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पाकिस्तान में कैडेटों की ट्रेनिंग और बैकडेटेड प्रमोशन पर बढ़ी तनातनी
ढाका। बांग्लादेश की राजनीति और सेना के गलियारों में इन दिनों भारी तनाव का माहौल है। 1971 के मुक्ति संग्राम में पाकिस्तान पर ऐतिहासिक जीत के बाद बनी बांग्लादेशी सेना के भीतर एक नया असंतोष पनपता दिख रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस नाराजगी की दो बड़ी वजहें हैं। पहली, पाकिस्तान सैन्य अकादमी (PMA) में बांग्लादेशी कैडेटों की ट्रेनिंग। दूसरी, मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार और अब मौजूदा तारिक रहमान सरकार की ओर से पूर्व सैन्य अधिकारियों को दिए जा रहे ‘बैकडेटेड’ प्रमोशन।
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पाकिस्तान में ट्रेनिंग और गोल्ड मेडल पर क्यों भड़का सेना का एक धड़ा
रिपोर्ट के अनुसार 17 अक्टूबर को पाकिस्तान के काकुल स्थित पाकिस्तान मिलिट्री अकादमी में 154वें लॉन्ग कोर्स की पासिंग-आउट परेड हुई। इसमें बांग्लादेशी कैडेट रियाद महमूद खान को ‘चीफ ऑफ ओवरसीज गोल्ड मेडल’ से सम्मानित किया गया।

कागजों पर यह एक सैन्य उपलब्धि लग सकती है, लेकिन बांग्लादेशी सेना के पेशेवर अफसरों के बीच इसने गहरी नाराजगी पैदा कर दी है। सेना के एक बड़े वर्ग का मानना है कि, जिस देश की सेना से खूनी संघर्ष के बाद बांग्लादेश को आजादी मिली, उसी देश की सैन्य अकादमी में अपने कैडेट भेजना और प्रशिक्षण दिलाना सेना के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है। उनके लिए यह सिर्फ ट्रेनिंग का मामला नहीं, बल्कि 1971 की विरासत और सैन्य स्वाभिमान से जुड़ा सवाल है।
150 पूर्व अफसरों के प्रमोशन पर विवाद
रिपोर्ट के मुताबिक, असंतोष की दूसरी सबसे बड़ी वजह एक बड़ा सरकारी फैसला है, जो प्रधानमंत्री के रक्षा सलाहकार रिटायर्ड ब्रिगेडियर ए.के.एम. शमसुल इस्लाम की पहल पर लिया गया। ‘वंचित कोटा’ के तहत एक राजपत्र (गजट) को मंजूरी दी गई, जिसके जरिए 150 पूर्व सैन्य अधिकारियों को बैकडेटेड प्रमोशन और वित्तीय लाभ दिए गए। ये वे अधिकारी हैं जिन्हें पहले बर्खास्त कर दिया गया था या जबरन रिटायर कर दिया गया था।
इस मामले में खास बात यह बताई जा रही है कि थलसेना, नौसेना और वायुसेना, तीनों के प्रमुखों ने इस सिफारिश पर असहमति और आपत्तियां दर्ज कराई थीं। इसके बावजूद सशस्त्र बल प्रभाग (AFD) ने फैसले को लागू कर दिया। इससे सेना के भीतर यह धारणा बनी है कि शीर्ष सैन्य नेतृत्व की राय को दरकिनार किया गया।
पाकिस्तान-समर्थक होने के आरोप
रिपोर्ट के मुताबिक सेवारत अधिकारियों का कहना है कि पदोन्नति पाने वाले ज्यादातर पूर्व अफसर ‘पाकिस्तान-समर्थक’ विचारधारा के हैं और राजनीतिक रूप से जमात-ए-इस्लामी या मौजूदा सत्ता के करीब माने जाते हैं। यह दावा सेवारत अफसरों का है। रिपोर्ट में इसकी स्वतंत्र पुष्टि का जिक्र नहीं है, फिर भी इससे साफ है कि सेना के भीतर इस फैसले को केवल प्रशासनिक राहत नहीं, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक झुकाव से जोड़कर देखा जा रहा है।
सेना प्रमुख और एसएसएफ चीफ के बीच तीखी बहस
एक मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि, ढाका छावनी में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान यह असंतोष खुलकर सामने आया। चश्मदीदों के हवाले से कहा गया है कि सेना प्रमुख जनरल वकार-उज-जमां विशेष सुरक्षा बल (SSF) के महानिदेशक मेजर जनरल महबूबुस समद चौधरी पर बुरी तरह भड़क गए।
रिपोर्ट के अनुसार जनरल वकार कमांड स्ट्रक्चर में हो रहे बदलावों और पूर्व अफसरों की मनमानी पदोन्नति से नाराज थे। इसी नाराजगी में उनकी एसएसएफ प्रमुख से तीखी बहस हुई। यह घटना चश्मदीदों के बयान पर आधारित है, और इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया का उल्लेख रिपोर्ट में नहीं मिलता।
सेना प्रमुख के दौरे का मुद्दा भी उठा
रिपोर्ट में सेना प्रमुख के भारत दौरे का मुद्दा भी उठाया गया है। आरोप है कि जमात-ए-इस्लामी के दबाव में यूनुस सरकार, खासकर तत्कालीन सुरक्षा सलाहकार खलीलुर रहमान ने, दौरे के लिए जरूरी सरकारी आदेश (GO) जारी करने में कथित तौर पर देरी की या उसमें बाधा डाली।
सितंबर के आखिरी हफ्ते में बीएनपी सरकार की अनिच्छा की वजह से जनरल वकार को एक बार फिर भारत दौरे की अपनी योजना रद्द करनी पड़ी। खबरों के मुताबिक सेना प्रमुख किसी भी हाल में प्रशासन के साथ टकराव की स्थिति में नहीं पड़ना चाहते थे। यानी असहमति के बावजूद उन्होंने सार्वजनिक टकराव से बचने की कोशिश की।
क्यों अहम है यह घटनाक्रम
बांग्लादेश में सेना की भूमिका हमेशा से बेहद अहम रही है। ऐसे में सेना के भीतर बढ़ती बेचैनी, सेना प्रमुख और सरकार के बीच कथित दूरी और शीर्ष अधिकारियों के बीच तीखी बहस की खबरें राजनीतिक स्थिरता के लिहाज से संवेदनशील मानी जा रही हैं। एक तरफ पाकिस्तान में ट्रेनिंग को लेकर भावनात्मक और ऐतिहासिक आपत्ति है, दूसरी तरफ पदोन्नति के फैसले को लेकर पेशेवर और राजनीतिक सवाल उठ रहे हैं।
फिलहाल रिपोर्ट में सरकार या सेना मुख्यालय की ओर से इन आरोपों पर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान शामिल नहीं है। अब यह देखना अहम होगा कि सरकार इन आपत्तियों पर क्या रुख अपनाती है, क्या पदोन्नति के फैसले की समीक्षा होती है और क्या सेना प्रमुख का भारत दौरा आगे तय हो पाता है। साथ ही यह भी कि ढाका छावनी की कथित बहस के बाद सेना और सरकार के रिश्ते किस दिशा में जाते हैं।
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