
इस्लामाबाद। भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि को लेकर चल रहे गतिरोध के बीच दिलचस्प घटनाक्रम सामने आया है। दरअसल, पाकिस्तान हाल के दिनों में सिंधु घाटी सभ्यता को अपनी करीब 5000 साल पुरानी विरासत के रूप में पेश कर रहा है। इसके लिए पाकिस्तान अपने यहां स्थित हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे ऐतिहासिक स्थलों का हवाला दे रहा है। जानकारों का मानना है कि, यह कदम महज एक सांस्कृतिक पहलकदमी नहीं है, बल्कि सिंधु नदी के पानी पर अपने दावे को मजबूत करने की एक कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है।
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गौरतलब है कि, पिछले साल यानी 2025 में जम्मू कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने वर्ष 1960 से चली आ रही सिंधु जल संधि को स्थगित कर दिया था। इसके बाद से पाकिस्तान इस मुद्दे को लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इसे वह समर्थन नहीं मिल रहा है, जैसे मिलना चाहिए। अब उसने सिंधु घाटी सभ्यता की विरासत पर दावा ठोंका है। ये भी उसी व्यापक रणनीति की एक कड़ी माना जा रहा है।
दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक
इतिहासकार, सिंधु घाटी सभ्यता को दुनिया की शुरुआती और सबसे महत्वपूर्ण सभ्यताओं में से एक मानते हैं। इसे भारतीय उपमहाद्वीप के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विकास की नींव माना जाता है। भारतीय पक्ष और कई इतिहासकारों का तर्क है कि, इस साझा प्राचीन विरासत पर अकेले किसी एक देश का दावा जताना उचित नहीं है। खासकर तब जब पाकिस्तान ने अपने गठन के बाद के दशकों में इस सभ्यता से जुड़े स्थलों और इतिहास को अपेक्षाकृत कम महत्व दिया था।

हालांकि, पाकिस्तान अपने भूभाग में स्थित पुरातात्विक स्थलों के आधार पर इस विरासत पर अपना दावा जायज ठहराता है, जिससे यह विषय एक ऐतिहासिक और राजनीतिक बहस का रूप ले चुका है। सिंधु सभ्यता एक बेहद सुव्यवस्थित और पूरी तरह विकसित शहरी सभ्यता थी, जिसकी नगर योजना आज भी पुरातत्वविदों को चकित करती है।
हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे शहरों से मिले पुरातात्विक साक्ष्य इस बात की पुष्टि करते हैं। इन शहरों में एक जैसा और सुनियोजित ग्रिड पैटर्न देखने को मिलता है, चाहे वह रिहायशी मकान हों, सामुदायिक सुविधाएं हों, जल प्रबंधन प्रणाली हो या फिर पक्की सड़कें।
बराबरी पर आधारित समाज की झलक
सिंधु घाटी सभ्यता की एक और खास बात यह है कि, इतनी विकसित सभ्यता होने के बावजूद यहां न तो कोई बड़ा मंदिर मिला है, न महल और न ही किसी खास वर्ग के लिए अलग से बनाए गए आलीशान मकान। यह उस दौर की अन्य प्रमुख सभ्यताओं से इसे अलग करता है, जहां आमतौर पर राजाओं और पुरोहितों के लिए भव्य इमारतें बनाई जाती थीं। इस वजह से सिंधु सभ्यता की सामाजिक संरचना, शासन व्यवस्था और धार्मिक मान्यताएं आज भी इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के लिए एक अनसुलझी पहेली बनी हुई हैं।
रेलवे लाइन बिछाते समय हुई खोज
इस सभ्यता की खोज का किस्सा भी बेहद दिलचस्प है। 19वीं सदी की शुरुआत में जब ब्रिटिश इंजीनियर इलाके में रेलवे लाइन बिछाने का काम कर रहे थे, तब उन्हें हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में पकी हुई ईंटों से बने प्राचीन खंडहर मिले। शुरुआत में इंजीनियरों ने इन ईंटों के एक जैसे आकार और मजबूती को देखकर यह मान लिया कि, ये कुछ सौ साल से ज्यादा पुरानी नहीं होंगी। उन्होंने इन ईंटों का इस्तेमाल निर्माण कार्यों में करना भी शुरू कर दिया। हालांकि, साल 1921 में जब पुरातत्वविदों ने इस ओर ध्यान दिया, तब यह सिलसिला रुका।
इसके बाद भारतीय पुरातत्वविद् दयाराम साहनी और राखालदास बनर्जी के नेतृत्व में क्रमशः 1921 और 1922 में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में खुदाई का काम शुरू हुआ। 20 सितंबर 1924 को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के तत्कालीन महानिदेशक सर जॉन मार्शल ने प्रतिष्ठित पत्रिका द इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज में तस्वीरों सहित एक विस्तृत लेख प्रकाशित किया, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान इस सभ्यता की ओर आकर्षित किया।
मिस्र और मेसोपोटामिया से भी बड़ी सभ्यता
आगे के शोध में पुरातत्वविदों ने पाया कि, यह सभ्यता करीब 3000 वर्ष ईसा पूर्व की है, यानी वर्तमान समय से लगभग 5000 साल पुरानी। बाद में हुई खुदाइयों में मौजूदा पाकिस्तान से लेकर उत्तर भारत के बड़े हिस्से तक इस सभ्यता से जुड़े कई केंद्र खोजे गए। आकार और फैलाव के लिहाज से यह सभ्यता अपने समय की अन्य प्रसिद्ध सभ्यताओं मिस्र और मेसोपोटामिया से भी बड़ी मानी जाती है। इसके साथ ही यह सबसे रहस्यमयी सभ्यताओं में भी शुमार होती है, क्योंकि इसकी लिपि को आज तक कोई भी पूरी तरह नहीं पढ़ पाया है।
आधुनिक ड्रेनेज सिस्टम जैसी व्यवस्था
सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे उल्लेखनीय विशेषता इसकी नगर योजना थी। शहरों को बेहद व्यवस्थित तरीके से बसाया गया था, जहां सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं और इलाकों को नियमित आकार के ब्लॉकों में बांटती थीं। ये ब्लॉक आमतौर पर एक जैसे आकार के होते थे और दो प्रमुख टीलों पर बसाए गए थे। शहरों में पानी की व्यवस्था बेहद उन्नत थी। यहां विशाल सार्वजनिक स्नानागार भी मिले हैं।

घरों की बनावट भी बेहद सोच-समझकर की गई थी। घर गलियों की ओर खुलते थे, जबकि उनकी पिछली दीवारें मुख्य सड़क से सटी होती थीं। कई घरों में स्नानघर बने हुए थे, जहां से पानी की निकासी पिछली दीवारों के जरिए होती थी। यह पानी ढके हुए पाइपों के माध्यम से मुख्य सड़कों के नीचे बनी बड़ी नालियों में जाकर मिलता था। एक ऐसी व्यवस्था जो आज के आधुनिक ड्रेनेज सिस्टम की याद दिलाती है।
आजादी के बाद बदला नजरिया
सिंधु घाटी सभ्यता के प्राचीन स्थलों पर खुदाई का काम दशकों से चल रहा है और आज भी जारी है, लेकिन 1947 में पाकिस्तान के गठन के बाद उसके हिस्से में आए इस सभ्यता के शहरों को लंबे समय तक अपेक्षाकृत कम प्राथमिकता मिली। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि, उस दौर में पाकिस्तान की शिक्षा नीति में एक अलग वैचारिक दृष्टिकोण अपनाया गया, जिसके तहत भारत से अलगाव को रेखांकित करने वाले पहलुओं पर अधिक जोर दिया गया।
ऐसे में सिंधु घाटी जैसी साझा प्राचीन विरासत को उस दौर की शैक्षणिक और वैचारिक प्राथमिकताओं में उतनी जगह नहीं मिल पाई। यही वजह है कि पाकिस्तान की ओर से अब इस सभ्यता पर दावा किए जाने को लेकर इतिहासकारों और विश्लेषकों के बीच अलग-अलग राय देखने को मिल रही है।
साझा विरासत
कुल मिलाकर सिंधु घाटी सभ्यता एक ऐसी साझा प्राचीन विरासत है, जिसके भौगोलिक अवशेष आज भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में फैले हुए हैं। यह सभ्यता जितनी ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, उतनी ही आज के दौर में एक कूटनीतिक और राजनीतिक विषय भी बन गई है, खासकर सिंधु जल संधि से जुड़े मौजूदा तनाव के संदर्भ में। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस साझा विरासत को लेकर दोनों देशों का रुख किस दिशा में आगे बढ़ता है।
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