
नई दिल्ली। भारत ने समुद्र की गहराइयों में दुश्मनों के लिए अभेद्य किला खड़ा कर लिया है। भारतीय नौसेना की पनडुब्बी शक्ति अब इतनी मजबूत हो चुकी है कि अरब सागर से लेकर हिंद महासागर तक पाकिस्तान और चीन जैसी चुनौतियों का मुकाबला करने में सक्षम है। न्यूक्लियर पॉवर्ड बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों (SSBN) से लेकर उन्नत डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक पनडुब्बियों तक भारत ने दोनों तटों पर इनका मजबूत जाल बिछा रखा है। यह रणनीतिक ताकत न केवल समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करती है, बल्कि भारत की परमाणु त्रयी (nuclear triad) के समुद्री हिस्से को मजबूती प्रदान करती है।
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बैलिस्टिक मिसाइलों से लैस है आईएनएस अरिदमन
रिपोर्ट्स के अनुसार, भारतीय नौसेना की पनडुब्बी क्षमता में तेजी से वृद्धि हो रही है। वर्तमान में भारतीय नौसेना के पास लगभग 17-18 डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक पनडुब्बियां (SSK) सक्रिय हैं, जिनमें स्कॉर्पीन (कलवरी) क्लास, किलो क्लास और हॉटवुड (जर्मन मूल की HDW) क्लास शामिल हैं। इनके अलावा, दो परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां (SSBN) आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात सेवा में हैं।

तीसरी एसएसबीएन आईएनएस अरिदमन (एस-4) अप्रैल-मई 2026 तक सेवा में शामिल होने की उम्मीद है, जो समुद्री परीक्षणों के अंतिम चरण में है। आईएनएस अरिदमन के शामिल होने से भारत के पास सामरिक बल कमान (SFC) के अधीन तीन परिचालन एसएसबीएन होंगी, जो परमाणु निरोधक क्षमता को अभूतपूर्व मजबूती देंगी। अरिहंत क्लास की ये पनडुब्बियां स्वदेशी रूप से विकसित हैं और विभिन्न बैलिस्टिक मिसाइलों से लैस हैं।
दो तटों पर तैनात हैं पनडुब्बियां
आईएनएस अरिहंत (2016 में कमीशन) मुख्य रूप से K-15 सागरिका मिसाइल (700 किमी रेंज) से लैस है, जबकि आईएनएस अरिघात (2024 में कमीशन) और आगामी अरिदमन K-4 मिसाइल (3,500 किमी रेंज) को ले जा सकती हैं, जो भारत की दूसरी स्ट्राइक क्षमता को बढ़ाती हैं। भारतीय नौसेना की पनडुब्बियां मुख्य रूप से दो तटों पर तैनात हैं।
पश्चिमी तट पर मुंबई के पास और कारवार (INS कदंबा) बेस पर, जबकि पूर्वी तट पर विशाखापत्तनम के पास। हाल के वर्षों में दो प्रमुख पनडुब्बी अड्डों का विकास किया गया है। पहला, कारवार (प्रोजेक्ट सीबर्ड) जो मुंबई से 500 किमी दक्षिण में है और अब 50 युद्धपोतों तथा पनडुब्बियों को संभाल सकता है। दूसरा, आईएनएस वर्षा (प्रोजेक्ट वर्षा) रामबिल्ली (आंध्र प्रदेश) में, जो विशाखापत्तनम से 50 किमी दक्षिण में स्थित है। यह गुप्त अड्डा भूमिगत ठिकानों से लैस है और विशेष रूप से परमाणु पनडुब्बियों के लिए डिजाइन किया गया है।
भारत रूस से लीज पर लेता है पनडुब्बी
यह चीन की बढ़ती उपस्थिति के जवाब में बनाया गया है और 2026 तक पूरी तरह कमीशन होने की उम्मीद है। स्वदेशी परमाणु हमलावर पनडुब्बियों (SSN) के विकास में भी तेजी आई है। फरवरी 2015 में कैबिनेट ने 6 न्यूक्लियर पॉवर्ड अटैक सबमरींस (प्रोजेक्ट 77) को मंजूरी दी थी, जो विशाखापत्तनम के शिप बिल्डिंग सेंटर में बन रही हैं। हालांकि, स्वदेशी एसएसएन की पहली पनडुब्बी 2036 तक सेवा में आने की संभावना है, क्योंकि 200 MWe रिएक्टर का विकास चल रहा है। फिलहाल, भारत रूस से अकुला क्लास की पनडुब्बी लीज पर लेता रहा है।
आईएनएस चक्र-II 2021 तक सेवा में थी, और चक्र-III (2019 समझौते के तहत) अब 2028 तक मिलने की उम्मीद है, क्योंकि देरी हो रही है। डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों में कलवरी क्लास (स्कॉर्पीन) सबसे आधुनिक हैं। छह कलवरी क्लास पनडुब्बियां सेवा में हैं, जिनमें आईएनएस वागशीर 2025 में शामिल हुई। इनमें जल्द ही स्वदेशी एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (एआईपी) सिस्टम लगाया जाएगा, जो डीआरडीओ की एनएमआरएल द्वारा विकसित है। आईएनएस खंडेरी पर यह सिस्टम दिसंबर 2026 से पहले एकीकृत हो जाएगा, जिससे जलमग्न रहने की क्षमता बढ़ेगी।
भारतीय सेना के पास 140-150 युद्धपोत हैं
फरवरी 2025 में भारत ने जर्मनी की थिसेनक्रुप के साथ 6 नई डीजल पनडुब्बियों (प्रोजेक्ट 75आई) के लिए करार किया, जिनमें एआईपी होगी। ये भारत में असेंबल होंगी और पाकिस्तान-चीन की चुनौतियों का जवाब देंगी। पाकिस्तान को चीन से 8 युआन/हांगोर क्लास एआईपी पनडुब्बियां मिल रही हैं, जो उसकी क्षमता बढ़ा रही हैं। भारतीय नौसेना के पास कुल लगभग 140-150 युद्धपोत हैं, जिनमें 17 डीजल पनडुब्बियां और दो एसएसबीएन शामिल हैं। 2025 में 10-12 युद्धपोत और एक पनडुब्बी कमीशन हुईं। 2026 में रिकॉर्ड 19 युद्धपोत कमीशन होने की योजना है, जिससे फ्लीट 200+ तक पहुंच सकती है।
2037 तक 230 युद्धपोतों का लक्ष्य है। चीन की नौसेना दुनिया की सबसे बड़ी (370+ युद्धपोत) है और हिंद महासागर में जिबूती, ग्वादर, कराची आदि ठिकानों से उपस्थिति बढ़ा रही है। भारत की रणनीति स्वदेशीकरण, साझेदारी और बेस विकास पर केंद्रित है। डीआरडीओ, परमाणु ऊर्जा विभाग और नौसेना मिलकर काम कर रहे हैं। यह पनडुब्बी ताकत भारत को क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने में सक्षम बनाती है। दुश्मन अब आसानी से छू भी नहीं पाएंगे, क्योंकि समंदर की गहराइयों में भारत का किला अभेद्य है।
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