
डिलीवरी के बाद का समय हर महिला के जीवन में एक बेहद खास लेकिन चुनौतीपूर्ण होता है। इस दौरान शरीर में कई तरह के हार्मोनल और शारीरिक बदलाव होते हैं, जिनका असर महिला की सेहत पर लंबे समय तक रहता है। आमतौर पर इस समय थकान महसूस होना, बार-बार मूड बदलना, वजन का घटना या बढ़ना और नींद पूरी न हो पाना जैसी दिक्कतें बेहद सामान्य मानी जाती हैं, क्योंकि नई मां को बच्चे की देखभाल के साथ-साथ अपने शरीर में हो रहे बदलावों से भी जूझना पड़ता है। लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि कई बार यही सामान्य दिखने वाले लक्षण असल में थायरॉयड से जुड़ी किसी गंभीर समस्या का संकेत भी हो सकते हैं।
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डॉक्टर्स का कहना है कि, इसमें सबसे आम स्थिति पोस्टपार्टम थायरॉयडाइटिस कहलाती है, जो कि डिलीवरी के बाद पहले एक वर्ष के भीतर कई महिलाओं में उभरकर सामने आती है। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि, इस बीमारी की समय पर पहचान अक्सर नहीं हो पाती, क्योंकि इसके लक्षण एक नई मां की रोजमर्रा की सामान्य परेशानियों से काफी मिलते-जुलते होते हैं। ऐसे में महिलाएं और उनके परिवार वाले अक्सर इन लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं, यह सोचकर कि यह सिर्फ डिलीवरी के बाद की सामान्य थकान या कमजोरी है।
दो चरणों में सामने आती है यह बीमारी
पोस्टपार्टम थायरॉयडाइटिस आमतौर पर दो अलग-अलग चरणों में सामने आती है। इसके पहले चरण में महिला का थायरॉयड ग्रंथि जरूरत से कहीं ज्यादा सक्रिय हो जाता है, जिसे चिकित्सा भाषा में हाइपरथायरॉयडिज्म कहा जाता है। इस अवस्था के दौरान महिला को बेवजह घबराहट महसूस होना, दिल की धड़कनों का तेज हो जाना, स्वभाव में चिड़चिड़ापन आना और बिना किसी खास वजह के अचानक वजन घटने जैसे लक्षण देखने को मिल सकते हैं। यह लक्षण कई बार इतने हल्के होते हैं कि, महिलाएं इन्हें प्रसव के बाद की सामान्य थकान समझकर टाल देती हैं।

वहीं दूसरे चरण में स्थिति इसके ठीक विपरीत हो जाती है। इस दौरान कई महिलाओं में थायरॉयड ग्रंथि की सक्रियता धीमी पड़ जाती है, जिसे हाइपोथायरॉयडिज्म कहा जाता है। इस अवस्था में महिला को अत्यधिक थकान का एहसास होना, उदासी या डिप्रेशन जैसी मानसिक स्थिति से गुजरना, कब्ज की शिकायत रहना, त्वचा का रूखा और बेजान हो जाना, सामान्य से ज्यादा ठंड महसूस होना और किसी भी काम में मन लगाने या ध्यान केंद्रित करने में परेशानी होना जैसे लक्षण सामने आ सकते हैं। चूंकि यह सभी लक्षण भी नई मां की सामान्य जिंदगी का हिस्सा माने जाते हैं, इसलिए इस बीमारी की पहचान करना अक्सर मुश्किल हो जाता है।
समय से कराएं जांच
इस विषय पर दिल्ली स्थित मधुकर रेनबो चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल में ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी विभाग की सीनियर कंसल्टेंट डॉ. साक्षी गोयल का कहना है कि, ज्यादातर मामलों में यह समस्या अपने आप ही ठीक हो जाती है और महिला को किसी खास इलाज की जरूरत नहीं पड़ती। हालांकि कुछ मामलों में यह समस्या इतनी गंभीर हो सकती है कि महिला को लंबे समय तक चिकित्सकीय इलाज की आवश्यकता पड़ सकती है। डॉ. गोयल के मुताबिक, ऐसे में सबसे जरूरी बात यह है कि सही समय पर जरूरी ब्लड टेस्ट करवाए जाएं।
डॉक्टर के अनुसार, TSH यानी थायरॉयड स्टिम्युलेटिंग हार्मोन टेस्ट, Free T4 टेस्ट और जरूरत पड़ने पर थायरॉयड एंटीबॉडी टेस्ट के जरिए यह आसानी से पता लगाया जा सकता है कि महिला का थायरॉयड सही तरीके से काम कर रहा है या नहीं। डॉ. गोयल जोर देकर कहती हैं कि अगर यह जांच समय रहते करवा ली जाए, तो बीमारी की पहचान जल्दी हो जाती है और इलाज भी उसी हिसाब से जल्द शुरू किया जा सकता है। इससे महिला को आगे चलकर होने वाली लंबी और गंभीर परेशानियों से बचाया जा सकता है।
ब्रेस्टफीडिंग कराने वाली महिलाएं रखें विशेष ध्यान
जो महिलाएं अपने बच्चे को स्तनपान करा रही होती हैं, उनके लिए यह मामला और भी ज्यादा संवेदनशील हो जाता है, क्योंकि उन्हें अपनी सेहत के साथ-साथ बच्चे की सेहत का भी ख्याल रखना होता है। हालांकि इस बारे में राहत की बात यह है कि डॉक्टरों के मुताबिक, थायरॉयड के इलाज में इस्तेमाल होने वाली ज्यादातर दवाइयां डॉक्टर की सही सलाह और निगरानी में ब्रेस्टफीडिंग के दौरान भी पूरी तरह सुरक्षित मानी जाती हैं। समय पर सही इलाज मिलने से न सिर्फ मां की सेहत बेहतर बनी रहती है, बल्कि उसकी ऊर्जा का स्तर भी सामान्य रहता है, जिससे वह अपने नवजात बच्चे की देखभाल और स्तनपान, दोनों जिम्मेदारियों को बेहतर तरीके से निभा पाती है।
किन महिलाओं को रहना चाहिए सतर्क?
डॉक्टरों की सलाह है कि कुछ खास परिस्थितियों में महिलाओं को थायरॉयड को लेकर विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए। अगर किसी महिला को पहले से ही थायरॉयड से जुड़ी कोई बीमारी रही हो, या फिर उसके परिवार में किसी सदस्य को थायरॉयड या किसी अन्य ऑटोइम्यून बीमारी की समस्या रह चुकी हो, तो ऐसी महिलाओं को अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।

इसके अलावा, अगर किसी महिला को पहले भी किसी डिलीवरी के बाद पोस्टपार्टम थायरॉयडाइटिस की समस्या हो चुकी है, तो उसे इस बार भी डॉक्टर से इस विषय पर खुलकर बात करनी चाहिए और जरूरी जांच जरूर करवानी चाहिए।
डॉक्टरों की यह भी सलाह है कि अगर डिलीवरी के बाद लंबे समय तक अत्यधिक थकान, बार-बार उदासी का एहसास या ऊपर बताए गए किसी भी तरह के लक्षण बने रहते हैं, तो इन्हें हल्के में लेकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कई बार महिलाएं यह सोचकर इन लक्षणों को टाल देती हैं कि यह सिर्फ प्रसव के बाद की सामान्य कमजोरी है, लेकिन समय रहते सही जांच न होने पर यह समस्या आगे चलकर और गंभीर रूप ले सकती है।
हल्के में नहीं लेना चाहिए लक्षणों को
चिकित्सकों का यही मानना है कि, डिलीवरी के बाद महिलाओं में दिखने वाले लक्षणों को हल्के में नहीं लेना चाहिए। समय पर सही ब्लड टेस्ट करवाना और डॉक्टर की सलाह लेना ही इस समस्या से बचने और समय रहते इलाज शुरू करने का सबसे कारगर तरीका है। अगर सही समय पर इस दिशा में कदम उठाए जाएं, तो न सिर्फ मां की सेहत सुरक्षित रहती है, बल्कि नवजात बच्चे की सेहत भी बेहतर बनी रहती है।
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- नोट: यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी लक्षण के दिखने पर कृपया अपने डॉक्टर से संपर्क करें और स्व-चिकित्सा से बचें।



