
जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है शरीर में कई बदलाव आते हैं, लेकिन एक ऐसा बदलाव है जो चुपचाप होता रहता है और ज्यादातर लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं। यह है मांसपेशियों की धीरे-धीरे होने वाली कमी जिसे मेडिकल भाषा में सारकोपेनिया कहा जाता है। हाल ही में गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट डॉक्टर सौरभ सेठी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने दो हजार तेईस में द लैंसेट पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि तीस साल की उम्र के बाद हर साल लगभग एक प्रतिशत मांसपेशियां कम हो जाती हैं।
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धीमी होती है प्रक्रिया
यह प्रक्रिया इतनी धीमी है कि, लोग इसे महसूस नहीं करते लेकिन लंबे समय में यह स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन जाती है। डॉक्टर सेठी जो हार्वर्ड स्टैनफोर्ड और एम्स से ट्रेनेड हैं ने इंस्टाग्राम पर लिखा कि, तीस की उम्र के बाद आप हर साल लगभग एक प्रतिशत मांसपेशियां खोते हैं चुपचाप बिना नोटिस किए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह सिर्फ बॉडी शेप का मामला नहीं है बल्कि मेटाबॉलिज्म ब्लड शुगर कंट्रोल हड्डियों की मजबूती और रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालता है। सारकोपेनिया उम्र से जुड़ी एक प्रगतिशील स्थिति है जिसमें कंकाल की मांसपेशियों की मात्रा ताकत और फंक्शन धीरे-धीरे कम होता जाता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन और विभिन्न अध्ययनों के अनुसार यह प्रक्रिया आमतौर पर तीस वर्ष की उम्र के आसपास शुरू हो जाती है। शुरुआत में यह एक प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से होती है लेकिन साठ साल के बाद यह तेज होकर डेढ़ से तीन प्रतिशत प्रति वर्ष तक पहुंच सकती है। ग्लोबल स्तर पर साठ से अधिक उम्र के लोगों में सारकोपेनिया की दर दस से सोलह प्रतिशत तक बताई जाती है जबकि भारत में यह और ज्यादा चिंताजनक है।
महिलाएं ज्यादा होती हैं शिकार
भारतीय अध्ययनों के अनुसार साठ से अधिक उम्र के बुजुर्गों में प्राइमरी सारकोपेनिया की दर चौदह दशमलव दो प्रतिशत से उनतालीस दशमलव दो प्रतिशत तक पहुंच सकती है। पुणे के आसपास की एक हालिया क्रॉस-सेक्शनल स्टडी में चालीस से अधिक उम्र के लोगों में कुल दस प्रतिशत लोगों में सारकोपेनिया पाई गई जिसमें ग्रामीण इलाकों में यह दर चौदह दशमलव आठ प्रतिशत और शहरी में छह दशमलव आठ प्रतिशत थी। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रोटीन की कमी कम फिजिकल एक्टिविटी और कम सोशियो-इकोनॉमिक स्टेटस इसे बढ़ावा देते हैं।
महिलाओं में यह स्थिति और तेज हो सकती है। दो हजार नौ में द लैंसेट में प्रकाशित टबाक एजी और सहयोगियों के रिसर्च के अनुसार महिलाओं में पैंतीस से चालीस साल की उम्र में मांसपेशियों की कमी तेज हो जाती है। इसका मुख्य कारण पेरिमेनोपॉज में एस्ट्रोजन लेवल का गिरना है, जो मसल ब्रेकडाउन को बढ़ाता है। कई महिलाओं को बिना वजन बढ़े भी कमजोरी महसूस होती है क्योंकि मसल टोन कम हो जाता है। डॉक्टर सेठी के अनुसार मांसपेशियां सिर्फ मूवमेंट के लिए नहीं बल्कि शरीर की सबसे बड़ी ग्लूकोज स्पंज की तरह काम करती हैं। वे खून से शुगर सोखकर ब्लड शुगर को बैलेंस रखती हैं।
धीमा हो जाता है मेटाबॉलिज्म
मसल लॉस होने पर मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है, बॉडी फैट खासकर पेट की चर्बी बढ़ती है, इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ता है जिससे टाइप दो डायबिटीज का खतरा बढ़ता है, फैटी लिवर की समस्या होती है, हड्डियां कमजोर होकर ऑस्टियोपोरोसिस का जोखिम बढ़ाती हैं, पोश्चर खराब होता है और गिरने फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है। साठ से अधिक उम्र में सारकोपेनिया से जुड़ी कमजोरी मोबिलिटी लिमिटेशन फॉल्स और यहां तक कि मौत का रिस्क भी बढ़ जाता है। भारत जैसे देश में जहां बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है और दो हजार पचास तक बीस प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है यह एक बड़ा पब्लिक हेल्थ इश्यू बन सकता है।
सारकोपेनिया के शुरुआती लक्षण हल्के होते हैं और लोग इन्हें उम्र का हिस्सा मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। सीढ़ियां चढ़ते समय जल्दी थकान वजन स्थिर रहने के बावजूद मसल टोन या साइज कम लगना, सामान्य कामों में ज्यादा थकान महसूस होना, संतुलन बिगड़ना या चीजें उठाने में दिक्कत जैसे संकेत चालीस-पचास की उम्र में दिखने लगते हैं, लेकिन साठ के बाद गंभीर हो जाते हैं।हालांकि, सारकोपेनिया को रोका या उलटा जा सकता है। रिसर्च दिखाते हैं कि उम्र कोई बाधा नहीं है साठ से अधिक उम्र के लोग भी मसल गेन कर सकते हैं। मुख्य उपाय रेजिस्टेंस ट्रेनिंग है जिसमें वेट लिफ्टिंग बॉडीवेट एक्सरसाइज जैसे पुश-अप्स स्क्वॉट्स या रेजिस्टेंस बैंड्स से ट्रेनिंग शामिल है।
लाइफस्टाइल में बदलाव से सुधर सकती है स्थिति
सप्ताह में दो से तीन दिन तीस से पैंतालीस मिनट यह मसल स्ट्रेंथ और इंसुलिन सेंसिटिविटी दोनों को बेहतर करती है। पर्याप्त प्रोटीन इनटेक भी जरूरी है। रोजाना एक दशमलव दो से एक दशमलव छह ग्राम प्रति किलोग्राम बॉडी वेट प्रोटीन लें। उदाहरण के लिए साठ किलो के व्यक्ति के लिए बिहत्तर से छियानवे ग्राम प्रोटीन। स्रोत अंडे दालें पनीर चिकन फिश दही नट्स हैं। प्रोटीन को दिन में तीन से चार मील्स में बांटें हर मील में बीस से चालीस ग्राम। ईएसपीईएन और प्रोट-एज ग्रुप की सिफारिश भी यही है।
एक्टिव लाइफस्टाइल में रोजाना तेज वॉक या ब्रिस्क वॉकिंग शामिल करें जो मसल फंक्शन बनाए रखने में मदद करती है। पर्याप्त नींद सात से नौ घंटे मसल रिकवरी के लिए जरूरी है।
विटामिन डी लेवल चेक करवाएं और अगर कमी हो तो सप्लीमेंट लें, सूरज की रोशनी भी मदद करती है। कैल्शियम और अन्य न्यूट्रिएंट्स का बैलेंस बनाए रखें।
डॉक्टर सेठी कहते हैं कि मसल लॉस उम्र की वजह से होता है, लेकिन लाइफस्टाइल से इसे रोका जा सकता है। छोटी-छोटी आदतें जैसे रेगुलर स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और हाई-प्रोटीन डाइट से आप सत्तर-अस्सी की उम्र में भी मजबूत रह सकते हैं। भारत में जहां बुजुर्ग आबादी बढ़ रही है और ग्रामीण इलाकों में न्यूट्रिशन की कमी है, सारकोपेनिया एक साइलेंट एपिडेमिक बन सकती है, लेकिन अच्छी खबर यह है कि यह प्रिवेंटेबल है। अगर आप तीस से अधिक उम्र के हैं, तो आज से ही प्रोटीन रिच डाइट और स्ट्रेंथ एक्सरसाइज शुरू करें। डॉक्टरों और न्यूट्रिशनिस्ट्स की सलाह लें नियमित चेकअप करवाएं। क्योंकि मजबूत मांसपेशियां सिर्फ फिटनेस नहीं बल्कि स्वस्थ और स्वतंत्र जिंदगी की कुंजी हैं।
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