
चिकित्सा विज्ञान की दुनिया में भूलने की बीमारी यानी डिमेंशिया को लेकर एक ऐसी रिसर्च सामने आई है, जिसने डाइट और दिमागी सेहत के पारंपरिक नजरिए को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। स्टॉकहोम यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक ताजा और बेहद व्यापक अध्ययन में यह दावा किया गया है कि, यदि किसी व्यक्ति के शरीर में डिमेंशिया या अल्जाइमर को विकसित करने वाला खास जीन मौजूद है, तो भी वह अपनी खान-पान की आदतों में मामूली बदलाव करके इस गंभीर खतरे को लगभग आधा कर सकता है।
इसे भी पढ़ें- 2026 की हेल्दी शुरुआत: भूलने की आदत को कहें अलविदा, योग-प्राणायाम से पाएं तेज दिमाग और खुशहाल जिंदगी
कम होगा जोखिम का दायरा
इस शोध के केंद्र में मांस के सेवन और मस्तिष्क की कार्यक्षमता के बीच के संबंध को रखा गया है, जिसके परिणाम न केवल चौंकाने वाले हैं, बल्कि उन लाखों लोगों के लिए एक नई उम्मीद की किरण भी हैं, जो आनुवंशिक रूप से इस बीमारी के जोखिम के दायरे में आते हैं।

आधुनिक न्यूरोसाइंस में APOE4 नाम के जीन को डिमेंशिया और अल्जाइमर के लिए सबसे बड़ा विलेन माना जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जिन लोगों के डीएनए में यह विशिष्ट वेरिएंट पाया जाता है, उनमें उम्र बढ़ने के साथ याददाश्त खोने, संज्ञानात्मक क्षमताओं में गिरावट और मानसिक भ्रम जैसी स्थितियां पैदा होने की संभावना सामान्य लोगों के मुकाबले कई गुना अधिक होती है।
अब तक यह माना जाता था कि, अगर यह जीन शरीर में सक्रिय है, तो बीमारी को रोकना लगभग नामुमकिन है, लेकिन स्वीडन के शोधकर्ताओं ने इस धारणा को चुनौती दी है। उन्होंने पाया कि सही प्रकार का पोषण इस आनुवंशिक खतरे के प्रभाव को कम करने में एक सुरक्षा कवच की तरह काम कर सकता है, जिससे दिमाग की कोशिकाओं के नष्ट होने की प्रक्रिया काफी धीमी हो जाती है।
इस अध्ययन की विश्वसनीयता का सबसे बड़ा आधार इसकी अवधि और इसमें शामिल लोगों की संख्या है। स्टॉकहोम यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों ने 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के लगभग 2000 से अधिक लोगों को अपनी इस रिसर्च का हिस्सा बनाया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इन सभी प्रतिभागियों की जीवनशैली, उनके मानसिक स्वास्थ्य और सबसे बढ़कर उनके खान-पान के पैटर्न को लगातार 15 वर्षों तक ट्रैक किया गया।
15 साल बाद हुआ डेटा विश्लेषण
इस लंबी अवधि के दौरान शोधकर्ताओं ने यह बारीक डेटा जुटाया कि कौन व्यक्ति अपनी डाइट में किस तरह के प्रोटीन का इस्तेमाल कर रहा है और समय के साथ उनके मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में क्या बदलाव आ रहे हैं। 15 साल बाद जब इस डेटा का विश्लेषण किया गया, तो जो निष्कर्ष निकले उन्होंने चिकित्सा जगत में एक नई बहस छेड़ दी है।
रिसर्च के आंकड़ों के अनुसार, जिन लोगों के शरीर में खतरनाक APOE4 जीन मौजूद था और जिन्होंने अपनी डाइट में नियमित रूप से अनप्रोसेस्ड यानी प्राकृतिक मांस को शामिल किया था, उनमें डिमेंशिया विकसित होने का जोखिम उन लोगों की तुलना में 45 प्रतिशत तक कम देखा गया, जो मांस का सेवन बहुत कम या बिल्कुल नहीं करते थे।
अध्ययन यह भी बताता है कि इन लोगों में न केवल बीमारी का खतरा कम हुआ, बल्कि उनकी सोचने-समझने की शक्ति, निर्णय लेने की क्षमता और याददाश्त भी लंबे समय तक बेहतर बनी रही। मानसिक गिरावट की वह रफ्तार, जो आमतौर पर इस जीन वाले लोगों में बहुत तेज होती है, मांस का सेवन करने वाले समूह में काफी धीमी पाई गई।
विटामिन B12 की भूमिका अहम
वैज्ञानिकों ने इस सकारात्मक प्रभाव के पीछे की कड़ियों को जोड़ते हुए विटामिन B12 की भूमिका को सबसे अहम बताया है। दरअसल, मांस विटामिन B12 का एक बहुत ही समृद्ध और प्राकृतिक स्रोत है, जो मस्तिष्क की सेहत के लिए अनिवार्य माना जाता है। विटामिन B12 हमारे शरीर में न्यूरॉन्स यानी मस्तिष्क की कोशिकाओं के बीच संदेशों के आदान-प्रदान को सुचारू बनाने का काम करता है।
इसके अलावा, यह तंत्रिका तंत्र की सुरक्षा करने वाली मायलिन शीथ नामक परत को बनाए रखने में भी मदद करता है। जब शरीर में इस विटामिन की कमी होती है, तो दिमाग की नसें कमजोर होने लगती हैं, जिससे व्यक्ति को छोटी-छोटी बातें भूलने, एकाग्रता की कमी और अंततः गंभीर मानसिक विकार होने लगते हैं। शोध का तर्क है कि मांस के जरिए मिलने वाला प्राकृतिक पोषण दिमाग को वह मजबूती देता है, जिससे वह आनुवंशिक दोषों के बावजूद बेहतर काम कर पाता है।
हालांकि, इस रिसर्च में एक बहुत ही गंभीर चेतावनी भी शामिल की गई है, जिसे नजरअंदाज करना सेहत पर भारी पड़ सकता है। वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि मांस के नाम पर कुछ भी खाना फायदेमंद नहीं है। अध्ययन में पाया गया कि केवल अनप्रोसेस्ड मीट, जैसे कि ताजा चिकन या मटन ही दिमाग के लिए सुरक्षा कवच का काम करते हैं। इसके विपरीत, बाजार में मिलने वाला प्रोसेस्ड मीट जैसे कि बेकन, सॉसेज, सलामी, हॉट डॉग या डिब्बाबंद मांस दिमाग की सेहत के लिए किसी जहर से कम नहीं है।’
प्रोसेस्ड मीट से बढ़ता है खतरा
प्रोसेस्ड मीट को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए उनमें भारी मात्रा में सोडियम, नाइट्रेट्स और अन्य प्रिजर्वेटिव्स मिलाए जाते हैं। ये तत्व शरीर के अंदर जाकर ‘इन्फ्लेमेशन’ यानी सूजन पैदा करते हैं, जो सीधे तौर पर मस्तिष्क की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती है और डिमेंशिया के खतरे को कम करने के बजाय और ज्यादा बढ़ा देती है।
इस क्रांतिकारी अध्ययन के सामने आने के बाद भी चिकित्सा विशेषज्ञों का एक वर्ग सतर्कता बरतने की सलाह देता है। जानकारों का कहना है कि हालांकि यह रिसर्च डाइट के महत्व को साबित करती है, लेकिन डिमेंशिया एक जटिल बीमारी है। इसमें केवल खान-पान ही नहीं, बल्कि व्यक्ति की समग्र जीवनशैली, उसकी शारीरिक सक्रियता, नींद का पैटर्न और सामाजिक जुड़ाव भी उतनी ही भूमिका निभाते हैं।
एक्सपर्ट्स का तर्क है कि जो लोग संतुलित मात्रा में मांस खाते हैं, अक्सर उनकी अन्य आदतें भी सेहत के प्रति जागरूक हो सकती हैं, जिसका असर नतीजों पर पड़ सकता है। फिर भी, स्टॉकहोम यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का मानना है कि यह शुरुआती निष्कर्ष इस दिशा में एक मील का पत्थर है कि कैसे हम अपनी डाइट में सुधार करके अपने डीएनए की सीमाओं को लांघ सकते हैं।
पोषक तत्व जरूरी
निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि भविष्य में डिमेंशिया से बचने के लिए केवल दवाइयां ही काफी नहीं होंगी, बल्कि पोषण संबंधी हस्तक्षेप भी उतने ही जरूरी होंगे। जिन परिवारों में अल्जाइमर या याददाश्त खोने का इतिहास रहा है, उनके लिए यह अध्ययन एक मार्गदर्शिका की तरह है।
संतुलित मात्रा में पोषक तत्वों से भरपूर डाइट, प्रोसेस्ड फूड से दूरी और सक्रिय जीवनशैली ही वह रास्ता है, जिससे हम अपने मस्तिष्क को उम्र के आखिरी पड़ाव तक युवा और ऊर्जावान बनाए रख सकते हैं। वैज्ञानिकों की यह खोज आने वाले समय में डिमेंशिया के इलाज और उससे बचाव की रणनीतियों में व्यापक बदलाव ला सकती है, जिससे करोड़ों बुजुर्गों को एक स्वस्थ और गरिमापूर्ण जीवन जीने में मदद मिलेगी।
इसे भी पढ़ें- जरुरी खबर: 1000 रुपए जुर्माना देकर भी पैन-आधार लिंक कराने के लिए बचे सिर्फ 2 दिन, न करें भूलने की गलती



