
इस्लामाबाद। सिंधु जल संधि को लेकर भारत के सख्त रुख के बाद पाकिस्तान ने पानी के भंडारण की क्षमता बढ़ाने के लिए बड़े बांधों पर काम तेज करने की कोशिश की थी। मकसद भारत को करारा जवाब देना बताया गया, लेकिन अब यही परियोजनाएं पाकिस्तान की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ती हुई नजर आ रही हैं। मोहमंद डैम में काफी धन खर्च हो रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह पाकिस्तानी रुपये की लगातार गिरती कीमत बताई जा रही है।
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आठ साल में 115 फीसदी बढ़ी लागत
पाकिस्तान ने कुछ साल पहले मोहमंद डैम का निर्माण शुरू किया था। तब माना गया था कि, यह परियोजना देश की जल सुरक्षा को मजबूती देगी। मगर पाकिस्तानी रुपये के रसातल में जाने से इसकी लागत बेकाबू हो गई। सरकार ने हाल ही में परियोजना की लागत का नए सिरे से आकलन किया है। इसके मुताबिक पिछले आठ वर्षों में खर्च 115 फीसदी बढ़कर 666 अरब रुपये तक पहुंच गया है। अधिकारियों ने इस उछाल का मुख्य कारण 2018 के बाद पाकिस्तानी रुपये में आई लगातार गिरावट को बताया है।

मोहमंद डैम उन तीन सबसे बड़े जलाशयों में शामिल है, जिन्हें इस्लामाबाद भारत की ओर से बढ़ते पानी के दबाव से निपटने के लिए तैयार कर रहा है। ऐसे में इसकी लागत का बेकाबू होना पाकिस्तान की रणनीति पर भी सवाल खड़े करता है।
मंजूरी पर अटका फैसला
पाकिस्तानी सरकार के अधिकारियों के हवाले से छपी एक खबर के अनुसार इस हफ्ते सेंट्रल डेवलपमेंट वर्किंग पार्टी (CDWP) की बैठक में संशोधित लागत पेश की गई। हालांकि, समय की कमी की वजह से बैठक में इस पर कोई फैसला नहीं हो सका। CDWP बड़ी परियोजनाओं को मंजूरी देने का पहला चरण है। यहां से हरी झंडी मिलने के बाद प्रस्ताव अंतिम मंजूरी के लिए नेशनल इकोनॉमिक काउंसिल की एग्जीक्यूटिव कमेटी के पास भेजा जाता है। यानी बढ़ी हुई लागत को पक्का होने में अभी कई सरकारी पड़ाव बाकी हैं।
310 अरब से 666 अरब रुपये तक का सफर
इस विशाल योजना को चलाने की जिम्मेदारी पाकिस्तान की वाटर एंड पावर डेवलपमेंट अथॉरिटी (वापडा) के पास है। दस्तावेजों को देखने वाले अधिकारियों के मुताबिक वापडा ने परियोजना की लागत 666 अरब पाकिस्तानी रुपये आंकी है। वर्ष 2018 में तत्कालीन सरकार ने 310 अरब रुपये की लागत से इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दी थी और इसे सितंबर 2025 तक पूरा करने की समयसीमा तय की थी। अधिकारियों का कहना है कि तब से अब तक लागत में 356 अरब रुपये की बढ़ोतरी का अनुमान है, जो करीब 115 फीसदी बैठती है।
चीन की मदद से बन रहा बांध
इस बांध का निर्माण ‘चाइना गेझोउबा ग्रुप कंपनी लिमिटेड’ (CGGC) और पाकिस्तान की ‘डेस्कॉन इंजीनियरिंग लिमिटेड’ का संयुक्त उद्यम कर रहा है। यानी परियोजना में चीनी कंपनी की अहम भूमिका है। पाकिस्तान के बड़े ढांचागत प्रोजेक्ट्स में चीन की भागीदारी पहले भी चर्चा में रही है।
डॉलर की चाल से बढ़ा खर्च
योजना आयोग के अधिकारियों ने बताया कि वापडा ने सूचना दी है कि कुल लागत में हुई बढ़ोतरी का 51 फीसदी हिस्सा डॉलर की विनिमय दर में बदलाव की वजह से है।

अधिकारियों के अनुसार परियोजना की लागत पर विदेशी मुद्रा दरों के उतार-चढ़ाव के असर को लेकर बैठक में चर्चा भी हुई। साफ है कि जब निर्माण से जुड़े बड़े खर्च डॉलर में होते हैं और स्थानीय मुद्रा कमजोर पड़ती जाती है, तो हर बीतते साल के साथ बजट का बोझ भारी होता जाता है। देरी का असर भी यही होता है कि लागत और ऊपर चली जाती है, जैसा मोहमंद डैम के मामले में दिख रहा है।
क्यों अहम है यह मामला
सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हुई थी, जिसके तहत सिंधु नदी प्रणाली के पानी का बंटवारा तय हुआ था। अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने इस संधि को स्थगित रखने का फैसला किया था। तभी से पाकिस्तान में पानी की उपलब्धता को लेकर चिंता जताई जाती रही है और इस्लामाबाद भंडारण क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रहा है। मगर मोहमंद डैम का उदाहरण दिखाता है कि सिर्फ इरादा काफी नहीं है। इतने बड़े प्रोजेक्ट के लिए मजबूत आर्थिक आधार चाहिए, जो फिलहाल पाकिस्तान के पास कमजोर दिखाई देता है।
कर्ज और महंगाई के बीच बढ़ती चुनौती
पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक तंगी, विदेशी कर्ज और कमजोर होती मुद्रा की चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे माहौल में हर बड़े प्रोजेक्ट की बढ़ी हुई लागत सरकारी खजाने पर अतिरिक्त दबाव डालती है। 310 अरब रुपये की योजना का दोगुने से ज्यादा महंगा हो जाना इसी दबाव का संकेत माना जा रहा है। सवाल यह भी है कि जब बजट पर पहले से बोझ है, तो बढ़ी हुई रकम का इंतजाम कैसे होगा।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि CDWP संशोधित लागत पर कब फैसला लेता है और नेशनल इकोनॉमिक काउंसिल की एग्जीक्यूटिव कमेटी इसे किस रूप में मंजूरी देती है। तब तक परियोजना की रफ्तार और उसकी तय समयसीमा पर अनिश्चितता बनी रहेगी। सितंबर 2025 की मूल डेडलाइन पहले ही पीछे छूट चुकी है।
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