यम पंचक 2026: 7 से 11 नवंबर तक चलेगा तिहार, जानिए कौए, कुत्ते और गाय की पूजा के पीछे की मान्यता

दिवाली का नाम सुनते ही हर भारतीय के मन में दीयों से सजे घर, लक्ष्मी-गणेश की पूजा और सुख-समृद्धि की कामना की तस्वीर उभरने लगती है, लेकिन पड़ोसी देश नेपाल में इसी त्योहार से जुड़ी एक ऐसी परंपरा है, जो इंसान के साथ-साथ जीव-जंतुओं को भी सम्मान देती है। यहां इन दिनों कौए को भोजन कराया जाता है, कुत्ते को फूलों की माला पहनाई जाती है और गाय की पूजा की जाती है। पांच दिनों तक चलने वाले इस पर्व को यम पंचक या तिहार कहा जाता है। इसके पीछे मृत्यु के देवता यमराज, उनकी बहन यमुना और जीवों के प्रति आदर से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं हैं।

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क्या है यम पंचक

नेपाल में तिहार के पांच दिनों को यम पंचक भी कहा जाता है। यह पर्व भारतीय दिवाली से जुड़ा है, लेकिन इसकी पूजा-पद्धति अलग है। इन पांच दिनों में कौआ तिहार, कुकुर तिहार और गाय तिहार के साथ-साथ लक्ष्मी पूजा, गोवर्धन पूजा और भाई टीका जैसे अनुष्ठान किए जाते हैं।

मान्यता है कि, इस अवधि में यमराज और उनकी बहन यमुना की कथा का विशेष महत्व है। पर्व का समापन भाई टीका से होता है, जब बहनें अपने भाइयों की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।

कौए को क्यों माना जाता है यमराज का संदेशवाहक

यम पंचक की शुरुआत काग तिहार से होती है। नेपाली लोकमान्यताओं में कौए को यमराज का संदेशवाहक माना जाता है। इस दिन घरों की छतों और आंगन में कौओं के लिए भोजन रखा जाता है। मान्यता है कि, ऐसा करने से अशुभ समाचारों और अनिष्ट से रक्षा की कामना पूरी होती है।

Yam Panchak 2026

कौए का संबंध पितरों से भी जोड़ा जाता है। हालांकि काग तिहार की अपनी अलग सांस्कृतिक परंपरा है। आम तौर पर जिस पक्षी की आवाज को कई जगह शुभ-अशुभ संकेत से जोड़कर देखा जाता है, उसे इस दिन आदर के साथ भोजन देना इस परंपरा की खास पहचान है।

कुत्ते को माला पहनाकर क्यों होती है पूजा

यम पंचक का दूसरा प्रमुख अनुष्ठान कुकुर तिहार है। धार्मिक मान्यताओं में कुत्ते को यमराज के द्वार का रक्षक और संदेशवाहक माना गया है। इस दिन सिर्फ पालतू ही नहीं, सड़क पर रहने वाले कुत्तों को भी तिलक लगाया जाता है, फूलों की माला पहनाई जाती है और भोजन दिया जाता है।

यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। यह कुत्ते की वफादारी, सुरक्षा और मनुष्य के साथ उसके संबंध को भी सम्मान देती है,  जिस जीव को आमतौर पर लोग रोजमर्रा की जिंदगी में नजरअंदाज कर देते हैं, उसे इस दिन घर के सदस्य जैसा सम्मान मिलता है।

गाय की पूजा का यम पंचक से संबंध

गाय तिहार में गाय को लक्ष्मी का प्रतीक मानकर पूजा की जाती है। गाय को तिलक लगाया जाता है, माला पहनाई जाती है और चारा खिलाया जाता है। इसके बाद लक्ष्मी पूजा और दीपदान की परंपराएं निभाई जाती हैं। नेपाल पर्यटन बोर्ड के अनुसार, तिहार में गाय के साथ बैलों का भी विशेष सम्मान किया जाता है।

पांच दिन बहन के घर क्यों रहे यमराज

यम पंचक से जुड़ी मान्यता के अनुसार, यमराज पांच दिनों तक अपनी बहन यमुना के घर अतिथि बनकर रहे थे। यमुना ने उनका आदर-सत्कार किया। इसी कथा से भाई टीका की परंपरा जुड़ी मानी जाती है।

अंतिम दिन बहनें भाइयों को तिलक लगाकर उनकी लंबी आयु की प्रार्थना करती हैं। नेपाल सरकार के सांस्कृतिक विवरण में भी इसी कथा को यम पंचक नाम का आधार बताया गया है। इस तरह यह पर्व भाई-बहन के रिश्ते की मिठास को भी रेखांकित करता है।

यम पंचक 2026: कब, कौन-सा अनुष्ठान

काठमांडू महानगरपालिका के कैलेंडर के अनुसार, इस वर्ष तिहार के प्रमुख अनुष्ठान इस प्रकार हैं।

7 नवंबर: काग तिहार
8 नवंबर: कुकुर तिहार और लक्ष्मी पूजा
9 नवंबर: गाय तिहार
10 नवंबर: गोवर्धन पूजा, म्ह पूजा और बैल पूजा
11 नवंबर: भाई टीका

पांच दिन, पांच संदेश

तिहार का हर दिन एक अलग भाव और परंपरा से जुड़ा है। पहले दिन कौए के लिए भोजन रखा जाता है, तो दूसरे दिन कुत्ते का सम्मान होता है। तीसरे दिन गाय की पूजा के साथ लक्ष्मी पूजा और दीपदान की परंपरा निभाई जाती है। चौथे दिन गोवर्धन पूजा, म्ह पूजा और बैल पूजा होती है, जबकि पांचवें दिन भाई टीका के साथ पर्व का समापन होता है। इस तरह पांच दिनों में आस्था, कृतज्ञता और पारिवारिक रिश्तों के अलग-अलग रंग देखने को मिलते हैं।

 दीयों की रौशनी से खास बनता है पर्व

यम पंचक में धार्मिक मान्यताएं और लोक परंपराएं एक-दूसरे में घुली हुई हैं। यमराज और यमुना की कथा जहां इसे धार्मिक आधार देती है। वहीं जीव-जंतुओं की पूजा इसे सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान देती है। घरों की छत, आंगन और दहलीज पर सजी माला, तिलक और दीयों की रोशनी इस पर्व को खास बनाती है। यही कारण है कि, नेपाल में तिहार को परिवार और समाज को जोड़ने वाला त्योहार माना जाता है।

जीवों के प्रति आभार का पर्व

यम पंचक की सबसे दिलचस्प बात यही है कि, यहां दिवाली केवल धन और समृद्धि का उत्सव नहीं रहती। कौए से लेकर कुत्ते, गाय और बैल तक को सम्मान देकर मनुष्य प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति अपना आभार प्रकट करता है। यह परंपरा याद दिलाती है कि, इंसान का जीवन अकेले नहीं चलता, उसके आसपास के जीव भी उसके जीवन का हिस्सा हैं।

वहीं भाई टीका इस पांच दिवसीय पर्व को पारिवारिक रिश्तों और दीर्घायु की कामना के साथ पूरा करता है। पहले दिन पक्षी, फिर पशु और अंत में परिवार, इस क्रम में यह पर्व प्रकृति से लेकर घर-आंगन तक आभार और सम्मान का संदेश देता है।

दीपों की रोशनी और लक्ष्मी पूजा भारत और नेपाल, दोनों जगह इस उत्सव की साझा पहचान है। फर्क सिर्फ इतना है कि नेपाल में यह पर्व पांच दिनों तक अलग-अलग अनुष्ठानों के रूप में मनाया जाता है, जिसमें जीव-जंतुओं की पूजा खास स्थान रखती है। यही वजह है कि तिहार को देखने और समझने की दिलचस्पी भारत में भी लगातार बनी रहती है।

 

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