
सनातन धर्म में ग्रह नक्षत्रों का विशेष महत्व है। माना जाता है कि, ग्रहों की हर चाल का शुभ या अशुभ असर मनुष्य के जीवन पर पड़ता है। सनातन परंपरा में वर्ष में एक समय ऐसा आता है जब कुछ दिनों के लिए शुभ कार्यों पर विराम लग जाता है, तो वहीं कुछ समय ऐसा होता है, जो मांगलिक कार्यों के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
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15 जून को खत्म हो रहा अधिकमास
साल 2026 में भी एक ऐसा ही बड़ा बदलाव होने जा रहा है, जिससे आम जनमानस के जीवन और संस्कारों की योजनाएं सीधे तौर पर प्रभावित होंगी। वर्तमान समय में चल रहा ज्येष्ठ अधिकमास, जिसे आम बोलचाल की भाषा में मलमास भी कहा जाता है, अब जल्द ही समाप्त होने वाला है।

ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि, 15 जून को मलमास खत्म हो जाएगा, जिसके बाद लोगों को अपने अटके हुए मांगलिक और शुभ कार्यों को पूरा करने का एक बेहद सुनहरा, लेकिन सीमित अवसर मिलेगा।
धार्मिक मान्यता है कि, अधिकमास या मलमास का महीना हर तीन साल में एक बार आता है, जो सौर वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच के अंतर को संतुलित करने का काम करता है। इस साल यह विशेष महीना 17 मई से शुरू हुआ था और पूरे एक महीने की अवधि के बाद 15 जून को समाप्त हो रहा है। यद्यपि मलमास के दौरान विवाह, सगाई, जनेऊ, मुंडन, नामकरण और गृह प्रवेश जैसे तमाम सांसारिक व मांगलिक कार्यों पर पूरी तरह से रोक होती है, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टिकोण से इस महीने को बेहद पवित्र माना गया है। इस मास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है, क्योंकि स्वयं भगवान श्रीहरि विष्णु ने इसे अपना नाम दिया है।
पूजा पाठ का मिलता है की गुना फल
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, मलमास का पूरा समय केवल भौतिक और सांसारिक सुखों से दूरी बनाकर ईश्वर की भक्ति में लीन होने का होता है। यही कारण है कि, इस पूरे महीने में पवित्र नदियों में स्नान करने, अपनी क्षमता के अनुसार दान-पुण्य करने, भगवान के मंत्रों का जप, कठिन तप और आत्म-साधना करने का विधान है। ऐसा माना जाता है कि, इस दौरान किए गए सत्कर्मों और पूजा-पाठ से व्यक्ति को सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

जैसे ही 15 जून को इस पुरुषोत्तम मास की समाप्ति होगी, वैसे ही मांगलिक कार्यों पर लगा प्रतिबंध हट जाएगा और शहनाइयों की गूंज एक बार फिर सुनाई देने लगेगी। ज्योतिषचार्यों का कहना है कि, मलमास के ठीक बाद यानी 19 जून से विवाह जैसे बड़े मांगलिक कार्यों के लिए बेहद शुभ और श्रेष्ठ मुहूर्त शुरू हो रहे हैं, जिन परिवारों में विवाह या अन्य शुभ कार्यों की योजनाएं मलमास के कारण रुकी हुई थीं, उनके लिए जून का उत्तरार्ध और जुलाई का पूर्वार्ध बेहद व्यस्त और उत्सवपूर्ण रहने वाला है।
इन डेट्स पर बजेंगी शहनाइयां
पंचांग की गणना बताती है कि, जून के महीने में विवाह के लिए कई लगातार और मजबूत मुहूर्त उपलब्ध हैं। इस महीने की 19, 21, 22, 23, 24, 25, 26, 27, 28 और 29 तारीख को विवाह के बहुत ही उत्तम योग बन रहे हैं। जून की इस व्यस्त अवधि के बाद, अगले महीने यानी जुलाई में भी विवाह के कुछ गिने-चुने, लेकिन बेहद शुभ मुहूर्त मिलेंगे। जुलाई के महीने में केवल चार शुभ दिन उपलब्ध होंगे, जो कि 01 जुलाई, 06 जुलाई, 07 जुलाई और 11 जुलाई हैं। इसके बाद विवाह के मुहूर्तों पर एक लंबा विराम लग जाएगा।

विवाह और मांगलिक कार्यों के लिए मिलने वाली यह खिड़की जितनी उत्साहजनक है, उतनी ही सीमित भी है, क्योंकि जुलाई के अंतिम सप्ताह से एक बार फिर सभी प्रकार के शुभ कार्यों पर ताला लगने वाला है। ज्योतिषीय और धार्मिक गणना के अनुसार, 25 जुलाई से चातुर्मास का आरंभ होने जा रहा है।
25 जुलाई से शुरू होगा चतुर्मास
हिंदू धर्म और संस्कृति में चातुर्मास की अवधि का बहुत बड़ा आध्यात्मिक महत्व है। यह वह समय होता है जब कई बड़े और महत्वपूर्ण व्रत, त्योहार तथा उपवास आते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चातुर्मास के दौरान इस संपूर्ण जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। चूंकि ब्रह्मांड के संचालक और ऊर्जा के मुख्य स्रोत इस चार महीने की अवधि में विश्राम और योगनिद्रा की अवस्था में रहते हैं, इसलिए इस समय के दौरान किसी भी प्रकार के सांसारिक मांगलिक कार्यों को संपन्न करना वर्जित और अशुभ माना जाता है।
देवताओं की अनुपस्थिति के कारण इस समय किए गए कार्यों को दैवीय आशीर्वाद नहीं मिल पाता है, इसीलिए सनातन धर्म को मानने वाले इस अवधि में विवाह या गृह प्रवेश जैसी शुरुआत करने से पूरी तरह बचते हैं। पंचांग के विश्लेषण से पता चलता है कि, साल 2026 में चातुर्मास की शुरुआत 25 जुलाई, शनिवार को आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी के पवित्र दिन से होगी।
शयन मुद्रा में चले जाते हैं भगवान विष्णु
देवशयनी एकादशी का सीधा अर्थ ही यही है कि, इस दिन भगवान विष्णु शयन के लिए चले जाते हैं। इस साल यह पवित्र और संयम की अवधि लगभग 119 दिनों तक अनवरत चलेगी। इसके बाद, 20 नवंबर, शुक्रवार को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु अपनी योगनिद्रा से जागेंगे, जिसके साथ ही चातुर्मास का समापन होगा और पुनः मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो सकेगी।

चूंकि 25 जुलाई से लेकर 20 नवंबर तक का यह पूरा समय पूरी तरह से मांगलिक कार्यों के लिए वर्जित रहेगा, इसलिए देश भर के जाने-माने पंडित और ज्योतिषविद सभी परिवारों को यह विशेष सलाह दे रहे हैं कि, वे अपने घर के सभी जरूरी और शुभ कार्यों को 25 जुलाई की समय सीमा से पहले ही हर हाल में निपटा लें।
यदि कोई परिवार इस अवधि में चूक जाता है, तो उसे विवाह, मुंडन या नए घर में प्रवेश करने जैसे महत्वपूर्ण मांगलिक कार्यों के लिए नवंबर के अंत तक का एक लंबा इंतजार करना पड़ेगा।
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