
पृथ्वी पर लगभग 16 करोड़ वर्षों तक राज करने वाले विशालकाय सरीसृपों का एक समूह जिसे डायनासोर कहा जाता है। ये मेसोज़ोइक युग (ट्राइएसिक, जुरासिक और क्रेटेशियस काल) में रहते थे, लेकिन लगभग 6.6 करोड़ वर्ष पहले एक उल्कापिंड के गिरने से विलुप्त हो गए। कहते हैं आज के जो पक्षी हैं ये इन्हीं के वंशज हैं। डायनासोरों की सामूहिक विलुप्ति को लेकर वैज्ञानिक लंबे समय से रिसर्च कर रहे हैं और अब जाकर उन्होंने ये गुत्थी सुलझा ली है।
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धरती पर था डायनासोरों का कब्जा
दावा किया जा रहा है कि, दुनियाभर के वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने उस उल्कापिंड की पहचान कर ली है, जिसने करीब 6.6 करोड़ साल पहले धरती से टकराकर डायनासोर समेत पृथ्वी की करीब 75 प्रतिशत प्रजातियों का सफाया कर दिया था। यह खोज न केवल इस बात की पुष्टि करती है कि आखिर वह उल्कापिंड किस प्रकार का था, बल्कि इससे उस भयावह विलुप्ति के पीछे की असल वजह को समझने में भी नई रोशनी मिली है।

कहते हैं कि, इंसानों के पूर्वजों को धरती पर आए अभी कुछ लाख साल ही हुए हैं, लेकिन इससे बहुत पहले लगभग 6.6 करोड़ साल पहले, इस पृथ्वी पर खूंखार और विशालकाय डायनासोरों का कब्जा था, लेकिन अब ये विशालकाय जानवर लुप्त हो चुके हैं। माना जाता है कि, अगर उस दौर में अंतरिक्ष से धरती पर कहर न बरपा होता तो शायद आज इंसान का अस्तित्व ही न होता और अगर होता भी तो हालात बिल्कुल अलग होते।
10 किलोमीटर चौड़ा था उल्कापिंड
वैज्ञानिकों का दावा है कि, 10 किलोमीटर चौड़ा यह विशाल उल्कापिंड वर्तमान समय के मेक्सिको स्थित युकातान प्रायद्वीप से टकराया था। ये टकराव इतना जबरदस्त था कि, वहां एक विशाल चिक्सुलुब क्रेटर बन गया। इसके साथ ही इस टक्कर ने पूरी धरती को ऐसे हिलाया जैसे कोई बड़ा भूकंप आया हो।
इस उल्कापिंड के गिरने से समुद्र में विशाल सुनामी उठीं, जंगलों में भीषण आग लग गई और वातावरण में जहरीली धूल और गैसों का ऐसा गुबार फैला, जिसने पृथ्वी को पूरी तरह से ढक लिया। नतीजा ये रहा कि, कई वर्षों तक धरती को सूरज की रोशनी नहीं नसीब हुई। इसका सबसे ज्यादा असर पृथ्वी पर रहने वाले तमाम जीव जन्तुओं पर पड़ा और डायनासोर समेत धरती की करीब 75 प्रतिशत जीव-प्रजातियां हमेशा के लिए विलुप्त हो गईं।
आखिर कैसे हुई पहचान
अब तक वैज्ञानिकों को यह तो पता था कि, डायनोसोर की विलुप्ति में अंतरिक्ष में गिरे किसी उल्कापिंड की भूमिका है, लेकिन उन्हें उसकी सटीक प्रकृति और संरचना को लेकर स्पष्टता नहीं थी, जिसकी खोज वे लंबे समय से कर रहे थे। इस पहेली को सुलझाने के लिए कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया के नेतृत्व में फ्रांस, बेल्जियम और ऑस्ट्रिया के वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने गहन शोध किया।
शोधकर्ताओं ने क्रिटेशियस-पैलियोजीन काल यानी उस दौर की सीमा रेखा से जुड़ी मिट्टी की एक बेहद पतली परत का अध्ययन किया, जो यूरोप के कई स्थानों पर संरक्षित मिली थी। इस मिट्टी में मौजूद निकेल के आइसोटोप यानी समस्थानिकों का उन्नत तकनीक से विश्लेषण किया गया, जिससे उल्कापिंड की संरचना का सटीक अंदाजा लगाया जा सका।
दुर्लभ श्रेणी का था उल्कापिंड
शोध के नतीजों में सामने आया कि, पृथ्वी से टकराने वाला यह उल्कापिंड एक दुर्लभ कार्बोनेशियस सीओ कॉन्ड्राइट था, जिसे ऑर्नान्स श्रेणी का उल्कापिंड भी कहा जाता है। यह सौरमंडल के सबसे प्राचीन और सबसे कम पाए जाने वाले उल्कापिंडों में गिना जाता है। दिलचस्प बात यह है कि धरती पर अब तक मिले सभी उल्कापिंडों में कार्बोनेशियस कॉन्ड्राइट श्रेणी की हिस्सेदारी महज करीब पांच प्रतिशत ही है, और उसमें भी सीओ कॉन्ड्राइट जैसी उप-श्रेणी का हिस्सा और भी बेहद कम है।
यही वजह है कि, वैज्ञानिक इसे बेहद दुर्लभ और असामान्य उल्कापिंड मान रहे हैं। शोध में यह भी सामने आया कि, इस तरह के उल्कापिंडों में सल्फर, कार्बन, जिंक और पानी जैसे वाष्पशील तत्वों की मात्रा सामान्य उल्कापिंडों की तुलना में काफी कम होती है।
पुरानी थ्योरी को चुनौती और नये सवाल
इस नई खोज ने डायनासोर विलुप्ति से जुड़ी एक पुरानी और लंबे समय से मानी जाने वाली धारणा को भी चुनौती दी है। दशकों से यह माना जाता रहा है कि, उल्कापिंड और युकातान क्षेत्र की सल्फेट युक्त चट्टानों से निकली सल्फर डाइऑक्साइड गैस ने वातावरण में सल्फेट कणों का ऐसा आवरण बनाया, जिसने सूरज की रोशनी को धरती पर पहुंचने ही नहीं दिया, जिससे यहां भीषण ठंड पड़ने लगी और जीव-जन्तुओं के विलुप्त होने की वजह बनी।

लेकिन नए शोध के मुताबिक चूंकि इस दुर्लभ प्रकार के उल्कापिंड में सल्फर की मात्रा काफी कम पाई गई है, इसलिए वैज्ञानिकों का मानना है कि, विलुप्ति के पीछे सल्फर की बजाय बारीक सिलिकेट धूल की भूमिका ज्यादा अहम रही होगी। पहले हुए एक अन्य अध्ययन में भी पाया गया था कि, टक्कर से उठी सूक्ष्म सिलिकेट धूल वातावरण में करीब 15 साल तक बनी रह सकती थी, जिसने प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को बुरी तरह प्रभावित किया और खाद्य श्रृंखला को तहस-नहस कर दिया।
बृहस्पति ग्रह की कक्षा से आया था उल्कापिंड
शोधकर्ताओं का मानना है कि, यह कार्बोनेशियस उल्कापिंड सौरमंडल के बाहरी हिस्से में, यानी बृहस्पति ग्रह की कक्षा से भी परे बना था। इससे पहले हुए एक अन्य अध्ययन में रुथेनियम आइसोटोप के विश्लेषण से भी यही निष्कर्ष निकला था कि, यह उल्कापिंड कार्बोनेशियस प्रकार का था, न कि सिलिकेट एस्टेरॉयड या धूमकेतु से जुड़ा पदार्थ। शोध में शामिल वैज्ञानिकों में से एक ने कहा कि, डायनासोर के लिए यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण संयोग था कि, उन्हें धरती के इतिहास के सबसे दुर्लभ और सबसे दूर से आए अंतरिक्षीय पिंड ने ही खत्म कर डाला।
यह अध्ययन प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका साइंस एडवांसेज में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों के अनुसार निकेल आइसोटोप के जरिए अंतरिक्षीय पदार्थों की पहचान करने की यह तकनीक भविष्य में अन्य प्राचीन उल्कापिंडों और उनसे जुड़ी घटनाओं को समझने में भी बेहद कारगर साबित हो सकती है।
प्राचीन संरचना को समझने की दिशा मिली
हालांकि, इस उल्कापिंड का ठीक-ठीक जन्मस्थान अब भी अनिश्चित बना हुआ है, लेकिन नए आइसोटोप प्रमाणों ने इसकी प्रकृति को लेकर वैज्ञानिकों के भ्रम को काफी हद तक दूर कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि, यह खोज न केवल डायनासोर विलुप्ति की पहेली को सुलझाने में मददगार साबित होगी, बल्कि इससे धरती के भूगर्भीय इतिहास और सौरमंडल की प्राचीन संरचना को समझने में भी नई दिशा मिलेगी।
करोड़ों साल पहले धरती से टकराए उस रहस्यमयी उल्कापिंड की पहचान वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। इस खोज ने न सिर्फ यह स्पष्ट किया कि आखिर वह उल्कापिंड किस दुर्लभ श्रेणी का था, बल्कि इससे डायनासोर विलुप्ति के पीछे के असली कारणों को समझने की दिशा में भी एक बड़ा कदम आगे बढ़ा है।
वैज्ञानिकों की यह खोज इस बात की याद दिलाती है कि धरती का इतिहास कितनी अप्रत्याशित और विनाशकारी घटनाओं से होकर गुजरा है और अंतरिक्ष से आने वाला एक अकेला पिंड किस तरह पूरे ग्रह की जैविक दिशा को हमेशा के लिए बदल सकता है।
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