
लखनऊ। भारत की राजनीति में एक कहावत प्रचलित है कि, दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर ही गुजरता है, लेकिन आने वाले समय में यह रास्ता न केवल और चौड़ा होने वाला है, बल्कि इसकी सियासी अहमियत भी दोगुनी होने की संभावना है। केंद्र सरकार आगामी 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले देश के राजनीतिक मानचित्र को पूरी तरह बदलने की तैयारी में जुटी है। महिला आरक्षण कानून यानी नारी वंदन अधिनियम के लागू होने के साथ ही देश में परिसीमन का चक्र घूमने वाला है, जिससे उत्तर प्रदेश की सीटों में एक बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है।
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हो सकती हैं 516 सीटें
सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार 2029 के चुनाव से पहले लोकसभा सीटों की संख्या को मौजूदा 543 से बढ़ाकर लगभग 816 करने की योजना पर गंभीरता से काम कर रही है। इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा आधार नारी वंदन अधिनियम होगा जिसके तहत महिलाओं को तैंतीस प्रतिशत आरक्षण दिया जाना है। सीटों की संख्या बढ़ने से महिला उम्मीदवारों के लिए पर्याप्त स्थान सुनिश्चित हो सकेगा और साथ ही बढ़ती आबादी के अनुपात में जन-प्रतिनिधित्व भी बेहतर तरीके से संतुलित हो पाएगा।
इस पूरे बदलाव में उत्तर प्रदेश एक बार फिर किंगमेकर की भूमिका में सबसे ऊपर नजर आ रहा है, क्योंकि अनुमान है कि यहां लोकसभा की सीटें वर्तमान 80 से बढ़कर 120 तक पहुंच सकती हैं। यदि ऐसा होता है तो अकेले उत्तर प्रदेश की ताकत कई छोटे राज्यों के कुल योग से भी अधिक हो जाएगी। वर्तमान में उत्तर प्रदेश में 80 लोकसभा सीटें हैं जिनमें 63 सीटें सामान्य वर्ग के लिए और 17 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि, यदि परिसीमन के बाद सीटों की संख्या 120 होती है, तो सामान्य वर्ग की सीटें बढ़कर 94 या 95 तक हो सकती हैं, जबकि अनुसूचित जाति के कोटे में 25 से 26 सीटें आने की संभावना है। यह वृद्धि न केवल भौगोलिक होगी बल्कि राजनीतिक रूप से भी पिछड़े और दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व में एक नया संतुलन पैदा करेगी। उत्तर प्रदेश के संसदीय इतिहास को देखें तो यह बेहद दिलचस्प रहा है क्योंकि जब 1951 में देश में पहला आम चुनाव हुआ था तब यूपी में कुल 69 निर्वाचन क्षेत्र थे और उस समय उत्तराखंड भी इसी राज्य का हिस्सा हुआ करता था।
1973 के परिसीमन में हुआ था बड़ा बदलाव
दिलचस्प बात यह है कि 1951 के चुनाव में आज की तरह एक क्षेत्र और एक सांसद की व्यवस्था पूरी तरह लागू नहीं थी। तब उत्तर प्रदेश की 52 सीटों पर एक-एक सांसद चुने जाते थे, जबकि 17 ऐसे क्षेत्र थे जहां से दो-दो सांसद चुने जाते थे ताकि विभिन्न समुदायों को उचित प्रतिनिधित्व मिल सके। उस दौर में निर्वाचन क्षेत्रों के नाम भी बड़े और संयुक्त हुआ करते थे जैसे कि देहरादून जिला सह बिजनौर जिला या जालौन जिला सह इटावा जिला।
समय के साथ आबादी बढ़ी और प्रतिनिधित्व की मांग भी बढ़ती गई, जिसके परिणामस्वरूप 1973 के परिसीमन के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीतिक सीमाओं को फिर से परिभाषित किया गया और सीटों की संख्या बढ़ाकर 85 कर दी गई। यह वह दौर था, जब यूपी की 85 सीटें केंद्र की सत्ता तय करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाती थीं और इसमें टिहरी गढ़वाल, अल्मोड़ा, नैनीताल जैसे पहाड़ी क्षेत्रों से लेकर रॉबर्ट्सगंज और झांसी जैसे मैदानी इलाके शामिल थे।
बदलेगी चुनावी रणनीति
9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश के भूगोल में एक और बड़ा बदलाव आया जब पहाड़ी क्षेत्रों को अलग कर उत्तराखंड राज्य का गठन किया गया। इस बंटवारे के साथ ही उत्तर प्रदेश की 85 लोकसभा सीटों में से 5 सीटें नवगठित राज्य के खाते में चली गईं और उत्तर प्रदेश के पास कुल 80 सीटें बचीं जो आज भी बरकरार हैं। वर्तमान में ये 80 सीटें पश्चिमी यूपी के सहारनपुर और मुजफ्फरनगर से लेकर पूर्वांचल के वाराणसी और गाजीपुर तक फैली हुई हैं।
वाराणसी जैसी सीट जहां देश के प्रधानमंत्री का प्रतिनिधित्व है, वहीं अमेठी और रायबरेली जैसी सीटें दशकों तक हाई-प्रोफाइल सियासत का केंद्र रही हैं। 2029 में प्रस्तावित 120 सीटों का मॉडल न केवल यूपी के भीतर नए जिलों और तहसीलों को नई राजनीतिक पहचान देगा बल्कि चुनावी रणनीतियों को भी पूरी तरह बदल देगा।
सीटों की संख्या बढ़ने से सांसदों का क्षेत्र छोटा होगा जिससे जनता और प्रतिनिधि के बीच संवाद बढ़ेगा और महिला आरक्षण के साथ मिलकर यह बदलाव लगभग 40 नई सीटों पर नए राजनीतिक नेतृत्व को उभरने का अवसर देगा। उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से प्रयोगों की प्रयोगशाला रही है और 1951 के 69 निर्वाचन क्षेत्रों से शुरू हुआ यह सफर अब 120 के जादुई आंकड़े की ओर बढ़ता दिख रहा है जो भारत के लोकतंत्र में उत्तर प्रदेश की आवाज को और अधिक बुलंद करेगा।
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