
आधुनिक डिजिटल युग में मोबाइल फोन, लैपटॉप और कंप्यूटर हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का एक ऐसा अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं जिनके बिना एक पल भी गुजारना मुश्किल लगता है। सुबह आंख खुलते ही सबसे पहले स्मार्टफोन की स्क्रीन पर नजर डालना, दिनभर दफ्तर में घंटों कंप्यूटर के सामने बैठकर काम करना और रात में सोने से पहले सोशल मीडिया पर रील्स स्क्रॉल करना आज की जीवनशैली का मुख्य हिस्सा बन गया है।
इसे भी पढ़ें- हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ाता है अर्ली मेनोपॉज, रिपोर्ट में हुआ चौंकाने वाला खुलासा
लेकिन, तकनीक के इस बढ़ते इस्तेमाल ने स्वास्थ्य को लेकर कई नई चिंताएं भी पैदा कर दी हैं। अक्सर मन में यह सवाल उठता है कि क्या लंबे समय तक मोबाइल या लैपटॉप की स्क्रीन देखने से सीधे तौर पर ‘स्ट्रोक’ जैसी गंभीर बीमारी हो सकती है? इस बारे में देश के जाने-माने न्यूरोलॉजिस्ट और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की क्या राय है आइये जानते हैं।
शारीरिक निष्क्रियता से खतरा
दिल्ली स्थित सीके बिरला अस्पताल के न्यूरोसाइंस विभाग के निदेशक डॉ. के.के. जिंदल के अनुसार, स्क्रीन के सामने बैठना या मोबाइल-लैपटॉप का इस्तेमाल करना अपने आप में सीधे तौर पर स्ट्रोक का कारण नहीं बनता है। यानी सिर्फ स्क्रीन देखने से दिमाग की नसें ब्लॉक नहीं होतीं।

असली चिंता की बात स्क्रीन का इस्तेमाल नहीं, बल्कि उसके साथ जुडी शारीरिक निष्क्रियता है, जब कोई व्यक्ति घंटों एक ही जगह पर बिना हिले-डुले कुर्सी या बिस्तर पर बैठा रहता है, तो उसका मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ जाता है। स्ट्रोक तब होता है जब दिमाग के किसी हिस्से में खून की सप्लाई अचानक रुक जाती है। ऐसा आमतौर पर किसी रक्त वाहिका में ब्लॉकेज या दिमाग की नस फटने से होता है। ऑक्सीजन और खून की कमी से दिमाग की कोशिकाएं तेजी से मरने लगती हैं, इसलिए स्ट्रोक के मरीजों के लिए तुरंत इलाज अहम हो जाता है।
घंटों बैठना बढ़ाता है जोखिम
अमेरिकन स्ट्रोक एसोसिएशन की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘स्ट्रोक’ में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, 60 वर्ष या उससे कम उम्र के ऐसे वयस्क जो दिनभर में कम से कम 8 घंटे या उससे अधिक समय केवल बैठने वाली गतिविधियों में बिताते हैं, उनमें सक्रिय लोगों की तुलना में स्ट्रोक का खतरा काफी अधिक पाया गया।
हालांकि, यह शोध स्क्रीन टाइम और स्ट्रोक के बीच सीधे कारण-परिणाम को साबित नहीं करता, लेकिन यह इस बात की ओर स्पष्ट इशारा जरूर करता है कि लंबे समय तक लगातार बैठे रहना शरीर के लिए एक बड़ा खतरा है। बिना शारीरिक गतिविधि के लंबे समय तक बैठे रहने से वजन तेजी से बढ़ना, हाई ब्लड प्रेशर, टाइप-2 डायबिटीज, खराब कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याएं जन्म लेती हैं। ये सभी कारक सीधे तौर पर स्ट्रोक के सबसे बड़े जोखिम माने जाते हैं।
लेट नाइट मोबाइल देखना
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल स्क्रीन पर बिताए जाने वाले घंटों को देखकर किसी के स्ट्रोक के खतरे का सही अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। उदाहरण के लिए, मान लीजिए कोई सॉफ्टवेयर इंजीनियर पूरे दिन कंप्यूटर पर कोडिंग का काम करता है, लेकिन वह हर दिन नियमित रूप से व्यायाम, जिम या वॉक करता है। वहीं दूसरी ओर एक ऐसा व्यक्ति है जो उतने ही घंटे स्क्रीन के सामने बिना किसी शारीरिक गतिविधि के सुस्त बैठा रहता है। दोनों का स्ट्रोक का जोखिम जमीन-आसमान जितना अलग होगा।
इसके अलावा, देर रात तक मोबाइल या लैपटॉप की नीली रोशनी के संपर्क में रहने से हमारी नींद की गुणवत्ता गंभीर रूप से प्रभावित होती है। खराब या अपर्याप्त नींद ब्लड प्रेशर और मेटाबॉलिक हेल्थ को कंट्रोल से बाहर कर सकती है, जो अप्रत्यक्ष रूप से स्ट्रोक के खतरे को बढ़ाती है।
जीवनशैली का असर
एक आम धारणा यह है कि, स्ट्रोक केवल बुजुर्गों की बीमारी है, लेकिन डॉक्टर इस मिथक को सिरे से खारिज करते हैं। हालांकि उम्र बढ़ने के साथ स्ट्रोक की आशंका बढ़ती है, लेकिन आजकल खराब खानपान, तनाव, धूम्रपान और निष्क्रिय जीवनशैली के चलते कम उम्र के युवाओं में भी स्ट्रोक के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। यदि किसी युवा में पहले से कोई मेडिकल कंडीशन या फैमिली हिस्ट्री मौजूद है, तो उसे अपनी सेहत को लेकर बेहद सतर्क रहने की जरूरत है।
हाई-रिस्क वाले लोग इन बातों का रखें विशेष ध्यान
जिन लोगों को पहले से स्वास्थ्य से जुड़ी कुछ खास समस्याएं हैं, उन्हें अपनी सेहत के प्रति किसी भी तरह की लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। इन श्रेणियों में शामिल लोगों को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है।

हाई ब्लड प्रेशर के मरीज, डायबिटीज और बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल से पीड़ित व्यक्ति, मोटापे के शिकार लोग और जिन्हें पहले कभी मिनी-स्ट्रोक (TIA) आ चुका हो उन्हें ज्यादा सावधान रहने की जरूरत होती है।
डॉक्टरों के मुताबिक, हाई ब्लड प्रेशर स्ट्रोक का सबसे प्रमुख और नियंत्रित किया जा सकने वाला जोखिम कारक है। नियमित रूप से ब्लड प्रेशर की जांच कराना, डॉक्टर के बताए अनुसार दवाएं लेना और खानपान में परहेज करना इस खतरे को काफी हद तक कम कर सकता है।
अपनाएं ये उपाय
आज के दौर में नौकरी या पढ़ाई के चलते स्क्रीन का इस्तेमाल पूरी तरह बंद करना किसी के भी लिए व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। ऐसे में स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह है कि अपनी जीवनशैली में कुछ छोटे लेकिन प्रभावी बदलाव लाकर इस खतरे को टाला जा सकता है।
ब्रेक लें: लगातार कई घंटों तक एक ही जगह पर न बैठें। हर 45 से 50 मिनट के बाद अपनी सीट से उठकर थोड़ा टहल लें।
शारीरिक सक्रियता बढ़ाएं: वयस्कों को हफ्ते में कम से कम 150 मिनट मध्यम स्तर की शारीरिक गतिविधि (जैसे तेज चलना, जॉगिंग या योग) जरूर करनी चाहिए।
खानपान सुधारें: जंक फूड से तौबा करें और डाइट में हरी सब्जियां, फल और पर्याप्त पानी को शामिल करें।
तंबाकू और शराब से दूरी: धूम्रपान और अत्यधिक मदिरापान रक्त वाहिकाओं को कमजोर करते हैं, इनसे दूर रहें।
भरपूर नींद लें: रात में कम से कम 7-8 घंटे की गहरी और गुणवत्तापूर्ण नींद लें।
स्ट्रोक के इन शुरुआती लक्षणों को न करें नजरअंदाज
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केवल स्क्रीन टाइम कम कर देने भर से स्ट्रोक को पूरी तरह नहीं रोका जा सकता। इसके लिए अंतर्निहित बीमारियों (जैसे शुगर और बीपी) को कंट्रोल में रखना बेहद जरूरी है। साथ ही, स्ट्रोक के शुरुआती लक्षणों को पहचानना हर व्यक्ति के लिए जीवन रक्षक साबित हो सकता है।
यदि किसी व्यक्ति में नीचे दिए गए लक्षण अचानक दिखाई दें, तो एक सेकंड की भी देरी किए बिना तुरंत नजदीकी अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में संपर्क करना चाहिए
- चेहरे का अचानक एक तरफ से टेढ़ा हो जाना या झुक जाना।
- शरीर के एक हिस्से (हाथ या पैर) में अचानक कमजोरी या सुन्नपन महसूस होना।
- बोलने में अचानक लड़खड़ाना या शब्दों को समझने में परेशानी होना।
- अचानक एक या दोनों आंखों से देखने में कठिनाई होना।
- बिना किसी स्पष्ट कारण के अचानक बहुत तेज सिरदर्द होना या चक्कर आना, जिससे शरीर का संतुलन बिगड़ जाए।
इसे भी पढ़ें- रात भर जागने की आदत बढ़ा रही मिनी स्ट्रोक का खतरा, एक्सपर्ट ने दी चेतावनी



