
नई दिल्ली। भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है। रक्षा मंत्रालय जल्द ही भारतीय वायुसेना (IAF) के मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) प्रोग्राम के तहत फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद को मंजूरी दे सकता है। इस डील की अनुमानित लागत 3.25 लाख करोड़ रुपये (लगभग 39-40 अरब अमेरिकी डॉलर) है, जो भारत के इतिहास की अब तक की सबसे महंगी रक्षा खरीद होगी। सूत्रों के मुताबिक, यह फैसला फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की फरवरी के अंत या मार्च की शुरुआत में होने वाली भारत यात्रा से ठीक पहले आ सकता है।
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‘मेक इन इंडिया’ को मिलेगा बढ़ावा

यह सौदा न केवल वायुसेना की लड़ाकू क्षमता को बढ़ाएगा, बल्कि ‘मेक इन इंडिया’ पहल को भी मजबूत करेगा, जिसमें करीब 100 विमानों का निर्माण भारत में किया जाएगा। इस डील के साथ भारत दुनिया का सबसे बड़ा राफेल ऑपरेटर बन जाएगा। फिलहाल, आईएएफ के पास 36 राफेल विमान हैं, जो 2016 की ऐतिहासिक डील के तहत प्राप्त हुए थे। पहला बैच 2020 में पहुंचा था, जबकि आखिरी विमान दिसंबर 2024 में डिलीवर हुआ था। ये विमान मुख्य रूप से अंबाला और हासिमारा एयरबेस पर तैनात हैं।
इसके अलावा, भारतीय नौसेना ने अलग से 26 राफेल-एम (नौसैनिक वैरिएंट) का ऑर्डर दिया है, जो आईएनएस विक्रांत और आईएनएस विक्रमादित्य जैसे विमानवाहक पोतों से संचालित होंगे। ये अभी डिलीवरी चरण में हैं। अगर 114 नई राफेल की डील पूरी होती है, तो आईएएफ के पास कुल 150 राफेल (36 पुराने + 114 नए) होंगे, और नौसेना के 26 को जोड़कर भारत के पास कुल 176 राफेल होंगे। ये किसी भी देश से ज्यादा राफेल बेड़ा होगा।
MRFA प्रोग्राम: आवश्यकता और महत्व
एमआरएफए प्रोग्राम, आईएएफ की पुरानी हो रही लड़ाकू स्क्वाड्रनों को बदलने के लिए शुरू किया गया था। वर्तमान में, आईएएफ की स्क्वाड्रन संख्या 30 से नीचे है, जबकि अधिकृत संख्या 42 है।

इस डील के तहत 18 विमान फ्लाई-अवे कंडीशन में आएंगे, जबकि बाकी 96 का निर्माण भारत में होगा, जिसमें 60 फीसदी से ज्यादा स्वदेशी सामग्री का उपयोग होगा। यह सौदा फ्रांस के साथ सरकारी स्तर पर होगा, जिसमें टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (एमआरओ) सुविधाएं शामिल हैं।
डसॉल्ट एविएशन और भारतीय कंपनियां जैसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) इसमें साझेदार होंगी। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह डील क्षेत्रीय चुनौतियों, ‘खासकर चीन और पाकिस्तान से’ को ध्यान में रखकर की जा रही है। राफेल के एडवांस्ड फीचर्स जैसे एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड ऐरे (एईएसए) रडार, मेटिऑर मिसाइल और लंबी रेंज इसे एक गेम-चेंजर बनाते हैं। 2019 की बालाकोट एयरस्ट्राइक में राफेल की भूमिका ने इसकी क्षमता साबित की है।
IAF की मौजूदा फाइटर ताकत पर एक नजर
फरवरी 2026 तक, आईएएफ की लड़ाकू क्षमता मुख्य रूप से चार प्रमुख प्लेटफॉर्म्स पर टिकी है। सुखोई एसयू-30 एमकेआई, राफेल, जगुआर और मिराज 2000।
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सुखोई एसयू-30एमकेआई: आईएएफ का सबसे बड़ा और ताकतवर फाइटर बेड़ा है। फिलहाल, इस बेड़े में 259 सक्रिय विमान हैं, जबकि कुल संख्या 272 है, लेकिन कुछ क्रैश और मेंटेनेंस के कारण सक्रिय फ्लीट से बाहर हैं।

हाल ही में 12 नए एसयू-30एमकेआई का ऑर्डर दिया गया है, जो क्रैश हुए विमानों की जगह लेंगे। ये एचएएल द्वारा 62.6 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री के साथ बनाए जाएंगे। सुपर सुखोई अपग्रेड प्रोग्राम के तहत 200 से ज्यादा विमानों को एईएसए रडार, उन्नत एवियोनिक्स, एआई-इनेबल्ड कॉकपिट और भारतीय हथियारों का बेहतर एकीकरण मिलेगा।
यह अपग्रेड इन्हें 4.5+ या 4.7 जेनरेशन स्तर का बना देगा और ये 2050-55 तक सेवा में रहेंगे। सुखोई को वायुसेना की रीढ़ माना जाता है, जो एयर सुपीरियॉरिटी, ग्राउंड अटैक और लंबी रेंज स्ट्राइक्स में माहिर हैं।
जगुआर: आईएएफ के पास लगभग 110-130 जगुआर विमान हैं, जिनमें सक्रिय फ्लीट 115-130 के बीच है। ये छह स्क्वाड्रनों में तैनात हैं, जिनमें चार स्ट्राइक स्क्वाड्रन (जगुआर आईएस), एक मैरीटाइम स्ट्राइक स्क्वाड्रन (जगुआर आईएम) और एक मिक्स्ड ट्रेनिंग-कॉम्बैट स्क्वाड्रन (जगुआर आईबी) शामिल हैं। अंबाला, जामनगर और गोरखपुर जैसे एयरबेस पर तैनात ये विमान 1979 से सेवा में हैं और अब पुराने हो चुके हैं। कई को डारिन III अपग्रेड मिला है, जिसमें आधुनिक रडार, एवियोनिक्स और ब्रह्मोस, हरपून जैसी मिसाइलों का एकीकरण है।

शमशेर के नाम से जाना जाता है जगुआर
जगुआर को ‘शमशेर’ के नाम से भी जाना जाता है और ये डीप पेनिट्रेशन स्ट्राइक, ग्राउंड अटैक और मैरीटाइम रोल में महत्वपूर्ण हैं। आईएएफ इन्हें 2030-35 तक बनाए रखने की कोशिश कर रही है, लेकिन स्पेयर पार्ट्स की कमी के लिए ओमान और इक्वाडोर से रिटायर्ड जगुआर लेने की योजना है। आने वाले वर्षों में तेजस एमके2 और एएमसीए जैसे नए विमान इन्हें रिप्लेस करेंगे।
मिराज 2000: आईएएफ के पास वर्तमान समय में 46 से 50 मिराज 2000 विमान हैं, जिनमें 36 कॉम्बैट वैरिएंट (मिराज 2000एच/आई) और 10 ट्रेनर वैरिएंट (मिराज 2000टीएच/टीआई) शामिल हैं।

ये तीन स्क्वाड्रनों, नंबर 1 टाइगर्स, नंबर 7 बैटल एक्सेस और नंबर 9 वुल्फपैक में तैनात हैं, सभी ग्वालियर के महाराजपुर एयर फोर्स स्टेशन पर आधारित हैं। 2011 से 2016 तक इन्हें मिराज 2000-5 एमके2 स्टैंडर्ड पर अपग्रेड किया गया, जिसमें आरडीवाई-2 रडार, ग्लास कॉकपिट, मीका मिसाइल और एस्ट्रा एमके-1 जैसे भारतीय हथियार शामिल हैं।
बालाकोट एयरस्ट्राइक में इनकी भूमिका अहम रही। इन्हें 2030 से 40 तक बनाए रखने की योजना है, इसके बाद इन्हें तेजस एमके2 और एएमसीए द्वारा रिप्लेस किया जाएगा।
मजबूत होगा स्वदेशी रक्षा उद्योग
यह डील राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करेगी, खासकर लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर चीन के साथ तनाव को देखते हुए। आईएएफ का लक्ष्य 2035 तक 42 स्क्वाड्रन हासिल करना है, जिसमें 450 फाइटर्स पाकिस्तान और चीन की सीमाओं पर तैनात होंगे।साथ ही, मेक इन इंडिया को बूस्ट मिलेगा। टेक्नोलॉजी ट्रांसफर से स्वदेशी रक्षा उद्योग मजबूत होगा, रोजगार बढ़ेगा और निर्यात की संभावनाएं खुलेंगी। हालांकि, कुछ विशेषज्ञ बजट और देरी को लेकर चिंता जता रहे हैं। एमआरएफए टेंडर 2007 से लंबित है और अब राफेल को प्राथमिकता दी जा रही है। फिर भी, यह डील भारत को एशिया में एक प्रमुख एयर पावर बना सकती है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
रक्षा विश्लेषक मानते हैं कि, यह सौदा क्षेत्रीय चुनौतियों से निपटने में बड़ी मदद करेगा। पाकिस्तान और चीन की बढ़ती क्षमताओं के सामने, राफेल जैसे मल्टी-रोल जेट्स बैलेंस बनाएंगे, लेकिन क्या यह पर्याप्त होगा? ये तो आने वाले समय ही बतायेगा।
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