आगामी फुटबॉल विश्व कप पर युद्ध और हिंसा का साया… पूर्व जर्मन कोच जोआकिम लोव ने जताई सुरक्षा की गंभीर चिंता

लोव ने स्पष्ट किया कि अतीत में रूस (2018) और कतर (2022) के विश्व कप को लेकर भी विवाद हुए थे, लेकिन वर्तमान स्थिति कहीं अधिक भयावह है।

कोलोन (जर्मनी)। साल 2026 में अमेरिका, मैक्सिको और कनाडा की संयुक्त मेजबानी में आयोजित होने वाले फुटबॉल विश्व कप को लेकर खेल जगत में एक नई बहस छिड़ गई है। जर्मनी को 2014 में विश्व विजेता बनाने वाले दिग्गज कोच जोआकिम लोव ने आगामी टूर्नामेंट की सुरक्षा व्यवस्था और राजनीतिक स्थिरता पर कड़े सवाल उठाए हैं।  लोव ने स्पष्ट किया कि अतीत में रूस (2018) और कतर (2022) के विश्व कप को लेकर भी विवाद हुए थे, लेकिन वर्तमान स्थिति कहीं अधिक भयावह है।

लोव ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे देशों में खेलना, जो प्रत्यक्ष रूप से युद्ध की आग में झुलस रहे हों, खिलाड़ियों और प्रशंसकों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। उन्होंने इशारा किया कि वर्तमान में अमेरिका और इजराइल का ईरान के साथ सैन्य संघर्ष जारी है, जो खेल के आयोजन पर राजनीतिक अस्थिरता का भारी दबाव बना सकता है। लोव के अनुसार, जब राजनीति खेल पर हावी हो जाती है, तो टूर्नामेंट की मूल भावना और सुरक्षा दोनों खतरे में पड़ जाते हैं।

विश्व कप की सह-मेजबानी कर रहे मैक्सिको के हालात भी कुछ कम चिंताजनक नहीं हैं। पिछले महीने मैक्सिको की सेना द्वारा कुख्यात कार्टेल सरगना नेमेसियो रूबेन ओसेगुएरा सर्वान्तेस (जिसे ‘एल मेनचो’ के नाम से जाना जाता था) को मार गिराए जाने के बाद पूरे देश में हिंसा की एक लहर फैल गई है। इस आंतरिक अशांति ने सुरक्षा एजेंसियों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

सोमवार शाम कोलोन में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में, जहाँ 1974 के विश्व विजेता रेनर बोनहोफ सहित कई दिग्गज मौजूद थे, चर्चा का केंद्र आने वाला विश्व कप ही रहा। बोनहोफ ने भी लोव की बातों का समर्थन करते हुए कहा कि मौजूदा वैश्विक हालात में केवल ‘कनाडा’ ही एक तटस्थ देश नजर आता है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या मौजूदा परिस्थितियों में खेल का आयोजन सुरक्षित है? बोनहोफ ने स्पष्ट किया कि हालांकि वे फुटबॉल से बेहद प्यार करते हैं और बहिष्कार के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन उन सुरक्षा उपायों पर गंभीरता से विचार करना होगा जिनकी अब तक अनदेखी की गई है।

फुटबॉल प्रेमियों के लिए यह टूर्नामेंट उत्साह का विषय तो है, लेकिन मेजबान देशों की राजनीतिक और सैन्य स्थिति ने फीफा और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं।

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