, रबड़ी और रसमलाई शामिल हैं।
मध्यम भाग: इसके ठीक बाद कचौड़ी, पूरी, मठरी और नमकीन फरसाण सजाए जाते हैं।
आधार तल: सबसे नीचे कढ़ी, दाल, भारी अनाज और खिचड़ी रखी जाती है।
केंद्र में अन्न का पहाड़: थाली के ठीक बीच में पके हुए चावल का विशाल ढेर बनाया जाता है। इसे साक्षात गोवर्धन पर्वत का प्रतीक माना जाता है।
अन्नकूट की गड्ड सब्जी
अन्नकूट पर बनने वाली भंडारे वाली सब्जी का स्वाद अलग ही होता है। मान्यता है कि इसके पीछे मौसम का विज्ञान भी छिपा है। कार्तिक मास वह समय होता है, जब गर्मियां पूरी तरह विदा ले रही होती हैं और सर्दियां दस्तक दे चुकी होती हैं।
इस समय बाजार में दो मौसमों की सब्जियां एक साथ दिखती हैं। एक तरफ विदा होती कद्दू और लौकी जैसी सब्जियां होती हैं, तो दूसरी तरफ सर्दियों की नई फसलें, जैसे गाजर, गोभी, मटर, पालक और मेथी। परंपरा के अनुसार, लगभग 15 से 20 तरह की मौसमी सब्जियों को मिलाकर भगवान को समर्पित किया जाता है। यह प्रकृति के बदलते चक्र का सम्मान भी माना जाता है।
सात्विक तैयारी का खास तरीका
इस सब्जी की तैयारी पूरी तरह सात्विक होती है। इसमें लहसुन और प्याज का इस्तेमाल वर्जित रहता है। सब्जियों को हींग, जीरा और शुद्ध सरसों के तेल या घी में भूनकर इतना घोटा जाता है कि हर सब्जी का स्वाद एकसार हो जाए। श्रद्धालुओं के लिए यही मिला-जुला स्वाद प्रसाद का अमृत बन जाता है।
सामूहिकता और समरसता का संदेश
अन्नकूट की भव्यता देश के कई हिस्सों में देखने को मिलती है। राजस्थान के नाथद्वारा में श्रीनाथजी मंदिर और मथुरा-वृंदावन में बांके बिहारी मंदिर से लेकर गुजरात तक इसकी छटा दिखती है। गुजरात में इसी समय ‘बेस्तू वरस’ यानी नववर्ष भी मनाया जाता है।
विशाल पैमाने पर भोग अर्पित होने के बाद जब यह प्रसाद बिना अमीर-गरीब के भेद के हर हाथ में बंटता है, तो यह पर्व भारतीय संस्कृति की समरसता और प्रकृति प्रेम को सच्चे अर्थों में परिभाषित करता है।
क्या है इस पर्व का असली संदेश
अन्नकूट का संदेश साफ है। अन्न का सम्मान करना, प्रकृति के प्रति आभार जताना और खुशी को सबके साथ बांटना। जब थाली के बीच चावल का पहाड़ सजता है और चारों ओर तरह-तरह के पकवान रखे जाते हैं, तो यह हमें याद दिलाता है कि हमारी खुशहाली खेतों, किसानों और पशुधन से जुड़ी है।
गोवर्धन पर्वत की कथा भी यही सिखाती है कि संकट की घड़ी में समाज एकजुट होकर एक-दूसरे का सहारा बनता है। श्रीकृष्ण ने अकेले पर्वत नहीं उठाया था, पूरा गोकुल उनके साथ खड़ा था। इसी भावना की झलक अन्नकूट के सामूहिक भोग और प्रसाद वितरण में दिखाई देती है।
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