
नई दिल्ली। विदेश मंत्रालय के उस बयान ने पूरे देश में एक नई बहस छेड़ दी है जिसमें कहा गया कि पासपोर्ट भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं है। इस विवाद ने अब राजनीतिक रंग भी ले लिया है और कांग्रेस सांसद एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर भी इस बहस में सक्रिय रूप से कूद पड़े हैं। हालांकि, थरूर का अंदाज बाकी विपक्षी नेताओं से अलग रहा। एक तरफ जहां कांग्रेस ने इस मुद्दे का इस्तेमाल केंद्र सरकार को घेरने के लिए किया है। वहीं थरूर ने इस पुरानी और बार-बार उठने वाली समस्या की जड़ तक जाने की कोशिश की और एक व्यावहारिक समाधान भी बताया।
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विवाद की शुरुआत
पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी किया जिसमें स्पष्ट किया गया कि पासपोर्ट को भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इस बयान ने आम जनता के बीच हैरानी और भ्रम की लहर पैदा कर दी। करोड़ों भारतीय जो वर्षों से पासपोर्ट को अपनी पहचान और नागरिकता का सबसे मजबूत दस्तावेज मानते आए हैं, उनके मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक था कि अगर पासपोर्ट नागरिकता साबित नहीं करता तो फिर कौन सा दस्तावेज करता है?
थरूर ने समझाई कानूनी पेचीदगी
केरल के तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने अपने विस्तृत सोशल मीडिया पोस्ट में इस मुद्दे की तकनीकी और कानूनी परतें खोलीं। उन्होंने कहा कि यह कोई नई बात नहीं है। वास्तव में 1967 के पासपोर्ट एक्ट की धारा 20 के तहत सरकार का यह लंबे समय से कानूनी रुख रहा है।

इस कानून के अनुसार सरकार दुर्लभ परिस्थितियों और जनहित में गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट जारी कर सकती है। यही वजह है कि कानूनी दृष्टि से पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाता, लेकिन थरूर ने यह भी माना कि यह तकनीकी पहलू आम जनता के लिए समझना बेहद मुश्किल है।
उनके शब्दों में आम लोगों के लिए इस फर्क को समझना बेमानी है। जब कोई व्यक्ति अपना पासपोर्ट बनवाने के लिए कठिन पुलिस वेरिफिकेशन और तमाम दस्तावेजों की जांच से गुजरता है, तो उसके मन में यही धारणा बनती है कि यह दस्तावेज उसकी नागरिकता का सबसे पक्का सबूत है।
उठाया ऐसा तार्किक सवाल
थरूर ने अपनी बात को और आगे बढ़ाते हुए एक बेहद तार्किक सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि, पासपोर्ट लेने के लिए नागरिक को कठोर पुलिस वेरिफिकेशन से गुजरना पड़ता है। अनेक दस्तावेजों की गहन जांच होती है। सरकार पासपोर्ट जारी करने से पहले नागरिकता का ठोस प्रमाण खुद मांगती है। इतनी कड़ी जांच-पड़ताल के बाद तैयार किए गए दस्तावेज को यह कह देना कि इससे नागरिकता साबित नहीं होती, यह एक स्पष्ट कानूनी विरोधाभास है। थरूर ने सीधे शब्दों में पूछा, अगर पासपोर्ट नागरिकता स्थापित नहीं करता, तो आखिर क्या करता है?
आधार कार्ड भी नागरिकता का प्रमाण नहीं
थरूर ने इस बहस में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का भी हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि, आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है, यह केवल पहचान और आवास का प्रमाण है। यानी एक तरफ पासपोर्ट नागरिकता साबित नहीं करता और दूसरी तरफ आधार कार्ड भी नागरिकता का पक्का सबूत नहीं है। ऐसे में करोड़ों भारतीयों के सामने एक बेहद विचित्र और असहज स्थिति पैदा हो गई है।

थरूर ने इस पर गहरी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि, हमारे देश में वर्ल्ड-क्लास बायोमेट्रिक दस्तावेज मौजूद हैं, आधार जैसी उन्नत तकनीक और पासपोर्ट जैसा सुरक्षित दस्तावेज, लेकिन विडंबना यह है कि, इनमें से कोई भी नागरिकता को निर्णायक रूप से साबित करने में सक्षम नहीं है। यह स्थिति न केवल आम नागरिकों के लिए परेशानी का कारण है, बल्कि सरकारी तंत्र के लिए भी अनावश्यक जटिलता पैदा करती है।
कानून में संशोधन है समाधान
शशि थरूर ने केवल समस्या उठाने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्होंने एक ठोस और व्यावहारिक समाधान भी सामने रखा। उनका कहना है कि इस बेवजह के विवाद को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए एक समझदारी भरे कानूनी समाधान की तत्काल जरूरत है।
उनके सुझाव के अनुसार सबसे पहले सरकार को गैर-नागरिकों के लिए अलग प्रकार का आधार कार्ड जारी करना चाहिए। चूंकि, अभी आधार कार्ड गैर-नागरिकों को भी दिया जाता है, इसलिए यह नागरिकता का प्रमाण नहीं बन पाता। अगर गैर-नागरिकों के लिए अलग पहचान व्यवस्था हो तो नागरिकों के आधार की विश्वसनीयता स्वतः बढ़ जाएगी।
स्थिति स्पष्ट होनी जरूरी
इसके बाद सरकार को कानूनी प्रावधानों में औपचारिक संशोधन करना चाहिए जिससे वैध पासपोर्ट और वैध आधार कार्ड, दोनों को भारतीय नागरिकता का निर्णायक और पक्का सबूत माना जाए। यह मान्यता तब तक बनी रहे जब तक सरकार इन्हें स्पष्ट रूप से वापस न ले ले या रद्द न कर दे।

थरूर का मानना है कि इस कदम से न केवल नागरिकों की कानूनी स्थिति स्पष्ट होगी, बल्कि घरेलू सत्यापन प्रक्रिया भी सरल और सुगम हो जाएगी। हर भारतीय को अपनी पहचान और नागरिकता की पक्की कानूनी निश्चितता मिलेगी और इस तरह के अनावश्यक विवाद भविष्य में नहीं उठेंगे।
थरूर के सुझाव तार्किक और व्यावहारिक जरूर हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सरकार इस दिशा में कदम उठाएगी? करोड़ों भारतीय नागरिक आज भी इस उलझन में हैं कि अपनी नागरिकता साबित करने के लिए उनके पास आखिर कौन सा दस्तावेज है जिसे कानूनी मान्यता प्राप्त है।
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