
Ganesh Chaturthi 2026: भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को हर वर्ष अत्यंत धूमधाम और श्रद्धा के साथ गणेश चतुर्थी का पावन पर्व मनाया जाता है। इस वर्ष यह त्योहार 14 सितंबर यानी सोमवार से शुरू होने जा रहा है, जब घर-घर और सार्वजनिक पंडालों में विधि-विधान से गणपति बप्पा की स्थापना की जाएगी। इस उत्सव के दौरान जब भी हमारी नजर भगवान गणेश की प्रतिमा पर पड़ती है, तो उनके चरणों के पास एक छोटा सा मूषक यानी चूहा हमेशा दिखाई देता है। यह दृश्य इतना सामान्य हो चुका है कि अक्सर लोग इस पर ध्यान ही नहीं देते, लेकिन कई श्रद्धालुओं के मन में यह जिज्ञासा जरूर उठती है कि आखिर इतने विशालकाय और शक्तिशाली भगवान ने एक नन्हे से मूषक को ही अपना वाहन क्यों चुना।
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इसके साथ ही एक और सवाल भी लोगों के मन में बार-बार आता है कि क्या पूजा के लिए गणेश जी की मूर्ति के साथ मूषक का होना वाकई अनिवार्य है। इन दोनों ही सवालों के पीछे एक बेहद रोचक पौराणिक कथा और गहरा आध्यात्मिक अर्थ छिपा हुआ है, जिसे जानना हर भक्त के लिए दिलचस्प होगा।
क्रौंच गंधर्व और गणेशजी के पाश की पौराणिक कथा
इस रहस्य को समझने के लिए हमें प्राचीन पौराणिक कथाओं की ओर रुख करना होगा। पौराणिक ग्रंथों में वर्णित एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार क्रौंच नामक एक गंधर्व अपनी शक्तियों के अहंकार में चूर होकर लगातार उत्पात मचा रहा था। उसकी उद्दंडता इस हद तक बढ़ गई थी कि, वह महर्षि पराशर के पवित्र आश्रम को पूरी तरह रौंदते हुए वहां रहने वाले ऋषि-मुनियों और अन्य लोगों को बुरी तरह परेशान करने लगा था। आश्रम में मची इस अव्यवस्था और उत्पात को देखकर भगवान गणेश ने स्वयं हस्तक्षेप करने का फैसला किया। उन्होंने अपने दिव्य पाश का प्रयोग करते हुए क्रौंच गंधर्व पर वार किया और उसे पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले लिया।

जब गणेश जी ने इस तरह उसे कड़ा सबक सिखाया, तो अहंकारी क्रौंच गंधर्व को अपनी भूल का गहराई से एहसास हुआ। उसने विनम्रता के साथ अपनी गलती स्वीकार करते हुए भगवान गणेश से क्षमा याचना की। जब गणेश जी ने उसकी सच्चे मन से की गई क्षमा प्रार्थना सुनी, तो उन्होंने उस पर विशेष कृपा बरसाई और उसे अपने वाहन मूषक के रूप में स्वीकार कर लिया।
इस तरह क्रौंच गंधर्व का समस्त अहंकार पूरी तरह समाप्त हो गया, और वह एक छोटे से मूषक का रूप धारण कर सदा-सदा के लिए भगवान गणेश की सेवा में समर्पित हो गया। यह पौराणिक कथा हमें यह गहरा संदेश देती है कि, चाहे कितना भी बड़ा और शक्तिशाली अहंकार क्यों न हो, ईश्वर की शक्ति और न्याय के समक्ष उसे झुकना ही पड़ता है।
मूषक की चंचलता और बुद्धि से जुड़ा गहरा संदेश
धार्मिक शास्त्रों में मूषक को केवल एक साधारण जीव या मात्र एक वाहन के रूप में नहीं देखा गया है, बल्कि इसे मनुष्य के भीतर मौजूद चंचलता, वासना और अज्ञानता का सशक्त प्रतीक माना गया है। मूषक का स्वाभाविक गुण होता है इधर-उधर लगातार भागते रहना और अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को कुतरते रहना, जो मानव मन की अस्थिरता और चंचल प्रवृत्ति से काफी मिलता-जुलता है।
ऐसे में जब भगवान गणेश स्वयं इस चंचल मूषक पर सवार होकर विराजमान होते हैं, तो वे पूरे संसार को यह गहरा और प्रेरणादायक संदेश देते हैं कि, अपनी बुद्धि, विवेक और आत्मसंयम के बल पर मन की इस चंचलता और अनियंत्रित तृष्णा पर पूरी तरह नियंत्रण पाना बिल्कुल संभव है।
जब कोई मनुष्य अपनी विवेकशीलता और बुद्धि का सही तरीके से प्रयोग करता है, तो वह अपने भीतर छिपे अज्ञान के अंधकार और मन की चंचल प्रवृत्तियों को आसानी से अपने वश में कर सकता है। भगवान गणेश की यह अनूठी सवारी हमें यही महत्वपूर्ण शिक्षा देती है कि केवल संयम, ज्ञान और आत्मनियंत्रण के बल पर ही व्यक्ति जीवन में मौजूद समस्त बुराइयों, कमजोरियों और नकारात्मक प्रवृत्तियों पर विजय हासिल कर सकता है। इसी वजह से गणेश जी और मूषक के बीच का यह संबंध केवल एक धार्मिक प्रतीक न होकर एक गहन जीवन दर्शन भी बन जाता है।
प्रतिमा में मूषक का होना क्यों माना गया है अनिवार्य?
धार्मिक ग्रंथों और शास्त्रों के अनुसार भगवान गणेश की प्रतिमा के साथ उनके वाहन मूषक का होना अत्यंत आवश्यक और अनिवार्य माना गया है। शास्त्रों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यदि गणपति जी की मूर्ति के साथ मूषक मौजूद न हो, तो उनकी पूजा को पूर्ण नहीं माना जाता, बल्कि इसे अधूरी पूजा के समान समझा जाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि, मूषक को केवल भगवान गणेश का साधारण वाहन नहीं, बल्कि उनका सबसे प्रथम और विश्वासपात्र सेवक भी माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह भी कहा जाता है कि, मूषक ही वह माध्यम है, जो प्रत्येक भक्त की छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी प्रार्थना को सीधे भगवान गणेश तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य करता है। यही कारण है कि जब भी किसी घर, दुकान, पंडाल या सार्वजनिक स्थान पर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित की जाती है, तो हमेशा मूषक सहित ही उनकी मूर्ति लाई जाती है, और इसे धार्मिक दृष्टि से बेहद जरूरी माना जाता है।
शास्त्रों में यह भी उल्लेख मिलता है कि, जो भक्त पूरी श्रद्धा, भक्ति और विधि-विधान के साथ मूषक सहित गणेश जी का विधिवत पूजन करते हैं, उनके घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली का वास होता है, साथ ही जीवन में आने वाले सभी प्रकार के विघ्न और बाधाएं स्वतः ही दूर होने लगती हैं। इसी कारण गणेश चतुर्थी के इस पावन अवसर पर हर घर में मूषक सहित गणपति बप्पा की प्रतिमा स्थापित करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है, जिसे आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जाता है।
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