
असम। भारत इस वर्ष भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है, लेकिन इस बार आयोजन का स्वरूप पहले जैसा नहीं होगा। आमतौर पर इस तरह के बड़े द्विपक्षीय सम्मेलन नई दिल्ली या मुंबई जैसे महानगरों में होते रहे हैं, लेकिन इस साल जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची अगले महीने की शुरुआत में सीधे पूर्वोत्तर भारत के राज्य असम पहुंचेंगी। उनके साथ दर्जनों जापानी कंपनियों के शीर्ष अधिकारी भी होंगे। इस आयोजन को लेकर रणनीतिक मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है।
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इस वजह से चुना गया असम को
राजधानी की जगह असम को सम्मेलन स्थल के रूप में चुने जाने के पीछे दो बड़ी वजहें मानी जा रही हैं। पहली, असम की आर्थिक संभावनाएं अब तक पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं हुई हैं और टोक्यो की दिलचस्पी अब इसी अनछुई क्षमता में बढ़ रही है।

दूसरी वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वह दीर्घकालिक योजना है, जिसके तहत वे असम को दक्षिण-पूर्व एशिया से जुड़ने वाले एक औद्योगिक और लॉजिस्टिक्स केंद्र के रूप में विकसित करना चाहते हैं। यानी यह सिर्फ एक कूटनीतिक मुलाकात भर नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर भारत को वैश्विक आर्थिक नक्शे पर लाने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।
व्यापार से लेकर रणनीतिक सहयोग तक पर होगी बात
इस सम्मेलन में सिर्फ कूटनीतिक औपचारिकताएं नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक और रणनीतिक मुद्दों पर भी गहन चर्चा होने की उम्मीद है। बताया जा रहा है कि, 50 से ज्यादा जापानी कंपनियों के प्रतिनिधि इस आयोजन में शामिल होंगे। चर्चा के प्रमुख विषयों में सेमीकंडक्टर उद्योग, नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएं, ऑटोमोबाइल क्षेत्र में सहयोग, और रणनीतिक तेल भंडार से जुड़े समझौते शामिल हो सकते हैं। इसके साथ ही भारत और जापान दोनों देश पूर्वोत्तर भारत में संपर्क सुविधाओं, बुनियादी ढांचे और औद्योगिक परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर विशेष ध्यान देंगे, ताकि इस क्षेत्र को बेहतर तरीके से देश और दुनिया के बाकी हिस्सों से जोड़ा जा सके।
पूर्वोत्तर भारत के लिए ऐतिहासिक मौका
यह सम्मेलन सिर्फ कूटनीतिक नजरिए से ही नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर भारत के समग्र विकास के लिहाज से भी एक अहम पड़ाव माना जा रहा है। उम्मीद है कि, अगर यह आयोजन सफल रहता है, तो इससे असम सहित पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान मिलेगी। साथ ही भारत की एक्ट ईस्ट नीति को भी नई गति मिलेगी, जिसके तहत भारत दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को मजबूत करना चाहता है। यह सम्मेलन जुलाई महीने में असम की राजधानी गुवाहाटी में आयोजित किया जाएगा, और इसकी तैयारियां अभी से जोरों पर हैं।
बड़ी जापानी कंपनियों के दिग्गज होंगे शामिल
जापानी मीडिया संस्थान निक्केई एशिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्रतिनिधिमंडल में जापान की कुछ सबसे बड़ी और जानी-मानी कंपनियों के प्रमुख चेहरे शामिल होंगे। इनमें सुजुकी मोटर, इटोचू कॉर्पोरेशन और टोयोटा त्सुशो जैसे बड़े औद्योगिक समूहों के वरिष्ठ अधिकारी प्रमुख रूप से नजर आ सकते हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि, इस यात्रा के दौरान कई कंपनियां सेमीकंडक्टर, बुनियादी ढांचे, ऊर्जा और विनिर्माण जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आपसी सहयोग को लेकर औपचारिक समझौतों पर हस्ताक्षर भी कर सकती हैं। ऐसे समझौते न केवल दोनों देशों के बीच आर्थिक रिश्तों को गहरा करेंगे, बल्कि पूर्वोत्तर भारत में रोजगार और तकनीकी विकास के नए रास्ते भी खोल सकते हैं।
डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर का उभरता केंद्र
असम को अब धीरे-धीरे सेमीकंडक्टर निर्माण और डिजिटल बुनियादी ढांचे के एक उभरते हुए केंद्र के तौर पर देखा जाने लगा है। इस बदलाव के पीछे टाटा समूह, अदानी समूह और रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी भारतीय बड़ी कंपनियों का निवेश एक अहम कारण है, जिसने पहले से ही विदेशी निवेशकों का ध्यान इस क्षेत्र की ओर खींचना शुरू कर दिया है।
जापानी कंपनियां भी इन्हीं भारतीय कंपनियों की परियोजनाओं में अपनी सटीक लॉजिस्टिक्स विशेषज्ञता और उन्नत तकनीकों के जरिए सहयोग करने के अवसर तलाश रही हैं। दोनों देशों के बीच इस तरह का तकनीकी और औद्योगिक तालमेल आने वाले वर्षों में पूर्वोत्तर भारत की आर्थिक तस्वीर को काफी हद तक बदल सकता है।
कूटनीतिक नजरिए से अहम
राजनयिक हलकों में यह माना जा रहा है कि, सम्मेलन स्थल बदलने का फैसला केवल प्रतीकात्मक नहीं है। बड़े वैश्विक नेताओं और कारोबारी प्रतिनिधिमंडलों की मेजबानी आम तौर पर देश के बड़े महानगरों तक ही सीमित रहती है, जहां पहले से बेहतर सुरक्षा व्यवस्था, होटल और सम्मेलन केंद्र मौजूद होते हैं।
ऐसे में किसी पूर्वोत्तर राज्य को इतने बड़े स्तर के द्विपक्षीय आयोजन के लिए चुनना अपने आप में एक संदेश है, यह दिखाता है कि, केंद्र सरकार पूर्वोत्तर भारत को अब हाशिये पर रखने के बजाय राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय निवेश की मुख्यधारा में शामिल करना चाहती है। इससे राज्य प्रशासन के लिए भी एक बड़ी जिम्मेदारी आ जाती है, क्योंकि सुरक्षा, यातायात और बुनियादी सुविधाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनुरूप तैयार करना होगा।
पूर्वोत्तर राज्यों को मुख्यधारा में लाने की कवायद
कुल मिलाकर, इस बार का भारत-जापान शिखर सम्मेलन कई मायनों में अलग और महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। पारंपरिक राजधानी-केंद्रित आयोजन से हटकर इसे सीधे असम में आयोजित करने का फैसला यह दिखाता है कि भारत अब अपने पूर्वोत्तर राज्यों को आर्थिक विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए गंभीरता से कदम उठा रहा है।
जापान की ओर से बड़ी संख्या में औद्योगिक प्रतिनिधियों की मौजूदगी यह भी संकेत देती है कि, टोक्यो इस क्षेत्र की दीर्घकालिक संभावनाओं को लेकर आश्वस्त है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस सम्मेलन से निकलने वाले समझौते कितनी जल्दी जमीन पर उतरते हैं, और असम सहित पूरा पूर्वोत्तर क्षेत्र किस तरह इस अवसर का इस्तेमाल अपनी आर्थिक प्रगति के लिए करता है।
फिलहाल सभी की निगाहें जुलाई में गुवाहाटी में होने वाले इस ऐतिहासिक सम्मेलन पर टिकी हुई हैं, जिससे भारत-जापान संबंधों के साथ-साथ पूर्वोत्तर भारत के भविष्य को लेकर भी कई उम्मीदें जुड़ी हुई हैं।
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