
नवरात्रि से ठीक पहले महाराष्ट्र में गरबा पंडालों को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल ने नवरात्रि के दौरान होने वाले गरबा आयोजनों में मुस्लिम समुदाय के लोगों के प्रवेश पर रोक लगाने के इरादे से एक गाइडलाइन जारी की है। इन संगठनों की मांग है कि, पंडाल में प्रवेश से पहले आधार कार्ड की जांच की जाए, माथे पर तिलक लगाया जाए और हाथ में कलावा बांधा जाए।
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महाराष्ट्र सरकार में मंत्री नितेश राणे ने इस मांग का खुला समर्थन किया है, जबकि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की पत्नी अमृता फडणवीस का कहना है कि, अगर कोई शांतिपूर्ण ढंग से उत्सव देखना चाहता है तो इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। दूसरी ओर, शिवसेना (उद्धव गुट) के नेता संजय राऊत, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने इस पहल पर तीखी आपत्ति जताई है।

विपक्ष का आरोप है कि, यह कदम समाज में नफरत फैलाने की कोशिश है। इस ताजा विवाद ने एक बार फिर गरबा की परंपरा, उसके इतिहास और नवरात्रि से उसके संबंध को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
क्या है गरबा और कहां से हुई थी शुरुआत
गरबा भारत का एक प्रसिद्ध लोकनृत्य है, जिसकी पहचान सबसे ज्यादा गुजरात से जुड़ी है। नवरात्रि के नौ दिनों में गरबा का आयोजन बड़े उत्साह के साथ किया जाता है। इस दौरान महिलाएं चनिया-चोली और पुरुष केडिया-पायजामा जैसे पारंपरिक परिधान पहनते हैं और गोल घेरा बनाकर नृत्य करते हैं। गरबा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक भावनाएं जुड़ी हैं। इसे मां शक्ति की उपासना से जुड़ा नृत्य माना जाता है, जिसमें जीवन, ऊर्जा और सृजन शक्ति का सम्मान किया जाता है।
इतिहासकारों और लोक परंपराओं के अनुसार, गरबा शब्द संस्कृत के ‘गर्भ’ शब्द से जुड़ा माना जाता है। पुराने समय में मिट्टी के एक घड़े में दीपक रखा जाता था, जिसे गर्भ-दीप या ‘गरबो’ कहा जाता था। घड़े में बने छोटे छेदों से दीपक की रोशनी बाहर आती थी। यह दीपक जीवन और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता था, जबकि घड़ा शरीर का प्रतीक था और उसके भीतर जलता दीपक आत्मा व शक्ति का प्रतीक समझा जाता था।
गुजरात से जुड़ी है पहचान
इसी दीपक के चारों ओर लोग गोल घेरा बनाकर नाचते थे। लोक परंपराओं के मुताबिक गरबा की शुरुआत गुजरात के गांवों से हुई, जहां नवरात्रि के दौरान लोग एक स्थान पर इकट्ठा होकर देवी की पूजा करते और फिर तालियों की लय पर नृत्य करते थे। शुरुआत में इसमें ढोल, ढोलक, मंजीरा और तालियों का इस्तेमाल होता था और देवी के भजन गाए जाते थे। समय के साथ इसमें नए कदम और ताल जुड़ते चले गए।
कुछ विद्वान गरबा जैसी नृत्य परंपराओं को प्राचीन लोकनृत्यों से जोड़ते हैं। हरिवंश पुराण में दंड रसक और ताल रसक जैसे नृत्यों का उल्लेख मिलता है। हालांकि, आधुनिक गरबा का मौजूदा स्वरूप धीरे-धीरे गुजरात की लोक संस्कृति में विकसित हुआ माना जाता है। कुछ मत इसे सोलंकी और वाघेला काल से भी जोड़ते हैं, जब गुजरात में मंदिरों और लोक परंपराओं का व्यापक विकास हुआ और धार्मिक उत्सवों के साथ सामूहिक नृत्य की परंपरा और मजबूत हुई।
नवरात्रि से क्यों जुड़ा है गरबा
नवरात्रि मां दुर्गा और शक्ति की उपासना का पर्व है, जो नौ रातों तक मनाया जाता है और इस दौरान देवी के अलग-अलग रूपों की पूजा होती है। मान्यता है कि, मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था, जिसे बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। गरबा के जरिए लोग देवी शक्ति के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
पारंपरिक आयोजन में बीच में देवी की प्रतिमा या गर्भ-दीप रखा जाता है और लोग उसके चारों ओर घूमते हैं। यह गोल घेरा जीवन चक्र का प्रतीक माना जाता है, जिसे जन्म, जीवन और मृत्यु के चक्र से भी जोड़ा जाता है। इस नृत्य में महिलाओं की भागीदारी खास अहमियत रखती है और इसे नारी शक्ति व सृजन क्षमता के सम्मान का प्रतीक माना जाता रहा है। पहले कई स्थानों पर कन्या जन्म, विवाह और अन्य शुभ अवसरों पर भी गरबा किया जाता था।
गरबा और डांडिया का फर्क
गरबा और डांडिया को अक्सर एक ही समझ लिया जाता है, जबकि दोनों में स्पष्ट अंतर है। गरबा में मुख्य रूप से तालियां, हाथों की मुद्राएं और गोल घेरा शामिल होता है, जिसमें नर्तक दीपक या देवी प्रतिमा के इर्द-गिर्द नृत्य करते हैं। डांडिया में लकड़ी की रंगीन छड़ियों का इस्तेमाल होता है और लोग एक-दूसरे की छड़ियों से ताल मिलाते हैं, इन छड़ियों को देवी दुर्गा की तलवार का प्रतीक माना जाता है। आजकल कई आयोजनों में दोनों साथ किए जाते हैं और पारंपरिक संगीत के साथ फिल्मी व आधुनिक गीत भी शामिल हो गए हैं।
दुनिया भर में पहुंचा गरबा
समय के साथ गरबा गुजरात की सीमाओं से बाहर निकल गया। आज महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली सहित देश के कई हिस्सों में गरबा आयोजन होते हैं। विदेशों में बसे भारतीय समुदाय भी नवरात्रि के दौरान गरबा करते हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा तथा ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में बड़े पैमाने पर गरबा कार्यक्रम देखे जाते हैं।

पहले यह मुख्यतः धार्मिक आयोजन था, लेकिन अब यह सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रम का भी रूप ले चुका है, जिसमें बड़ी संख्या में युवा भाग लेते हैं। कई जगह गरबा प्रतियोगिताएं भी आयोजित होती हैं, और बड़े शहरों में यह अब व्यावसायिक स्वरूप भी ले चुका है, जहां टिकट बिक्री के साथ बड़े मैदानों में आयोजन होते हैं और नामी कलाकार व गायक शिरकत करते हैं।
उठ रहे ये सवाल
महाराष्ट्र में उठा यह विवाद कई अहम सवाल खड़े करता है, क्या किसी निजी धार्मिक आयोजन में आयोजकों को अपनी शर्तें तय करने का अधिकार है, क्या किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान जांचने के लिए आधार कार्ड और तिलक जैसे तरीकों का इस्तेमाल उचित है, और क्या धर्म के आधार पर प्रवेश रोकना संविधान में निहित समानता व स्वतंत्रता के सिद्धांतों से मेल खाता है। इन सवालों का अंतिम जवाब संबंधित कानून और प्रशासनिक फैसलों पर निर्भर करेगा। यह भी ध्यान रहे कि किसी संगठन की घोषणा को सरकारी आदेश नहीं माना जा सकता, इसलिए यह देखना जरूरी है कि निर्देश किसने जारी किए और प्रशासन ने उस पर क्या रुख अपनाया।
गरबा श्रद्धा, संगीत और सामूहिक उत्सव की परंपरा है, जिसमें सुरक्षा और अनुशासन की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन सुरक्षा के नाम पर किसी एक समुदाय के सभी लोगों को संदेह की नजर से देखना सामाजिक तनाव को बढ़ावा दे सकता है। गरबा की परंपरा सदियों पुरानी लोक संस्कृति से जुड़ी है और इसका मौजूदा स्वरूप गुजरात के गांवों में विकसित हुआ। यह नवरात्रि, मां शक्ति और सृजन ऊर्जा को समर्पित नृत्य है, जो आज भारत सहित दुनिया के कई हिस्सों में लोकप्रिय है और धार्मिक आयोजन के साथ-साथ सांस्कृतिक उत्सव का भी रूप ले चुका है।
महाराष्ट्र में मुस्लिम समुदाय के प्रवेश पर रोक और पहचान जांच को लेकर उठा यह विवाद केवल गरबा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक अधिकार और सामाजिक सौहार्द से जुड़ा व्यापक मुद्दा बन गया है। गरबा की मूल भावना लोगों को जोड़ने की रही है, ऐसे में आयोजकों, प्रशासन और राजनीतिक संगठनों से संवेदनशीलता के साथ निर्णय लेने की अपेक्षा की जा रही है, ताकि सुरक्षा और आस्था के सम्मान के साथ-साथ संविधान में निहित समानता व भाईचारे के मूल्यों की भी अनदेखी न हो।
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