\n\n\n\n\n \n

‘चवन्नी’ पर भिड़े अखिलेश-जयंत, एक बार फिर सियासी अखाड़ा बना पश्चिमी यूपी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में सियासी माहौल गरमाया हुआ है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश एक बार फिर सियासी अखाड़ा बनता हुआ नजर आ रहा है। समाजवादी पार्टी के मुखिया और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व राष्ट्रीय लोकदल के प्रमुख जयंत चौधरी के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। ये जंग हाल में ही में अखिलेश यादव द्वारा दिए गये चवन्नी वाले बयान को लेकर शुरू हुई है। इस पूरे विवाद के केंद्र में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जाट राजनीति, किसान राजनीति और पुराने गठबंधन के रिश्तों की एक नई और पेचीदा तस्वीर उभरती दिख रही है।

इसे भी पढ़ें- उत्तर प्रदेश में आधार केंद्रों का बड़ा विस्तार, 32 जिलों में शुरू हुई सेवा

जयंत चौधरी का तीखा पलटवार

अखिलेश यादव के बयान पर पलटवार करते हुए राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष जयंत चौधरी ने कहा, लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि होती है और वही तय करती है कि कौन “चवन्नी” है और कौन “रुपया”। उन्होंने अपने बयान में यह भी जोड़ा कि अहंकार व्यक्ति को राजनीतिक पतन की तरफ ले जाता है। जयंत चौधरी की यह टिप्पणी सीधे तौर पर अखिलेश यादव के उस बयान पर निशाना मानी जा रही है, जो उन्होंने अपने पुराने सहयोगियों को लेकर दिया था।

Akhilesh and Jayant clash over 'Chavanni'

दरअसल, विवाद की जड़ में अखिलेश यादव का वह बयान है, जिसमें उन्होंने गठबंधन के पुराने साथियों पर तंज कसते हुए कहा था कि उन्होंने ‘चवन्नी को रुपया बना दिया’, इसके बावजूद कुछ लोग उनका साथ छोड़कर चले गए। राजनीतिक हलकों में इस टिप्पणी को सीधे तौर पर राष्ट्रीय लोकदल और जयंत चौधरी से जोड़कर देखा गया था। इस बयान के सामने आते ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आरएलडी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच नाराजगी की खबरें आने लगीं।

व्यक्तिगत टिप्पणी से आगे बढ़ा विवाद

रालोद प्रमुख जयंत चौधरी ने इस पूरे मामले को सिर्फ अपनी व्यक्तिगत टिप्पणी तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने सपा पर सीधा निशाना साधते हुए कहा कि, राजनीतिक विरोध करते-करते पूरे समाज का विरोध कर देना ठीक नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने जाट और गुर्जर समाज को लेकर कथित तौर पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों का मुद्दा भी उठाया और इसे लोकतांत्रिक राजनीति के लिए दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। जयंत के इस बयान ने विवाद को व्यक्तिगत स्तर से निकालकर सामाजिक और जातीय अस्मिता के दायरे में ला खड़ा किया है।

 जाट अस्मिता का भी सवाल

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में जयंत चौधरी की अहमियत केवल एक राजनीतिक दल के मुखिया के रूप में नहीं आंकी जा सकती। चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक विरासत से जुड़े होने के कारण राष्ट्रीय लोकदल लंबे समय से जाट और किसान राजनीति का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता रहा है। ऐसे में जयंत चौधरी पर की गई टिप्पणी को आरएलडी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट अस्मिता से जोड़कर पेश करने की रणनीतिक कोशिश करती दिख रही है।

यही वजह है कि “चवन्नी” को लेकर उठा यह विवाद अब महज एक व्यक्तिगत राजनीतिक कटाक्ष से आगे बढ़कर जाट बनाम यादव राजनीतिक विमर्श की दिशा में बढ़ता दिखाई दे रहा है। हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि, इस बयान का पूरे जाट समाज पर एक जैसा असर पड़ेगा, लेकिन इतना जरूर स्पष्ट है कि, आरएलडी इस मुद्दे को अपने राजनीतिक हित में भुनाने की पूरी कोशिश में जुट गई है।

 कभी अच्छे थे रिश्ते, अब हैं आमने-सामने

गौरतलब है कि, एक समय था जब अखिलेश यादव और जयंत चौधरी की जोड़ी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा-आरएलडी गठबंधन की सबसे मजबूत धुरी माना जाता था। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में दोनों दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा था और जाट-मुस्लिम सामाजिक समीकरण को साधने की कोशिश की थी। उस दौर में सीटों के बंटवारे से लेकर उम्मीदवारों के चयन तक हर स्तर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जातीय समीकरणों को खास तवज्जो दी गई थी।

लेकिन समय के साथ दोनों दलों के सियासी रास्ते जुदा हो गए। जयंत चौधरी एनडीए गठबंधन में शामिल हो गए और वर्तमान में केंद्र सरकार में मंत्री के तौर पर काम कर रहे हैं, जबकि अखिलेश यादव सपा के पीडीए यानी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं। राजनीतिक दिशा में आया यह बदलाव अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दोनों नेताओं को एक-दूसरे के आमने-सामने खड़ा कर रहा है।

 पश्चिमी यूपी इतना अहम क्यों

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट वोट बैंक को कई विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाने वाला माना जाता है। जाटों के साथ-साथ मुस्लिम, गुर्जर, दलित और अन्य पिछड़ी जातियों का सामाजिक समीकरण भी चुनावी नतीजों पर गहरा असर डालता है। ऐसे में जहां समाजवादी पार्टी अपने पुराने सामाजिक गठजोड़ और पीडीए रणनीति का विस्तार करना चाहती है। वहीं, राष्ट्रीय लोकदल एनडीए के साथ रहते हुए अपने परंपरागत जाट-किसान आधार को बचाए रखने की चुनौती से जूझ रही है।

Akhilesh and Jayant clash over 'Chavanni'

यही कारण है कि, अखिलेश यादव का “चवन्नी” वाला बयान और उस पर जयंत चौधरी की प्रतिक्रिया को 2027 की बड़ी राजनीतिक लड़ाई की शुरुआती दस्तक के तौर पर देखा जा रहा है। रालोद इस विवाद को जाट सम्मान के मुद्दे से जोड़कर सपा के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश कर सकती है, जबकि सपा की रणनीति पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यादव-मुस्लिम समीकरण के साथ-साथ अन्य पिछड़े और वंचित समूहों को भी अपने साथ जोड़कर अपना जनाधार बढ़ाने की होगी।

क्या किंगमेकर बनेंगे जाट वोटर

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में असली सवाल यही है कि 2027 के चुनाव में जाट मतदाता आखिरकार किस राजनीतिक दिशा में जाते हैं। आरएलडी के एनडीए में शामिल होने के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि जाट राजनीति का बड़ा हिस्सा किस हद तक उसके साथ बना रहता है, क्योंकि यह चुनावी नतीजों पर सीधा असर डालने वाला कारक साबित हो सकता है। वहीं दूसरी तरफ सपा की कोशिश होगी कि, वह आरएलडी के प्रभाव वाले इलाकों में अपनी राजनीतिक पैठ बढ़ाए और वहां के सामाजिक समीकरणों में सेंध लगाए।

 

इसे भी पढ़ें- उत्तर प्रदेश में हाउस टैक्स बढ़ाने की तैयारी, 15 साल बाद बदलेंगी दरें

Related Articles

Back to top button