
लखनऊ। UP Weather Update: बीते कुछ दिनों से देश के विभिन्न इलाकों में मौसम का मिजाज अचानक बदलने लगा है। सुबह की चिलचिलाती धूप दोपहर होते-होते घने बादलों में बदल जा रही है, शाम को तेज हवाएं चलने लगती हैं और रात में उमस बढ़ जा रही है, जिससे लोगों की मुश्किल बढ़ती जा रही है। ये सारे बदलाव किसी बड़े मौसमी परिवर्तन का संकेत दे रहे हैं। जी हां, दक्षिण-पश्चिम मानसून अब उत्तर भारत की ओर तेजी से बढ़ रहा है। खासकर उत्तर प्रदेश समेत उत्तर भारत के कई राज्यों में प्री-मानसून गतिविधियां जोर पकड़ चुकी हैं।
इसे भी पढ़ें- यूपी में बेमौसम बारिश-ओलावृष्टि ने मचाया कोहराम, फसलें नष्ट, रो पड़े किसान
जून-जुलाई में ही क्यों आता है मानसून
मौसम विभाग ने प्रदेश के 45 से अधिक जिलों में भारी बारिश, गरज-चमक और 70 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार वाली तेज हवाओं का अलर्ट जारी किया है। हर साल की तरह इस बार भी आम लोग, किसान और प्रशासन मानसून का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

गर्मी की तपिश से त्रस्त शहरों के निवासी राहत की आस लगाए बैठे हैं, जबकि किसान खेतों में बुवाई की तैयारी में जुटे हुए हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि, मानसून हर साल जून-जुलाई में ही क्यों आता है? इसके आने से पहले कौन-कौन से संकेत मिलते हैं? और इस बार उत्तर प्रदेश में मानसून कब दस्तक देगा? आज हम आपको इस बारे में विस्तार से बताएंगे।
दक्षिणी और पूर्वोत्तर राज्यों ने एक्टिव हुआ मानसून
वर्तमान समय में दक्षिण-पश्चिम मानसून देश के दक्षिणी और पूर्वोत्तर हिस्सों में पूरी तरह सक्रिय हो चुका है। केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के कई इलाकों में मध्यम से भारी बारिश दर्ज की जा रही है। इस बार मानसून ने समय पर अच्छी शुरुआत की है, जिससे दक्षिण भारत के किसानों में खुशी की लहर दौड़ गई है। पूर्वोत्तर भारत की बात करें तो असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मणिपुर में लगातार बारिश का सिलसिला जारी है। इन राज्यों में कभी-कभी भारी बारिश के कारण नदियां उफान पर हैं और कुछ इलाकों में बाढ़ जैसे हालात भी बन रहे हैं।
बिहार, पश्चिम बंगाल और झारखंड में भी मानसूनी गतिविधियां बढ़ रही हैं। हल्की-मध्यम बारिश के साथ गरज-चमक की घटनाएं आम हो गई हैं। उत्तर भारत में हालांकि मानसून अभी पूरी तरह नहीं पहुंचा है, लेकिन प्री-मानसून गतिविधियां तेज हो गई हैं। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब और हरियाणा में बादलों की आवाजाही, तेज हवाएं और छिटपुट बारिश देखने को मिल रही है। इन गतिविधियों से दिन का तापमान थोड़ा कम हुआ है, लेकिन बढ़ती उमस ने लोगों की परेशानी बढ़ा दी है।
मानसून की तीव्रता बढ़ाती हैं ये घटनाएं
मानसून का आगमन कोई संयोग नहीं, बल्कि पृथ्वी की भूगर्भीय और वायुमंडलीय प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक परिणाम है। अप्रैल-मई के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप तेजी से गर्म होता है। भूमि समुद्र की तुलना में अधिक तेजी से गर्म होती है। परिणामस्वरूप भारत के ऊपर निम्न दबाव का क्षेत्र बन जाता है। वहीं, हिंद महासागर के ऊपर अपेक्षाकृत उच्च दबाव बना रहता है। यह दबाव का अंतर समुद्र से नमी युक्त हवाओं को भारतीय भूमि की ओर खींचता है। जून के महीने तक यह प्रक्रिया चरम पर पहुंच जाती है।

सूर्य की किरणें कर्क रेखा के करीब पहुंचने से उत्तर भारत में तापमान और बढ़ जाता है, जो मानसून के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करता है। इसके अलावा, जेट स्ट्रीम, समुद्री तापमान और अल नीनो जैसी वैश्विक घटनाएं भी मानसून की तीव्रता और समय पर असर डालती हैं। सामान्यतः दक्षिण-पश्चिम मानसून केरल में 1 जून के आसपास पहुंचता है और फिर पूरे देश में फैलता है।
मानसून आने से पहले के प्रमुख संकेत
मौसम वैज्ञानिक मानसून की प्रगति का आकलन कई संकेतों के आधार पर करते हैं। आम लोगों को भी ये बदलाव साफ दिखाई देने लगते हैं।
उमस में वृद्धि
हवा में नमी का स्तर बढ़ने से वातावरण चिपचिपा हो जाता है। पसीना अधिक आने लगता है और रात में नींद में दिक्कत होती है।
हवा की दिशा में परिवर्तन: पहले चलने वाली गर्म और शुष्क पछुआ हवाओं की जगह नमी भरी दक्षिण-पश्चिमी हवाएं लेने लगती हैं।
घने बादल
आकाश में बड़े-बड़े काले बादल छाने लगते हैं। दोपहर और शाम को गरज-चमक के साथ बौछारें पड़ने लगती हैं।
प्री-मानसून वर्षा
धूल भरी आंधियां, हल्की बारिश और बिजली चमकने की घटनाएं बढ़ जाती हैं। ये बारिश गर्मी को कुछ कम करती है।
तापमान में गिरावट
लू का प्रकोप घटने लगता है और दिन-रात का तापमान अंतर कम हो जाता है।
प्राकृतिक संकेत
गांवों में चींटियों का बढ़ा हुआ आना-जाना, मेंढकों की आवाजें, पक्षियों का विशेष व्यवहार और कुछ पौधों में फूल आने जैसे संकेत भी किसान मानसून का पूर्वानुमान लगाने के लिए इस्तेमाल करते हैं।
तैयारियां
भारतीय अर्थव्यवस्था और कृषि के लिए मानसून जीवन रेखा है। देश की लगभग 50-60 प्रतिशत कृषि वर्षा पर निर्भर है। खरीफ फसलों जैसे धान, मक्का, बाजरा, सोयाबीन, कपास और अरहर की बुवाई मानसून पर निर्भर करती है। किसान खेतों की जुताई, बीजों की व्यवस्था और खाद-कीटनाशक जुटाने में जुटे रहते हैं।
शहरों में नगर निगम नालों की सफाई, ड्रेनेज सिस्टम की मरम्मत और जल भराव वाले क्षेत्रों की पहचान करते हैं। आपदा प्रबंधन विभाग, एनडीआरएफ और स्थानीय प्रशासन अलर्ट मोड पर आ जाते हैं। बाढ़, भूस्खलन और बिजली गिरने जैसे खतरों से निपटने के लिए पूर्व तैयारी की जाती है। मौसम विभाग सैटेलाइट इमेजरी, रडार, डेटा और कंप्यूटर मॉडल के आधार पर निरंतर निगरानी रखता है।
उत्तर प्रदेश में इस डेट को आएगा मानसून
मौसम विज्ञानियों का कहना है कि, उत्तर प्रदेश में मानसून सामान्यतः 20 से 25 जून के बीच प्रवेश करता है। सबसे पहले पूर्वी उत्तर प्रदेश यानी पूर्वांचल के जिलों जैसे गोरखपुर, वाराणसी, प्रयागराज आदि मे दस्तक देता है, फिर धीरे-धीरे मध्य और पश्चिमी भागों – लखनऊ, कानपुर, आगरा, मेरठ आदि की ओर बढ़ता है।

इस बार प्री-मानसून गतिविधियां मजबूत दिख रही हैं। अगर यही अनुकूल परिस्थितियां बनी रहीं तो जून के अंतिम सप्ताह तक प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में मानसून पहुंच सकता है। हालांकि, मौसम की गतिशीलता के कारण कुछ दिनों का अंतर संभव है। मौसम विभाग ने कई जिलों में 60-70 किमी/घंटा की तेज हवाओं और भारी बारिश का येलो/ऑरेंज अलर्ट जारी किया है।
जून के आखिरी हफ्ते में होगी अच्छी बारिश
मानसून 2026 अब अंतिम चरण में है। दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत में यह पूरी तरह सक्रिय है, जबकि उत्तर भारत में प्री-मानसून की तेज गतिविधियां मानसून के शीघ्र आगमन का संकेत दे रही हैं। बढ़ती उमस, बदलती हवाएं, घने बादल और बारिश के अलर्ट सब कुछ बता रहे हैं कि राहत अब दूर नहीं है। उत्तर प्रदेश के लोगों, किसानों और प्रशासन की निगाहें आसमान पर टिकी हुई हैं। अगर सब कुछ अनुकूल रहा तो जून के आखिरी हफ्ते में प्रदेश भर में अच्छी बारिश शुरू हो सकती है।
इसे भी पढ़ें- UP Weather Update: कल यूपी में होगी झमाझम बारिश, ओलावृष्टि के भी आसार



