सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान को नहीं मिला कनाडा का साथ, संयुक्त बयान में IWT और कश्मीर का जिक्र तक नहीं

  • इस्लामाबाद में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में डार ने उठाया मुद्दा, लेकिन खामोश रहा कनाडा

इस्लामाबाद। पहलगाम हमले के बाद निलंबित हुए सिंधु जल संधि की वजह से पाकिस्तान को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। यही वजह है कि, वह जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे को उठाता रहता है और समर्थन जुटाने की कोशिश करता है। एक बार फिर से उनसे यही कोशिश की लेकिन उसके हाथ सिर्फ मायूसी ही लगी। इस बार कनाडा ने उसे झटका दिया है। सोमवार को इस्लामाबाद में पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री इशाक डार और कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद के बीच हुई साझा प्रेस ब्रीफिंग के दौरान यह पूरा मामला सामने आया।

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डार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में क्या कहा

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इशाक डार ने सिंधु जल संधि और कश्मीर, दोनों ही संवेदनशील मुद्दों को उठाने का प्रयास किया। उनका कहना था कि, भारत की तरफ से इस संधि को रोके जाने के फैसले ने क्षेत्र की पहले से ही नाजुक सुरक्षा स्थिति को और उलझा दिया है। डार का कहना है कि, यह कदम केवल कूटनीतिक मामला नहीं है बल्कि दक्षिण एशिया की स्थिरता से जुड़ा बेहद गंभीर विषय है।

Pakistan Indus Water Treaty B

डार ने आगे कहा कि, पाकिस्तान चाहता है कि, कनाडा सहित उसके तमाम मित्र देश इस मुद्दे पर उसका साथ दें और भारत पर संधि का पालन करने का दबाव बनाएं, ताकि भारत सिंधु जल संधि को दोबारा बहाल करने पर मजबूर हो जाए। उन्होंने भारत पर आरोप लगाया कि, पानी को इस तरह रोकना उसे हथियार की तरह इस्तेमाल करने जैसा है, जो अंतरराष्ट्रीय कानूनों और संधियों का उल्लंघन है। डार ने यह भी अपील की कि, भारत को अंतरराष्ट्रीय रीति-रिवाजों और तय शर्तों का पालन करना चाहिए। हालांकि, कानाडा ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

पाकिस्तान की कूटनीतिक हार

प्रेस ब्रीफिंग के बाद जब कनाडा और पाकिस्तान की तरफ से संयुक्त बयान जारी किया गया तो उसमें सिंधु जल संधि और कश्मीर,  दोनों ही मुद्दों का कोई जिक्र नहीं था। हालांकि डार को इस मंच से काफी उम्मीद थी, कि कनाडा उसकी बात का समर्थन करेगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं था। कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद ने भी अपनी तरफ से इन विषयों पर कोई सीधी प्रतिक्रिया नहीं दी। कनाडा की इस चुप्पी को पाकिस्तान की एक बड़ी कूटनीतिक हार के रूप में देखा जा रहा है।

राजनयिक हलकों में इसे इस बात के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है कि, कनाडा फिलहाल भारत-पाकिस्तान के बीच के इस संवेदनशील मसले में सीधे तौर पर उलझने से बच रहा है।

क्या है सिंधु जल संधि

यहां सवाल ये है कि, सिंधु जल संधि है क्या और इसे लेकर पाकिस्तान इतना क्यों परेशान है कि वह जब तब इसे इंटर नेशनल स्तर अपर उठाता रहता है। दरअसल, साल 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में यह ऐतिहासिक समझौता हुआ था, जिसके तहत सिंधु नदी बेसिन की छह प्रमुख नदियों के पानी का बंटवारा किया गया था। इस संधि के तहत तीन पूर्वी नदियों- रावी, ब्यास और सतलुज- का पानी भारत को दिया गया, जबकि तीन पश्चिमी नदियों- सिंधु, झेलम और चिनाब का पानी पाकिस्तान को दिया जाना तय हुआ था।

बढ़ीं पाकिस्तान की मुश्किलें

दशकों तक यह संधि दोनों देशों के बीच तमाम तनावों और यहां तक कि युद्धों के बावजूद कायम रही। इसे दक्षिण एशिया के जल कूटनीति के मामले में एक मिसाल के तौर पर देखा जाता रहा, लेकिन पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने इस संधि को स्थगित करने का बड़ा फैसला ले लिया। इससे पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ गईं, क्योंकि इन्हीं तीनों नदियों के पानी  से वहां की खेती और आम जनजीवन का जीवनयापन होता था।

Pakistan Indus Water Treaty B

इस पूरे मसले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रुख बेहद स्पष्ट रहा है। पिछले साल उन्होंने एक बयान में साफ कहा था कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते। उनका आशय यह था कि, जब तक पाकिस्तान की जमीन से आतंकवाद को शह मिलती रहेगी, तब तक भारत की तरफ से किसी भी तरह की नरमी की उम्मीद नहीं रखी जानी चाहिए। मोदी ने इस बात पर जोर दिया था कि, जब तक इस्लामाबाद अपनी सरजमीं पर सक्रिय आतंकी संगठनों के खिलाफ ठोस और भरोसेमंद कार्रवाई नहीं करता, तब तक संधि निलंबित ही रहेगी।

 पानी को हथियार बनाने का आरोप

यह पहला मौका नहीं है जब पाकिस्तान की तरफ से भारत पर पानी को हथियार बनाने का आरोप लगाया गया हो। इससे पहले पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो-जरदारी भी इस मुद्दे पर खुलकर बोल चुके हैं। उन्होंने भारत को चेतावनी देते हुए कहा था कि, सिंधु जल संधि को लेकर लिए गए फैसलों के गंभीर नतीजे हो सकते हैं। भुट्टो ने सिंधु नदी को पाकिस्तान की जीवन रेखा करार दिया था और कहा था कि नदी किनारे बसे लोग सम्मान के साथ शांति चाहते हैं, न कि किसी तरह का आत्मसमर्पण।

भारत का रुख साफ़

इस पूरे विवाद पर नई दिल्ली का रुख शुरू से ही एकदम स्पष्ट रहा है। भारत सरकार ने एक बार फिर दोहराया है कि जब तक पाकिस्तान की तरफ से सीमा-पार आतंकवाद को समर्थन मिलना बंद नहीं होता, तब तक सिंधु जल संधि को बहाल करने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। भारत का कहना है कि, यह फैसला सुरक्षा से जुड़ी गंभीर चिंताओं को ध्यान में रखते हुए लिया गया है, न कि किसी तरह की मनमानी के तहत।

फिलहाल स्थिति यह है कि पाकिस्तान भले ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बार-बार इस मुद्दे को उठाने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन उसे अब तक किसी बड़े देश का ठोस समर्थन नहीं मिला है। कनाडा जैसे देश ने भी उसका साथ नहीं दिया,  जो इस बात का संकेत है कि दुनिया भारत-पाकिस्तान के इस पुराने और जटिल मसले में सीधे हस्तक्षेप करने से फिलहाल बचना चाहती है।

 

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