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कहा- धर्म की रक्षा के लिए जरूरत पड़ने पर संघर्ष को भी तैयार रहना चाहिए
वाराणसी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा, याद रखिए, एक संन्यासी के जीवन का लक्ष्य यही होना चाहिए कि धन के लिए धर्म नहीं त्यागूंगा, और अगर युद्ध छिड़ गया तो बम-गोले भी दागूंगा।” उन्होंने कहा कि देश और धर्म के लिए किया गया हर त्याग महान होता है। शांति के समय धर्म का रूप संयम, सौहार्द और लोककल्याण है, लेकिन राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए जरूरत पड़ने पर संघर्ष के लिए भी तैयार रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत सेवाश्रम संघ ने कठिन हालात में भी अपने मूल्यों, आदर्शों और सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। राष्ट्र की उन्नति को आत्मोन्नति का माध्यम बनाकर संस्था ने आध्यात्मिक साधना को राष्ट्र जागरण और लोककल्याण से जोड़ा है।
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शताब्दी समारोह को किया संबोधित
मुख्यमंत्री बुधवार को वाराणसी में भारत सेवाश्रम संघ की काशी शाखा के शताब्दी समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने स्वामी प्रणवानंद महाराज के चित्र पर माल्यार्पण कर आरती की और मां दुर्गा की प्रतिमा के सामने दीप जलाकर पूजा-अर्चना की। संघ के प्रधान सचिव स्वामी विश्वात्मानंद ने अंगवस्त्र और प्रतीक चिह्न भेंट कर मुख्यमंत्री का सम्मान किया।

योगी ने कहा कि 1926 में स्थापित काशी शाखा ने सेवा और राष्ट्र जागरण की परंपरा के सौ वर्ष पूरे कर लिए हैं। यह संस्था न सिर्फ भारत, बल्कि दुनिया के कई देशों में सनातन मूल्यों और ऋषि परंपरा को आगे बढ़ा रही है।
आपसी बिखराव से विदेशी आक्रांताओं को मिला अवसर
योगी ने कहा कि जब राष्ट्र संकट में होता है, तो उसकी आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत भी संकट में आ जाती है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर विदेशी आक्रांताओं को सफलता न मिली होती, तो क्या काशी विश्वनाथ मंदिर को अपवित्र और क्षतिग्रस्त करने का दुस्साहस किया जा सकता था? क्या राम जन्मभूमि पांच सौ वर्षों तक गुलामी के कलंक के साथ रहती, या श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर ऐसा संकट आता?
उन्होंने कहा कि, आपसी बिखराव का नतीजा देश को भुगतना पड़ा, और इसी पाप के प्रायश्चित के लिए संतों ने आध्यात्मिक साधना को राष्ट्रीय जागरण का साधन बनाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में काशी विश्वनाथ धाम और अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण इसी राष्ट्रीय चेतना और संकल्प का परिणाम है।
गोरक्षपीठ में मिली थी स्वामी प्रणवानंद को दीक्षा
मुख्यमंत्री ने बताया कि संघ के संस्थापक स्वामी प्रणवानंद महाराज का गोरक्षपीठ से गहरा नाता रहा है। 1912-13 में वे गोरखपुर पहुंचे और सिद्ध योगी बाबा गंभीरनाथ के सान्निध्य में साधना की। उन्होंने स्वामी प्रणवानंद के बचपन का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि करीब 12-13 वर्ष की उम्र में वे अपने शिक्षक के साथ गुरु की तलाश में गोरखपुर आए थे।
एक संन्यासी का यही ध्येय होना चाहिए…
‘धन’ के निमित्त ‘धर्म’ नहीं त्यागूंगा और छिड़ गया युद्ध तो बम-गोले भी दागूंगा… https://t.co/Tn8BeekBod
— Yogi Adityanath (@myogiadityanath) October 14, 2026
बाबा गंभीरनाथ ने उन्हें देखकर जन्मजात सिद्ध योगी बताया था। साधना के दौरान वे तीन घंटे तक अखंड समाधि में रहे। योगी ने कहा कि गोरखपुर से मिली आध्यात्मिक प्रेरणा को स्वामी प्रणवानंद ने पूरे देश में राष्ट्र जागरण का माध्यम बनाया। इसी ऐतिहासिक संबंध के कारण उन्हें भारत सेवाश्रम संघ से विशेष लगाव है।
संघ ने जगाई स्वाधीनता और हिंदू जागरण की अलख
योगी ने कहा कि स्वामी प्रणवानंद ने 1926 में काशी शाखा की स्थापना की थी। पराधीनता के दौर में संघ स्वाधीनता और हिंदू जागरण की अलख जगाता रहा। आज संघ देश के साथ-साथ दुनिया के अनेक देशों में सनातन मूल्यों और ऋषि परंपरा का प्रसार कर रहा है। उन्होंने कहा कि संघ ने राष्ट्रवाद को अपने जीवन का ध्येय बनाया।
उन्होंने कहा कि, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को कांग्रेस की तुष्टीकरण नीति के खिलाफ नया राजनीतिक संगठन बनाने की प्रेरणा भी स्वामी प्रणवानंद से मिली थी। योगी ने कहा कि संघ के संन्यासियों ने कठिन परिस्थितियों में भी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया, और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।
100 परिवारों को आत्मनिर्भर बनाने की पहल
शताब्दी समारोह में संघ की ओर से 100 परिवारों को सिलाई मशीनें दी गईं, जिनमें से पांच परिवारों को मुख्यमंत्री ने स्वयं मशीनें सौंपीं। उन्होंने कहा कि सौ परिवारों को आत्मनिर्भर बनाने की यह पहल सराहनीय है और प्रधानमंत्री मोदी के आत्मनिर्भर व विकसित भारत के संकल्प के अनुरूप है। उन्होंने प्रयागराज कुंभ में संघ के अन्न क्षेत्र की सेवा और देशभर में चल रहे लोककल्याणकारी कार्यों की भी प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि शांति के समय सेवा और लोककल्याण से समाज को सक्षम बनाना ही आध्यात्मिक साधना की सार्थकता है।
धर्म को मानवता और अध्यात्म को सेवा से जोड़ा: स्वामी विश्वात्मानंद
संघ के प्रधान सचिव स्वामी विश्वात्मानंद ने कहा कि, काशी शाखा की स्थापना धर्म को मानवता, अध्यात्म को सेवा और तीर्थ को राष्ट्रीय जागरण से जोड़ने के संकल्प के साथ हुई थी। संघ पीड़ितों की सहायता, तीर्थयात्रियों की सेवा, चिकित्सा, शिक्षा, जनजातीय कल्याण और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण के लिए काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत के निर्माण के लिए शिक्षित, चरित्रवान और संवेदनशील समाज जरूरी है।
कार्यक्रम में ये रहे मौजूद
समारोह में वित्त मंत्री सुरेश कुमार खन्ना, राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) रवींद्र जायसवाल, राज्यमंत्री दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’, हंसराज विश्वकर्मा, महापौर अशोक तिवारी, जिला पंचायत अध्यक्ष पूनम मौर्य, विधायक डॉ. नीलकंठ तिवारी, डॉ. अवधेश सिंह, सौरभ श्रीवास्तव, त्रिभुवन राम और सुनील पटेल मौजूद रहे। संघ की ओर से स्वामी विश्वात्मानंद, स्वामी धनेशानंद, स्वामी अम्बरीशानंद और स्वामी आत्मज्ञानानंद के साथ देश-विदेश से आए संन्यासी और स्वयंसेवक भी उपस्थित थे।
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