संभल में गटर की खुदाई में निकला कलश, मिले 1875 के 70 चांदी के सिक्के

  • जगन्नाथपुर गांव का मामला, मकान मालिक की शिकायत पर पुलिस ने शुरू की जांच

  • पुरातत्व विभाग को भेजी गई सूचना

संभल। जमीन के नीचे दबा इतिहास कब अचानक सामने आ जाए, कोई नहीं जानता। संभल जिले के जगन्नाथपुर गांव में गटर की खुदाई के दौरान निकला मिट्टी का एक कलश अब अंग्रेजी हुकूमत के दौर की दिलचस्प कहानी बन गया है। कलश से मिले चांदी के सिक्कों ने न सिर्फ ग्रामीणों को हैरान कर दिया, बल्कि करीब एक माह पुराने इस मामले को भी सुर्खियों में ला दिया है। पुलिस अब तक लगभग 70 सिक्के बरामद कर चुकी है।

जानकारी के मुताबिक, इन सिक्कों पर वर्ष 1875 अंकित है और ये विक्टोरिया शासनकाल से जुड़े बताए जा रहे हैं। अब इनकी असलियत और ऐतिहासिक अहमियत का पता पुरातत्व विभाग लगाएगा।

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गटर बनाते समय निकला मिट्टी का कलश

रिपोर्ट्स के अनुसार, गांव निवासी रोहन के मकान में गटर निर्माण का काम चल रहा था। इसके लिए दो मजदूर खुदाई कर रहे थे। इसी दौरान जमीन के अंदर से एक कलश निकला, जिसे देखकर वहां काम कर रहे मजदूर हैरान रह गये।

SANBHAL

शुरू में तो किसी को अंदाजा नहीं था कि यह साधारण सा दिखने वाला कलश अपने भीतर इतिहास की कितनी बड़ी कहानी समेटे हुए है। बताया जाता है कि, कलश मिलने के बाद एक मजदूर उसे कट्टे में भरकर अपने साथ ले गया, जबकि दूसरे मजदूर को कुछ सिक्के दिए गए।

बंटवारे पर हुआ विवाद 

खजाने में हिस्सेदारी को लेकर जब दोनों मजदूरों के बीच विवाद हुआ, तो जमीन के नीचे छिपे इस रहस्य की चर्चा पूरे गांव में फैल गई। बात धीरे-धीरे आसपास भी पहुंचने लगी और लोग तरह-तरह की बातें करने लगे। मामला बढ़ता देख आखिरकार मकान मालिक रोहन ने पुलिस से शिकायत कर दी। इसके बाद पुलिस हरकत में आई और पूरे प्रकरण की जांच शुरू की गई।

पुरातत्व विभाग करेगा सिक्कों की जांच

मामले की जांच में जुटी पुलिस ने अब तक करीब 70 चांदी के सिक्के बरामद किए हैं। कोतवाली के एसएसआई संदीप मलिक के मुताबिक, पुरातत्व विभाग को पत्राचार कर सूचना दे दी गई है। विभाग सिक्कों की प्रमाणिकता, निर्माण काल और ऐतिहासिक महत्व की जांच करेगा। पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट आने के बाद ही साफ हो सकेगा कि, ये सिक्के वाकई कितने पुराने हैं और इनकी ऐतिहासिक अहमियत क्या है।

क्यों खास हैं 1875 के सिक्के?

जानकारी के अनुसार सिक्कों पर 1875 का साल अंकित है, यानी ये करीब डेढ़ सदी पुराने हैं। यह वह दौर था, जब भारत ब्रिटिश हुकूमत के अधीन था और महारानी विक्टोरिया का शासन था। उस समय चांदी के सिक्के आम लेन-देन में चलते थे और लोग अपनी जमा-पूंजी अक्सर चांदी के रूप में ही सहेजकर रखते थे। इसी वजह से पुराने दौर में लोग कीमती सिक्कों को मिट्टी के बर्तनों में भरकर जमीन में दबा दिया करते थे। हालांकि, यह जानकारी सामान्य ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। इन विशेष सिक्कों के बारे में अंतिम निष्कर्ष पुरातत्व विभाग की जांच के बाद ही सामने आएगा।

क्या कहते हैं नियम?

जमीन से मिले ऐसे पुराने खजाने को लेकर देश में कानूनी प्रावधान भी हैं। ट्रेजर ट्रोव एक्ट, 1878 के तहत जमीन में दबे धन या कीमती वस्तुओं के मिलने की सूचना प्रशासन को देना जरूरी माना गया है। वहीं पुरावशेष एवं बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम, 1972 के तहत 100 साल से ज्यादा पुरानी वस्तुओं को पुरावशेष की श्रेणी में रखा जाता है। इस मामले में ये प्रावधान किस तरह लागू होते हैं, यह जांच का विषय है और इस पर अंतिम फैसला संबंधित विभाग और प्रशासन ही लेंगे।

क्या जमीन में दफन है और भी खजाना?

कलश से निकले सिक्कों की चर्चा के बीच गांव में तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। लोग सवाल उठा रहे हैं कि कहीं यह किसी पुराने दौर की संपत्ति छिपाए जाने का मामला तो नहीं। क्या कलश में मिले सिक्के ही पूरी कहानी हैं, या जमीन के भीतर इतिहास की कोई और कड़ी भी दफन है? ग्रामीणों में इस बात को लेकर भी उत्सुकता है कि क्या आसपास की जमीन में और भी कुछ छिपा हो सकता है।

फिलहाल इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे। पुरातत्व विभाग की पड़ताल अब इस रहस्यमयी कलश के पीछे छिपे इतिहास की अगली परत खोलेगी।

 

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