
लखीमपुर खीरी। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करने वाली एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। सदर कोतवाली के मालखाने से एक करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के आभूषण गायब हो गए हैं। पुलिस विभाग के अधिकारियों का कहना है कि आभूषण बन्दर उठा ले गये। इस दावे ने न केवल स्थानीय स्तर पर हंगामा मचा रखा है, बल्कि पूरे मामले में न्यायिक हस्तक्षेप भी हो गया है। कोर्ट ने अब इस पूरे प्रकरण पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
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गुमराह करने वाला जवाब
वहीं पीड़ित पक्ष और उनके वकील इस पुलिसिया जवाब को गुमराह करने वाला और हास्यास्पद मान रहे हैं। 2007 में सदर कोतवाली क्षेत्र के रहने वाले मुदित अग्रवाल की पत्नी आभा अग्रवाल ने आत्महत्या कर ली थी। उस समय उनके शरीर पर मौजूद आभूषणों को घटनास्थल पर मौजूद सिपाहियों को सौंप दिया गया था। इन आभूषणों को बाद में सदर कोतवाली के मालखाने में जमा कर दिया गया।

ये आभूषण दहेज संबंधी विवाद से जुड़े मामले का हिस्सा थे, जिसमें आभा अग्रवाल पर दहेज की वजह से प्रताड़ना का आरोप था। बाद में इस मामले में सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया, लेकिन आभूषणों की वापसी अब एक नया विवाद बनकर उभरा है। मुदित अग्रवाल और उनके वकील शैलेंद्र सिंह गौड़ ने इस पूरे मामले पर गहरी हैरानी जताई है।
2007 में जमा किए गए थे गहने
उनके अनुसार, ये आभूषण केस प्रॉपर्टी थे और पुलिस की जिम्मेदारी थी इन्हें सुरक्षित रखना। वकील शैलेंद्र सिंह गौड़ बताते हैं कि 2007 की घटना के बाद आभूषण मालखाने में जमा किए गए थे, लेकिन अब अचानक पुलिस का कहना है कि बंदर उन्हें ले गए। उन्होंने कहा, पुलिस गुमराह कर रही है। हमें न्याय चाहिए। कोर्ट की रिपोर्ट और पुलिस की रिपोर्ट में स्पष्ट विरोधाभास है।
मुदित अग्रवाल ने भी भावुक होते हुए कहा कि उनकी पत्नी की मौत के बाद जो कुछ बचा था, वह भी अब गायब हो गया है। पुलिस पक्ष की बात करें तो सदर कोतवाली प्रभारी और संबंधित अधिकारियों ने दावा किया है कि आभूषणों की पोटली लंबे समय से मालखाने में रखी हुई थी। हेड मोहर्रिर चंद्रिका पाल, जिनके समय ये आभूषण जमा किए गए थे, उनकी 2009 में मौत हो गई।
उसके बाद दूसरे मोहर्रिर रामबख्श भी चल बसे। इन दोनों अधिकारियों की मृत्यु के बाद आभूषणों की सही ट्रेसिंग नहीं हो पाई। पुलिस का कहना है कि, जांच के दौरान जब पोटली तलाश की गई तो वह नहीं मिली। एक और दिलचस्प तथ्य यह सामने आया है कि आभूषण नम या भीगे होने के कारण उन्हें धूप में सुखाने के लिए बाहर रखा गया था, जहां बंदरों ने इन्हें उठा लिया। पुलिस ने इस आधार पर अंतिम रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत कर विवेचना समाप्त कर दी है।
कई सवालों के जवाब नहीं है पुलिस के पास
पुलिस का तर्क है कि, उन्होंने वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया। मालखाने की सुरक्षा व्यवस्था, रजिस्टर में दर्जी, और स्टॉक वेरिफिकेशन जैसे मुद्दों पर अब सवाल उठ रहे हैं। यह घटना केवल एक साधारण चोरी या गुमशुदगी का मामला नहीं है। यह पुलिस महकमे की जिम्मेदारी, मालखाने की सुरक्षा और संपत्ति संरक्षण की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करती है।
लखीमपुर खीरी जैसे जिले में जहां पहले से ही कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल उठते रहे हैं, इस घटना ने पुलिस की विश्वसनीयता पर और आंच डाल दी है। यदि बंदरों द्वारा आभूषण चुराए जाने का दावा सही है, तो क्या मालखाने की सुरक्षा इतनी लचर है कि बंदर आसानी से अंदर घुसकर लाखों-करोड़ों की संपत्ति ले जा सकते हैं? क्या धूप सुखाने के लिए बाहर रखना कोई मानक प्रक्रिया है? इन सवालों के जवाब फिलहाल पुलिस के पास नहीं दिख रहे।
भविष्य का सहारा थे गहने
पीड़ित परिवार का आरोप है कि यह बहाना है। मुदित अग्रवाल कहते हैं कि दहेज प्रकरण में उनकी पत्नी की मौत के बाद जो आभूषण बचे थे, वे उनके बच्चों और परिवार की भावी सुरक्षा का सहारा थे। अब पुलिस का बंदरों वाला जवाब उन्हें न्याय से वंचित कर रहा है। वकील शैलेंद्र सिंह गौड़ ने कोर्ट में याचिका दायर कर इस मामले की गहन जांच की मांग की है। उन्होंने कहा कि मालखाने के रजिस्टर, पुराने स्टॉक वेरिफिकेशन रिपोर्ट, सीसीटीवी फुटेज (यदि उपलब्ध हो) और संबंधित कर्मचारियों के बयान दर्ज किए जाएं। कोर्ट ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लिया है और पुलिस से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
अदालत अब देखना चाहती है कि आभूषण वास्तव में कहां गायब हुए, क्या सुरक्षा में चूक हुई, और क्या पुलिस ने जानबूझकर कोई गलती छिपाने की कोशिश की है। यदि बंदरों वाला दावा साबित होता है तो पुलिस को अपनी सुरक्षा व्यवस्था सुधारने के निर्देश दिए जा सकते हैं। लेकिन यदि यह दावा आधारहीन साबित हुआ तो पुलिस अधिकारियों पर लापरवाही या संदिग्ध भूमिका के आरोप लग सकते हैं। यह मामला उत्तर प्रदेश पुलिस के मालखाना प्रबंधन की पुरानी समस्याओं को भी उजागर करता है। कई जिलों में पहले भी मालखाने से सामान गायब होने की शिकायतें आ चुकी हैं।
बढ़ाई जाए मालखाने की सुरक्षा
कभी-कभी पुराने केस प्रॉपर्टी दशकों तक पड़ी रहती हैं और जब कोई पीड़ित वापसी की मांग करता है, तो या तो सामान नहीं मिलता या ऐसे अजीबोगरीब बहाने दिए जाते हैं। बंदर, चूहे, नमी या आग लगने जैसे बहाने अक्सर सुनने को मिलते हैं। लखीमपुर खीरी की इस घटना ने मीडिया और सोशल सर्कल में भी चर्चा बटोरी है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या पुलिस का काम बंदरों से लड़ना भी है? या फिर यह एक सुविधाजनक बहाना है। स्थानीय स्तर पर विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को उठाया है और पुलिस प्रशासन से जवाब मांगा है। मुदित अग्रवाल का परिवार न्याय की आस लगाए बैठा है।
आभा अग्रवाल की मौत को लगभग दो दशक बीत चुके हैं, लेकिन उनके आभूषण अब भी परिवार के लिए भावनात्मक और आर्थिक महत्व रखते हैं। पुलिस अगर पारदर्शी जांच करे और सच्चाई सामने लाए तो परिवार को कुछ राहत मिल सकती है। इस पूरे प्रकरण से साफ है कि पुलिस विभाग को मालखाने की सुरक्षा, डिजिटल रिकॉर्डिंग, नियमित ऑडिट और सीसीटीवी निगरानी जैसी आधुनिक व्यवस्थाएं लागू करनी होंगी। अन्यथा ऐसे मामले बार-बार सामने आते रहेंगे और पुलिस की साख लगातार गिरती रहेगी।
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