CEC के इस्तीफे की मांग और ‘वोट चोरी’ के आरोप को लेकर राष्ट्रपति से मिलने की तैयारी में विपक्ष

नई दिल्ली। भारतीय राजनीति का पारा एक बार फिर सातवें आसमान पर है। चुनाव आयोग में कथित गड़बड़ियों, मतदाता सूचियों में अनिमितताओं और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर शुरू हुआ विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। संसद से लेकर सड़क तक घमासान मचा हुआ है। इस बीच, राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि विपक्षी दलों का ‘INDIA’ गठबंधन एक बार फिर देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात कर सकता है। विपक्षी दलों की इस संभावित मुलाकात का मुख्य एजेंडा कथित ‘वोट चोरी’ और चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता से जुड़े दस्तावेजी सबूत राष्ट्रपति को सौंपना बताया जा रहा है।

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ये है विवाद की जड़ 

यह पूरा राजनीतिक घटनाक्रम तब शुरू हुआ जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज और हालिया चुनावों में निष्पक्षता को लेकर विपक्षी दलों ने तीखे सवाल खड़े किए। ‘INDIA’ गठबंधन का आरोप है कि, चुनाव संचालन प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर हेरफेर किया जा रहा है, जिससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख पर बट्टा लग रहा है।

INDIA

विपक्षी दलों का यह भी दावा है कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और चुनाव आयोग के बीच कथित मिलीभगत के कारण चुनावी नतीजों में पारदर्शिता प्रभावित हो रही है। दूसरी ओर, सत्ता पक्ष ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए विपक्ष पर हार की झुंझलाहट और संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करने की साजिश रचने का गंभीर पलटवार किया है। बीजेपी का कहना है कि, चुनाव आयोग एक स्वतंत्र और निष्पक्ष संवैधानिक निकाय है, जिस पर इस तरह के निराधार आरोप लगाना लोकतंत्र को कमजोर करने जैसा है।

राष्ट्रपति भवन तक मार्च और ज्ञापन की रूपरेखा

सूत्रों से मिल रही जानकारी के अनुसार, कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में ‘INDIA’ गठबंधन के शीर्ष नेता राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलने के लिए समय मांग सकते हैं। इस मुलाकात के दौरान विपक्ष का एक प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयोग के खिलाफ जुटाए गए कथित ‘वोट चोरी’ के सबूतों और दस्तावेजों को महामहिम के समक्ष रखेगा। विपक्ष का तर्क है कि, देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए सर्वोच्च संवैधानिक पद के हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

यह पहला मौका नहीं है जब विपक्ष चुनाव आयोग के खिलाफ राष्ट्रपति की शरण में जाने की तैयारी कर रहा है। इससे पहले बीते 9 अक्टूबर को भी ‘INDIA’ गठबंधन के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने संसद से लेकर राष्ट्रपति भवन तक एक बड़ा मार्च निकाला था। उस दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा गया था, जिसमें कई तीखी और प्रमुख मांगें रखी गई थीं।

चुनावी परिणामों पर सवाल: बीते दो वर्षों में देश के विभिन्न राज्यों में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों को रद्द करने की मांग।

सीईसी पर कार्रवाई: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को उनके पद से तत्काल हटाने की मांग।

मतदाता सूची पर रोक: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की चल रही प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग।

बैलेट पेपर की वापसी: इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) पर अविश्वास जताते हुए देश में फिर से पारंपरिक ‘बैलेट पेपर’ (मतपत्र) के जरिए मतदान व्यवस्था बहाल करने की मांग।

आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की रणनीति

दिल्ली तक सीमित नजर आ रहे इस विरोध प्रदर्शन को अब देशव्यापी रूप देने की तैयारी चल रही है। ‘INDIA’ गठबंधन की रणनीति के मुताबिक, इस आंदोलन को केवल राजधानी तक सीमित न रखकर देश के अन्य राज्यों और महानगरों में भी विस्तार दिया जाएगा।

राज्यों में इस आंदोलन की कमान वहां के क्षेत्रीय और प्रमुख विपक्षी दलों के दिग्गज नेता संभालेंगे। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के साथ-साथ समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक और अन्य सहयोगी दलों के नेता मिलकर राज्य स्तर पर रैलियों, जनसभाओं और प्रदर्शनों की रूपरेखा तैयार कर रहे हैं। विपक्षी दलों का मानना है कि इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाकर चुनावी सुधारों के नाम पर एक बड़ा जन-आंदोलन खड़ा किया जाए।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आगामी महीनों में देश की राजनीति पूरी तरह से चुनावी मोड में नजर आएगी। जहां एक तरफ विपक्ष चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को बड़ा मुद्दा बनाकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है। वहीं दूसरी तरफ सत्ता पक्ष भी आक्रामक रुख अपनाए हुए है।

राष्ट्रपति भवन का दरवाजा खटखटाने की विपक्ष की यह रणनीति कितनी कारगर साबित होगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वे किस प्रकार के पुख्ता सबूत पेश कर पाते हैं। हालांकि, इतना तय है कि इस गतिरोध के कारण संसद के आगामी सत्रों और राजनीतिक मंचों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी टकराहट देखने को मिलेगी, जिसका सीधा असर देश के चुनावी माहौल पर पड़ना तय है।

 

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