नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने पारिवारिक विवादों और दहेज उत्पीड़न से जुड़े मामलों में एक अहम टिप्पणी करते हुए साफ कहा है कि हर बार ससुराल पक्ष को ही दोषी ठहराना सही नहीं है। अदालत ने माना कि कुछ मामलों में महिलाएं भी कानून का गलत इस्तेमाल करती हैं, जिससे न केवल न्यायिक व्यवस्था पर अनावश्यक दबाव बढ़ता है, बल्कि वास्तविक पीड़ितों को समय पर न्याय मिलने में भी बाधा आती है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि कानून का उद्देश्य संरक्षण है, न कि दबाव बनाने का हथियार।

पति और ससुर के खिलाफ दर्ज FIR रद्द
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने पत्नी की ओर से दायर दहेज उत्पीड़न की शिकायत को खारिज करते हुए पति और ससुर को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए बताया कि महिला ने शादी के करीब दो साल बाद वर्ष 2011 में ससुराल छोड़ दिया था और इसके बाद लंबे समय तक वापस नहीं लौटी। कई वर्षों के अंतराल के बाद वर्ष 2016 में उसने पति और ससुर के खिलाफ दहेज उत्पीड़न सहित अन्य गंभीर आरोपों में एफआईआर दर्ज कराई।
मकसद पैसों की मांग, मीडिएशन रिकॉर्ड से खुलासा
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि उपलब्ध साक्ष्यों और मीडिएशन के रिकॉर्ड से स्पष्ट होता है कि शिकायत के पीछे महिला का उद्देश्य अपने पति और ससुर से अधिक से अधिक धन व संपत्ति की मांग करना था। सुनवाई के दौरान सामने आया कि महिला बार-बार नई शर्तें रखती रही, कभी 50 लाख रुपये तो कभी दक्षिण दिल्ली में फ्लैट की मांग करती रही। कोर्ट ने इस व्यवहार को लालच से प्रेरित बताते हुए कहा कि ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग किया जाता है।
न्याय व्यवस्था पर बढ़ता बोझ, परिवारों की शांति प्रभावित
पीठ ने कहा कि दहेज उत्पीड़न जैसे गंभीर कानूनों का गलत इस्तेमाल पुलिस और अदालतों का कीमती समय बर्बाद करता है। ऐसे मुकदमों के कारण निर्दोष परिवार वर्षों तक कानूनी प्रक्रिया में उलझे रहते हैं, जिससे उनकी सामाजिक और मानसिक शांति भंग होती है। अदालत ने यह भी कहा कि जब कानून का दुरुपयोग होता है तो असली पीड़ितों के मामलों पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ता है।
कानून के गलत इस्तेमाल पर रोक जरूरी
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया कि अदालतों को ऐसे मामलों में सतर्कता बरतनी चाहिए और जहां कानून के दुरुपयोग के संकेत मिलें, वहां सख्ती से कार्रवाई की जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि न्याय तभी सार्थक होगा जब कानून का इस्तेमाल संतुलित और निष्पक्ष तरीके से किया जाए, ताकि निर्दोषों को बेवजह प्रताड़ना न झेलनी पड़े और वास्तविक पीड़ितों को समय पर राहत मिल सके।
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