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मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी पर यूपी में पोस्टर वार, 13 साल बाद फिर गरमाई सियासत

लखनऊ। मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक दंगों की 13वीं बरसी पर रविवार को उत्तर प्रदेश के कई शहरों में एक साथ नजर आए पोस्टरों ने प्रदेश की सियासत में नया उबाल ला दिया है। लखनऊ, मुजफ्फरनगर, अलीगढ़, सहारनपुर और शामली सहित विभिन्न जिलों में सुबह-सुबह दीवारों और चौराहों पर चस्पा किए गए इन पोस्टरों पर मोटे और बड़े अक्षरों में एक ही संदेश लिखा नजर आया- “न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे।” यह वाक्य देखते ही देखते सोशल मीडिया पर भी वायरल हो गया और दिनभर चर्चा का विषय बना रहा।

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सपा को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश

पोस्टर किसने और किस संगठन के बैनर तले लगवाए, इसे लेकर फिलहाल स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है, लेकिन इनकी भाषा और समय को देखते हुए राजनीतिक हलकों में इसे 2013 के दंगों के लिए तत्कालीन समाजवादी पार्टी सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। पोस्टर लगने की खबर फैलते ही कुछ जिलों में माहौल तनावपूर्ण हो गया।

Muzaffarnagar riots

बताया जा रहा है कि, जब समाजवादी पार्टी से जुड़े कार्यकर्ता इन पोस्टरों को हटाने या इनका विरोध करने मौके पर पहुंचे, तो वहां पोस्टर लगाने वालों के साथ उनकी नोकझोंक हो गई। कुछ स्थानों पर यह विवाद हाथापाई और झड़प तक पहुंच गया, जिसके बाद स्थानीय पुलिस को तुरंत मौके पर पहुंचकर हालात को संभालना पड़ा। पुलिस बल की सक्रियता से बड़ी अनहोनी टल गई, लेकिन इस घटनाक्रम ने बरसी के दिन प्रदेश के राजनीतिक तापमान को और बढ़ा दिया।

60 से अधिक लोगों की गई थी जान

गौरतलब है कि, 7 सितंबर 2013 को मुजफ्फरनगर और उससे सटे इलाकों में भड़की सांप्रदायिक हिंसा उत्तर प्रदेश के इतिहास की सबसे भयावह घटनाओं में गिनी जाती है। इस दंगे ने न केवल दर्जनों परिवारों को उजाड़ दिया था, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सामाजिक ताने-बाने पर भी गहरा जख्म छोड़ा था। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस हिंसा में 60 से अधिक लोगों की जान गई थी, जबकि अनौपचारिक आंकड़े इससे कहीं अधिक बताए जाते हैं।

हिंसा इतनी व्यापक और भीषण थी कि, करीब 50 हजार से ज्यादा लोगों को अपने घर-बार छोड़कर राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी थी। कई परिवार तो आज तेरह साल बाद भी अपने पुराने गांवों को लौटकर नहीं बस पाए हैं। स्थिति इतनी विकट हो गई थी कि, पुलिस और प्रशासन के हाथ से मामला लगभग निकल चुका था, जिसके बाद हिंसा पर काबू पाने के लिए सेना को बुलाना पड़ा था। कर्फ्यू और सेना की तैनाती के बावजूद कई दिनों तक इलाके में तनाव और डर का माहौल बना रहा था।

सपा की थी सरकार

उस समय प्रदेश की सत्ता अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी सरकार के हाथों में थी। दंगों के फौरन बाद से ही सरकार पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने में पूरी तरह विफल रहने के आरोप लगने शुरू हो गए थे। विपक्षी दलों, खासकर भाजपा ने बार-बार यह सवाल उठाया कि समय रहते प्रशासनिक कार्रवाई क्यों नहीं की गई और खुफिया एजेंसियों की चेतावनियों के बावजूद हालात को बिगड़ने से क्यों नहीं रोका गया।

इससे भी आगे बढ़कर विपक्ष ने सपा सरकार पर यह गंभीर आरोप लगाया था कि दंगों में शामिल कुछ लोगों को राजनीतिक संरक्षण दिया गया, ताकि आगामी चुनावों में इसका सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के तौर पर लाभ उठाया जा सके। हालांकि समाजवादी पार्टी लगातार इन आरोपों को खारिज करती रही है और इन्हें राजनीतिक साजिश करार देती रही है।

सैफई में हो रहा था भव्य महोत्सव

दंगों के बाद बने राहत शिविरों में विस्थापित परिवारों की स्थिति भी लंबे समय तक विवादों में रही। शिविरों में मूलभूत सुविधाओं की कमी, ठंड के मौसम में बच्चों की मौत जैसी घटनाओं ने सरकार की कार्यशैली पर और सवाल खड़े किए थे। मानवाधिकार संगठनों और विपक्षी नेताओं ने बार-बार यह आरोप लगाया कि, सरकार पीड़ितों के पुनर्वास को लेकर गंभीर नहीं है।

Muzaffarnagar riots

इसी दौर में एक और विवाद ने तूल पकड़ा था, जब दंगा प्रभावित इलाकों में पीड़ित परिवार राहत और न्याय के लिए संघर्ष कर रहे थे, उसी समय सैफई में भव्य सैफई महोत्सव का आयोजन हुआ था। विपक्ष ने इस आयोजन को दंगा पीड़ितों की पीड़ा के प्रति सरकार की असंवेदनशीलता और तत्कालीन नेतृत्व की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाने के लिए बार-बार निशाना बनाया।

सपा ने नहीं दी प्रतिक्रिया

अब तेरह वर्ष बाद, जब मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी एक बार फिर आई है, तो पोस्टरों के जरिए इस पुराने अध्याय को फिर से जनचर्चा में ला दिया गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि, इस तरह के पोस्टर अभियान महज संयोग नहीं, बल्कि सुनियोजित रणनीति का हिस्सा प्रतीत होते हैं, जिनका मकसद आगामी चुनावी माहौल में सांप्रदायिक हिंसा के मुद्दे को जीवंत बनाए रखना है।

पोस्टरों में इस्तेमाल किया गया नारा- “न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे”- स्पष्ट रूप से यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि, जनता दंगों की उस त्रासदी और उस दौर की सरकार की भूमिका को भुलाने के लिए तैयार नहीं है। इस घटनाक्रम पर सपा की तरफ से अभी तक कोई आधिकारिक और विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

सुरक्षा बल तैनात

हालांकि, स्थानीय स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं ने इन पोस्टरों को राजनीति से प्रेरित और भ्रामक करार दिया है। वहीं भाजपा से जुड़े नेताओं ने इसे जनभावनाओं की स्वाभाविक अभिव्यक्ति बताते हुए कहा है कि, दंगा पीड़ितों का दर्द आज भी उतना ही जीवंत है, जितना तेरह साल पहले था।

Muzaffarnagar riots

प्रशासन की तरफ से एहतियात के तौर पर संवेदनशील माने जाने वाले क्षेत्रों में सुरक्षा बल की तैनाती बढ़ा दी गई है और पुलिस अधिकारियों ने स्थानीय लोगों से शांति और सद्भाव बनाए रखने की अपील की है। साथ ही प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया है कि, बिना अनुमति के सार्वजनिक स्थानों पर पोस्टर लगाने वालों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

फिलहाल स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है, लेकिन इस पूरे प्रकरण ने यह साफ कर दिया है कि, मुजफ्फरनगर दंगों की स्मृतियां प्रदेश की राजनीति में आज भी एक संवेदनशील और प्रभावशाली मुद्दा बनी हुई हैं, जो हर बरसी पर नए सिरे से सतह पर उभर आती हैं।

 

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