
इस्लामाबाद। पाकिस्तान इन दिनों दोहरे संकट से जूझ रहा है। एक तरफ भारत द्वारा सिंधु जल संधि को निलंबित किए जाने के बाद पानी की आपूर्ति पर लगातार सवालिया निशान लगा हुआ है, तो दूसरी तरफ देश की आर्थिक बदहाली के कारण जल संसाधन से जुड़ी महत्वपूर्ण परियोजनाओं के लिए फंडिंग की भारी कमी हो गई है। भीषण गर्मी के मौसम में आम पाकिस्तानी नागरिकों की परेशानी बढ़ती जा रही है और सरकार के पास न तो पर्याप्त पानी है, न ही उसे संभालने के लिए धन।
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पहले ही डूब चुकी है अर्थव्यवस्था
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पहले से ही कंगाली के कगार पर है। बाहरी कर्ज, मुद्रास्फीति, राजनीतिक अस्थिरता और प्राकृतिक आपदाओं के बीच जल संकट अब उसके लिए घातक साबित हो सकता है। ट्रिब्यून की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान सरकार ने जल क्षेत्र के विकास के लिए 969 अरब रुपए की जरूरत का अनुमान लगाया था, लेकिन आगामी वित्तीय वर्ष के लिए सिर्फ 179 अरब रुपए का आवंटन प्रस्तावित किया गया है। इस भारी कटौती ने पूरे वॉटर सेक्टर को संकट में डाल दिया है।

पाकिस्तान की वॉटर रिसोर्सेज मिनिस्ट्री ने 41 चल रही परियोजनाओं और एक नई स्कीम को शामिल करते हुए कुल 969 अरब रुपए की मांग की थी। इनमें सिंधु नदी बेसिन की स्टोरेज क्षमता बढ़ाना, पुरानी संरचनाओं का आधुनिकीकरण और नई सिंचाई सुविधाएं शामिल हैं, लेकिन सीमित संसाधनों के कारण सरकार सिर्फ 179 अरब रुपए ही दे पा रही है, जो वास्तविक जरूरत का महज 18-19 प्रतिशत है। इससे न सिर्फ नई परियोजनाएं रुक जाएंगी, बल्कि चल रही योजनाओं का काम भी बीच में अटक सकता है।
खतरे में जरूरी प्रोजेक्ट
पाकिस्तान सिंधु नदी पर रियल-टाइम मॉनिटरिंग के लिए टेलीमेट्री सिस्टम लगाने की योजना बना रहा था। इसके लिए 5.76 अरब रुपए का प्रस्ताव रखा गया था। यह सिस्टम पानी के बहाव की सटीक जानकारी देगा और बेहतर प्रबंधन में मदद करेगा, लेकिन फंड की कमी से यह परियोजना भी प्रभावित हो सकती है। इसी तरह मंगला डैम विस्तार परियोजना के लिए 4.59 अरब रुपए आवंटित करने का प्रस्ताव है।
मंगला डैम पाकिस्तान की प्रमुख जल विद्युत परियोजनाओं में से एक है, जो सिंचाई और बिजली उत्पादन दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। स्टोरेज क्षमता बढ़ाने और पुरानी संरचना को मजबूत करने की यह योजना लंबे समय से लंबित है। फंडिंग कटौती के कारण इसका विस्तार रुकने से न सिर्फ बिजली उत्पादन प्रभावित होगा, बल्कि कृषि क्षेत्र को भी भारी नुकसान पहुंचेगा।
पहलगाम हमले के बाद रद्द हुई थी संधि
1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि हुई थी। इस ऐतिहासिक समझौते के तहत पूर्वी नदियों (रावी, ब्यास और सतलुज) पर भारत को अधिकार दिया गया, जबकि पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम और चेनाब) का पानी मुख्य रूप से पाकिस्तान को मिलता था।
यह संधि दक्षिण एशिया के सबसे सफल जल समझौतों में से एक मानी जाती थी, जो युद्धों के बावजूद दशकों तक टिकी रही, लेकिन अप्रैल 2025 में पहलगाम (कश्मीर) में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने बड़ा फैसला लिया। भारत ने पाकिस्तान पर आतंकवाद को समर्थन देने का आरोप लगाते हुए सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया।
गहरा सकता है खाद्य संकट
भारत सरकार का स्पष्ट रुख था कि पानी और आतंकवाद साथ नहीं चल सकते। इसके बाद भारत ने कुछ बांधों से पानी के बहाव को नियंत्रित भी किया, जिससे पाकिस्तान में हड़कंप मच गया। पाकिस्तान के लिए सिंधु नदी तंत्र जीवन रेखा है। देश की लगभग 80-97 प्रतिशत कृषि इस पानी पर निर्भर है।

पाकिस्तान की कुल आबादी में बड़ी संख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, जहां सिंचाई के बिना फसलें सूख जाएंगी। खेती-बाड़ी, बिजली उत्पादन, पेयजल और उद्योग सभी इस पानी से जुड़े हैं। पानी का बहाव कम होने से पाकिस्तान में सूखा, फसल नुकसान, बेरोजगारी और खाद्य सुरक्षा का संकट गहरा सकता है।
अंतर्राष्ट्रीय मंचों से मांग रहा मदद
भारत के कदम को पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पानी को हथियार बनाना बता रहा है। उसने संयुक्त राष्ट्र और अन्य मंचों पर शिकायतें की हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि, पाकिस्तान का जल संकट सिर्फ भारत के कारण नहीं है। घरेलू स्तर पर पानी का बेहद बुरा प्रबंधन, पुरानी सिंचाई व्यवस्था, अत्यधिक पानी खपत वाली फसलों (चावल, गन्ना) की खेती, भारी रिसाव और समुद्र में बिना उपयोग बह जाने वाला पानी देश की मुख्य समस्याएं हैं।
पाकिस्तान में पानी की बर्बादी इतनी अधिक है कि, विशेषज्ञ चेतावते हैं कि अगर सुधार नहीं हुआ तो देश जल्द ही ‘वॉटर स्कार्स’ देश बन जाएगा। फंडिंग की कमी इस समस्या को और बढ़ा रही है। आर्थिक संकट के कारण सरकार न तो नई डैम बना पा रही है और न ही पुरानी व्यवस्था को आधुनिक बना पा रही है।भविष्य के संभावित परिणामअगर स्थिति यूं ही रही तो आने वाले ग्रीष्मकाल में पाकिस्तान के बड़े इलाकों में पानी की भारी कमी हो सकती है।
भारत ने स्पष्ट किया रुख
पंजाब और सिंध के कृषि क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। बिजली उत्पादन घटने से लोडशेडिंग बढ़ेगी। पेयजल संकट से स्वास्थ्य समस्याएं उभरेंगी। साथ ही सामाजिक अशांति भी बढ़ सकती है। पाकिस्तान सरकार अब अंतरराष्ट्रीय मदद और कर्ज की उम्मीद कर रही है, लेकिन आर्थिक संकट के बीच यह आसान नहीं होगा। वहीं भारत अपना रुख साफ कर चुका है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद पर लगाम नहीं लगाता, जल सहयोग की कोई गुंजाइश नहीं है।

पाकिस्तान वर्तमान में दो मोर्चों पर लड़ रहा है, एक भारत के साथ कूटनीतिक और जल विवाद, दूसरा घरेलू आर्थिक और प्रबंधन संकट। सिंधु जल संधि पर भारत का प्रहार उसके लिए करारा झटका साबित हो रहा है, लेकिन फंडिंग की कमी उसकी अपनी नाकामी को उजागर करती है।
अगर पाकिस्तान समय रहते अपने जल प्रबंधन, फसल चयन और भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगाता, तो सिंधु का पानी चाहे जितना मिले, उसकी मुश्किलें कम नहीं होंगी। फिलहाल स्थिति गंभीर है और आने वाले दिनों में पाकिस्तान को कठिन फैसले लेने पड़ सकते हैं। आम पाकिस्तानी नागरिक गर्मी में पानी के लिए तरस रहे हैं, जबकि सरकार के पास न धन है और न ही ठोस रणनीति।
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